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व्यवस्था पर सवाल उठाना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है: पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर

मुरलीधर बोले—व्यवस्था पर अविश्वास लोकतांत्रिक प्रगति का संकेत हो सकता है; बच्चों को भूख या इलाज के अभाव में मरने देना किसी भी सभ्य समाज को स्वीकार नहीं करना चाहिए

राष्ट्रीय | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 सितंबर 2026

सवाल पूछने वाला समाज ही मजबूत लोकतंत्र बनाता है

उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने लोकतंत्र, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों, अंतरराष्ट्रीय कानून और फिलिस्तीन के हालात को लेकर बेहद महत्वपूर्ण विचार रखे हैं। उनका कहना है कि किसी व्यवस्था पर अविश्वास करना अपने आप में लोकतंत्र के लिए समस्या नहीं है। इसके उलट, अगर नागरिक व्यवस्था पर सवाल करते हैं, उसके फैसलों को परखते हैं और सत्ता तथा संस्थाओं से जवाब मांगते हैं, तो यह लोकतांत्रिक प्रगति का संकेत हो सकता है। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत इस बात से तय होती है कि नागरिक कितनी आजादी से सवाल पूछ सकते हैं, संस्थाएं कितनी जवाबदेह हैं और सत्ता की आलोचना के लिए कितनी जगह बची हुई है।

व्यवस्था पर भरोसा नहीं, सवाल करने का अधिकार जरूरी

न्यायमूर्ति मुरलीधर के विचारों का मूल संदेश यह है कि किसी संस्था को केवल इसलिए सही नहीं मान लिया जाना चाहिए क्योंकि वह संवैधानिक या शक्तिशाली संस्था है। लोकतंत्र में नागरिकों को यह पूछने का अधिकार होना चाहिए कि कोई फैसला क्यों लिया गया, उसका असर किस पर पड़ेगा और क्या उससे लोगों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। उनके मुताबिक किसी व्यवस्था पर सवाल उठाना उसे गिराने की कोशिश नहीं है। कई बार यही सवाल व्यवस्था की कमियों को सामने लाते हैं और संस्थाओं को बेहतर तथा ज्यादा जवाबदेह बनाने का रास्ता खोलते हैं। अगर समाज सवाल करना बंद कर दे और सत्ता से जवाब मांगना बंद कर दे, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण ताकत ही कमजोर पड़ सकती है।

फिलिस्तीन में बच्चों की हालत पर गहरी चिंता

फिलिस्तीन और गाजा के हालात पर बात करते हुए मुरलीधर ने सबसे ज्यादा जोर बच्चों की स्थिति पर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया को ऐसी स्थिति स्वीकार नहीं करनी चाहिए जिसमें बच्चे भूख से मरें या केवल इसलिए अपनी जान गंवा दें क्योंकि उन्हें जरूरी चिकित्सा सहायता नहीं मिल पाई। उनका कहना है कि युद्ध और संघर्ष की स्थिति में भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के कुछ बुनियादी सिद्धांतों का पालन होना चाहिए। किसी बच्चे की जान इस आधार पर नहीं तय होनी चाहिए कि वह किस पक्ष से जुड़ा है या संघर्ष किस राजनीतिक परिस्थिति में चल रहा है। बच्चों को भोजन, इलाज, शिक्षा और सुरक्षित जीवन मिलना इंसानियत की बुनियादी जिम्मेदारी है।

गाजा में बच्चों की मौत पर संयुक्त राष्ट्र आयोग की जांच

मुरलीधर इस समय संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र, पूर्वी यरुशलम और इजरायल पर स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग के अध्यक्ष हैं। उन्होंने बताया कि आयोग का काम किसी अदालत की तरह फैसला सुनाना नहीं, बल्कि सबूत जुटाना, उनकी जांच करना और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर निष्कर्ष सामने रखना है। आयोग अलग-अलग स्रोतों से मिले सबूतों की जांच करता है और वीडियो, दस्तावेजों, गवाहियों तथा दूसरे उपलब्ध प्रमाणों को कई स्तरों पर परखता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग की जांच का उद्देश्य किसी एक पक्ष को बिना जांच के दोषी ठहराना नहीं है। आयोग ने हमास और दूसरे गैर-राज्य पक्षों की हिंसा को भी अपनी अलग रिपोर्टों में दर्ज किया है।

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बच्चों के खिलाफ हिंसा पर गंभीर आरोप

मुरलीधर ने जून 2026 में सामने आई आयोग की रिपोर्ट के संदर्भ में कहा कि आयोग ने फिलिस्तीनी बच्चों के खिलाफ गंभीर हिंसा और उनके अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों का दस्तावेजीकरण किया है। उनके अनुसार आयोग ने ऐसे मामलों की जांच की जिनमें बच्चों के मारे जाने, घायल होने, परिवारों के खत्म हो जाने और शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था के तबाह होने की जानकारी सामने आई। उन्होंने यह भी बताया कि आयोग के निष्कर्ष केवल सोशल मीडिया पर मौजूद वीडियो के आधार पर नहीं बनाए गए, बल्कि उपलब्ध सामग्री को कई स्रोतों से मिलाकर और उसकी प्रामाणिकता की जांच करके निष्कर्ष तक पहुंचा गया।

स्कूलों का विनाश और बच्चों का भविष्य

मुरलीधर ने गाजा की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई। उनके अनुसार आयोग की रिपोर्ट में बड़ी संख्या में स्कूलों के नष्ट होने और बच्चों की शिक्षा पर पड़े विनाशकारी प्रभाव का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि जिस उम्र में बच्चों को स्कूल में बैठकर पढ़ना चाहिए, उस उम्र में कई बच्चे भोजन, पानी और परिवार के लिए जरूरी चीजें जुटाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। शिक्षा केवल किताब और परीक्षा का विषय नहीं है। यह किसी भी समाज के भविष्य की बुनियाद है। अगर बच्चों से स्कूल, सुरक्षा और सामान्य बचपन छीन लिया जाता है तो युद्ध का असर केवल आज की पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पूरी पीढ़ियों पर पड़ता है।

‘बच्चों को मानव ढाल’ बताकर सब कुछ सही नहीं ठहराया जा सकता

मुरलीधर ने इस तर्क पर भी सवाल उठाया कि गाजा में मारे गए सभी बच्चे हमास की मानव ढाल थे। उनका कहना है कि आयोग ने जिन घटनाओं का अध्ययन किया, उनमें ऐसे मामले भी शामिल हैं जहां बच्चों के किसी सैन्य गतिविधि में शामिल होने के प्रमाण नहीं मिले। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भूख के कारण भोजन लेने की कोशिश कर रहा बच्चा, अपने परिवार के साथ चल रहा बच्चा या नवजात शिशु किसी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आयोग ने हमास द्वारा बच्चों के इस्तेमाल और उसके नियंत्रण वाले इलाकों में फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया है।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की ताकत पर भी बड़ा सवाल

मुरलीधर के मुताबिक सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूद है, तो उसे लागू कौन करेगा। दुनिया के शक्तिशाली देशों के राजनीतिक हित कई बार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कार्रवाई को प्रभावित करते हैं। उनका मानना है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब कानून का सिद्धांत कमजोर और शक्तिशाली दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू हो। अगर किसी ताकतवर देश के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आने के बाद भी दुनिया केवल राजनीतिक मजबूरियों के कारण चुप रहती है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थाओं में लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है।

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‘बच्चे भूख से न मरें’—इतना तो दुनिया तय कर सकती है

मुरलीधर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने एक बेहद बुनियादी सवाल रखा है। उनका कहना है कि दुनिया को कम से कम इस बात पर तो सहमत होना चाहिए कि युद्ध के दौरान भी किसी बच्चे को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा और किसी बच्चे की मौत जरूरी चिकित्सा सहायता न मिलने के कारण नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार अगर दुनिया इतनी बुनियादी मानवीय बातों पर भी एकजुट नहीं हो सकती, तो फिर अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और जिनेवा कन्वेंशन में विश्वास की बात करना मुश्किल हो जाता है। उनका जोर इस बात पर है कि ऐसी मदद किसी भविष्य के अदालत के आदेश का इंतजार नहीं कर सकती। जरूरतमंद लोगों तक मानवीय सहायता पहुंचाना तत्काल होना चाहिए।

भारत की चुप्पी पर भी सवाल

फिलिस्तीन के सवाल पर भारत की भूमिका को लेकर भी मुरलीधर ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और मानवीय कानून के अपने पुराने रुख को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने मानवाधिकारों की वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और संविधान में भी मानव गरिमा तथा स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उनके अनुसार भारत फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की अपनी आधिकारिक नीति से पूरी तरह पीछे नहीं हटा है, लेकिन मौजूदा हालात में उसे अपने रुख पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

‘भारत चुप नहीं रह सकता’

मुरलीधर का कहना है कि भारत के लिए यह केवल विदेश नीति का सवाल नहीं है। यह उन मूल्यों का सवाल भी है जिनका भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन करता रहा है। उन्होंने कहा कि भारत को मानव गरिमा, स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को ध्यान में रखना चाहिए। उनके अनुसार जब फिलिस्तीनी बच्चों के खिलाफ गंभीर आरोपों और सबूतों की चर्चा सामने आ रही है, तब भारत को भी यह विचार करना चाहिए कि वह इस स्थिति पर क्या स्पष्ट रुख अपनाना चाहता है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़

मुरलीधर ने अपने न्यायिक अनुभव के संदर्भ में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को भी लोकतंत्र की बुनियादी शर्त बताया। अदालतों का काम केवल मुकदमों का निपटारा करना नहीं है, बल्कि संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना भी है। इसके लिए जरूरी है कि न्यायपालिका राजनीतिक दबाव और बाहरी प्रभाव से स्वतंत्र होकर काम करे। नागरिकों का भरोसा तभी मजबूत होगा जब उन्हें यह विश्वास रहेगा कि अदालत में सरकार और आम नागरिक के बीच कानून के सामने समानता का सिद्धांत लागू होगा और सत्ता के फैसलों की भी न्यायिक समीक्षा संभव होगी।

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संवैधानिक संस्थाओं की असली ताकत जनता का भरोसा

मुरलीधर के विचारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़ा है। किसी संस्था की ताकत केवल उसके अधिकारों से नहीं आती, बल्कि उसकी निष्पक्षता और जनता के विश्वास से भी आती है। अगर नागरिकों को किसी संस्था के फैसले पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं होगा या सवाल पूछने वालों को ही समस्या मान लिया जाएगा, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन संस्थाओं की आलोचना और उनसे जवाब मांगना भी उतना ही जरूरी है।

जेन जी के विरोध प्रदर्शनों से भी जुड़ा संदेश

आज दुनिया के कई हिस्सों में जेन जी यानी युवा पीढ़ी सरकारों और संस्थाओं से सवाल कर रही है। रोजगार, महंगाई, भ्रष्टाचार, असमानता, नागरिक अधिकारों और सरकारी नीतियों जैसे मुद्दों पर युवाओं का विरोध सामने आ रहा है। मुरलीधर के विचारों के संदर्भ में देखा जाए तो असहमति लोकतंत्र का दुश्मन नहीं है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और सवालों के लिए जगह होनी चाहिए। सरकारों के सामने चुनौती यह है कि वे हर असहमति को खतरे के रूप में देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद सवाल को समझें और जवाब दें।

सवाल दबेंगे तो लोकतंत्र मजबूत नहीं, कमजोर होगा

पूरी बातचीत का सबसे बड़ा संदेश यही निकलता है कि लोकतंत्र में नागरिकों का सवाल पूछना व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह नहीं है। बल्कि सवाल लोकतंत्र को जीवित रखते हैं। जब नागरिक पूछते हैं कि सरकार ने यह फैसला क्यों लिया, अदालत पूछती है कि कानून का पालन हुआ या नहीं, पत्रकार सत्ता से जवाब मांगते हैं और युवा अपनी समस्याओं को लेकर सड़कों पर आवाज उठाते हैं, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था सक्रिय रहती है। समस्या सवालों में नहीं, बल्कि सवालों को दबाने की कोशिश में हो सकती है।

‘डर के बिना सवाल’ ही लोकतंत्र की असली पहचान

न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर के विचारों को एक लाइन में समझें तो संदेश सीधा है—लोकतंत्र में सत्ता से सवाल करना नागरिक का अधिकार है, अपराध नहीं। किसी व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान दिलाना उसे कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाने की कोशिश हो सकती है। इसी तरह युद्ध के बीच बच्चों की जान, भूख, इलाज और शिक्षा का सवाल किसी राजनीतिक पक्ष से ऊपर मानवीय सवाल है। एक स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां नागरिक सवाल कर सकें, पत्रकार सवाल उठा सकें, अदालतें स्वतंत्र होकर फैसला दे सकें और सत्ता आलोचना को सुनने की क्षमता रखे। यही वह रास्ता है जिससे संस्थाओं में जनता का भरोसा मजबूत होता है और लोकतंत्र केवल चुनाव की व्यवस्था न रहकर वास्तव में जनता की आवाज और अधिकारों की व्यवस्था बनता है।

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