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₹72 का कच्चा तेल, फिर भी ₹100 का पेट्रोल… सैशे से छंटनी तक… महंगाई का कहर; जनता को राहत कब?

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 1 जुलाई 2026

महंगाई अब सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था को जकड़ रही है

आज भारत में महंगाई केवल दाल, आटा, चावल और सब्जियों तक सीमित नहीं रह गई है। इसका असर अब आम आदमी की पूरी जिंदगी पर दिखाई दे रहा है। सुबह घर से निकलने से लेकर रात तक हर खर्च पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो चुका है। पेट्रोल-डीजल महंगा है, गैस सिलेंडर महंगा है, दवाइयां महंगी हैं, बच्चों की पढ़ाई महंगी है, बस और ऑटो का किराया बढ़ गया है और रोजमर्रा के इस्तेमाल का सामान भी लगातार महंगा होता जा रहा है। यही वजह है कि अब हर परिवार अपने खर्चों की नई सूची बना रहा है। पहले जो सामान बिना सोचे खरीद लिया जाता था, अब उसे खरीदने से पहले कई बार सोचना पड़ रहा है। लोग बड़ी पैकिंग छोड़कर छोटे सैशे खरीद रहे हैं, महंगे ब्रांड की जगह सस्ते विकल्प तलाश रहे हैं और कई बार जरूरी सामान खरीदने को भी अगले महीने तक टाल रहे हैं। यह बदलाव केवल गरीब परिवारों में नहीं बल्कि मध्यम वर्ग में भी साफ दिखाई दे रहा है।

जब कच्चा तेल सस्ता है, तो पेट्रोल अब भी इतना महंगा क्यों है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल तक आ चुकी है, फिर भी भारत में पेट्रोल करीब 100 रुपये प्रति लीटर क्यों बिक रहा है? यह वही देश है जहां कुछ वर्ष पहले सरकार कहती थी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने के कारण पेट्रोल की कीमतें बढ़ रही हैं। लेकिन अब जब कच्चा तेल काफी नीचे आ चुका है, तब भी आम आदमी को राहत नहीं मिली। कोरोना महामारी के दौरान तो कच्चे तेल की कीमतें कई बार 40 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे चली गई थीं, फिर भी भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वैसी राहत देखने को नहीं मिली जिसकी जनता उम्मीद कर रही थी। आज आम आदमी का सवाल बिल्कुल सीधा है—अगर कच्चा तेल सस्ता है तो उसका फायदा आखिर किसे मिल रहा है? जनता को क्यों नहीं?

इथेनॉल का प्रयोग… लेकिन जनता पर क्यों?

सरकार इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को भविष्य का ईंधन बता रही है। उसका कहना है कि इससे तेल आयात कम होगा, विदेशी मुद्रा बचेगी, किसानों की आय बढ़ेगी और प्रदूषण भी कम होगा। लेकिन दूसरी तरफ अब खुद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकार किया है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने की नीति अभी एक “चल रहा प्रयोग” है और इसके वास्तविक परिणाम अगले वर्ष अधिक स्पष्ट होंगे। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि यह अभी भी प्रयोग है, तो करोड़ों वाहन मालिक इस प्रयोग का हिस्सा क्यों बनाए जा रहे हैं? देशभर से कई वाहन मालिक माइलेज घटने, इंजन की क्षमता प्रभावित होने और रखरखाव का खर्च बढ़ने जैसी शिकायतें कर रहे हैं। भले ही सरकार इन शिकायतों को स्वीकार न करे, लेकिन जब किसी नीति का असर सीधे करोड़ों लोगों की जेब पर पड़ रहा हो, तब उसकी व्यापक और पारदर्शी समीक्षा होना जरूरी है।

महंगाई ने कंपनियों की कमर भी तोड़ दी है

महंगाई केवल आम आदमी की समस्या नहीं रह गई है। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां भी इसके दबाव में हैं। साबुन, शैम्पू, डिटर्जेंट, टूथपेस्ट और रोजमर्रा का सामान बनाने वाली कंपनियां अब खुलकर मान रही हैं कि ग्राहक पहले की तरह खरीदारी नहीं कर रहे। कच्चे तेल की कीमतों, पैकेजिंग, प्लास्टिक, ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत में लगातार वृद्धि ने कंपनियों का खर्च बढ़ा दिया है। ऐसे में वे कीमतें कम नहीं कर पा रही हैं। दूसरी तरफ ग्राहक महंगे उत्पाद खरीदने से बच रहा है। नतीजा यह है कि कंपनियां छोटी पैकिंग, डिस्काउंट और ऑफर के जरिए ग्राहकों को बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती। अगर लोगों की आय नहीं बढ़ेगी और महंगाई इसी तरह बढ़ती रही, तो बाजार की रफ्तार भी धीमी पड़ती जाएगी।

शेयर बाजार, निवेश और उद्योग भी दबाव में हैं

महंगाई का असर केवल दुकानों तक नहीं बल्कि निवेश की दुनिया तक पहुंच चुका है। विदेशी निवेशक लगातार भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई है। उद्योगों की लागत बढ़ रही है, मुनाफा घट रहा है और निवेशक अधिक सुरक्षित बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका सीधा असर नई फैक्ट्रियों, नए निवेश और रोजगार के अवसरों पर पड़ता है। जब उद्योग विस्तार नहीं करेंगे, तो नई नौकरियां भी कम पैदा होंगी। इसका सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को उठाना पड़ेगा।

रोजगार का संकट और गहराता जा रहा है

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, लेकिन आज वही सबसे बड़ी चिंता भी बनती जा रही है। आईटी, मैन्युफैक्चरिंग और कई अन्य क्षेत्रों में हजारों नौकरियां खत्म हुई हैं। उनकी जगह कम वेतन और अस्थायी गिग जॉब्स तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें न नौकरी की सुरक्षा है और न भविष्य की कोई गारंटी। दूसरी ओर, शिक्षा क्षेत्र में लाखों शिक्षकों के पद खाली हैं। निजी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षक लगातार नौकरी छोड़ रहे हैं क्योंकि काम बढ़ रहा है लेकिन वेतन और सुविधाएं नहीं। बैंकिंग क्षेत्र में भी कर्मचारियों के लगातार इस्तीफे चिंता का विषय बन चुके हैं। जब रोजगार असुरक्षित होगा, तब लोगों की खरीदने की क्षमता भी घटेगी और इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा।

महंगाई सबसे पहले आम आदमी की जेब पर हमला करती है

महंगाई का सबसे बड़ा असर उस परिवार पर पड़ता है जिसकी आय सीमित होती है। जब रसोई का खर्च बढ़ जाता है, तो सबसे पहले कपड़े, जूते, मोबाइल, कॉस्मेटिक्स और दूसरी जरूरतों पर खर्च कम होता है। लोग घूमना-फिरना कम कर देते हैं। नए वाहन खरीदने का फैसला टाल देते हैं। घर बनाने या मरम्मत कराने की योजना भी आगे बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि महंगाई धीरे-धीरे पूरे बाजार को कमजोर करने लगती है। जब ग्राहक कम खरीदता है, तो कंपनियों की बिक्री घटती है। बिक्री घटती है तो उत्पादन कम होता है और अंत में रोजगार पर असर पड़ता है। यही महंगाई का सबसे खतरनाक चक्र है।

अब राहत की जरूरत है, केवल दावों की नहीं

आज देश को केवल बड़े आर्थिक दावों की नहीं, बल्कि आम आदमी को राहत देने वाली नीतियों की जरूरत है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता है, तो उसका लाभ जनता तक पहुंचना चाहिए। यदि इथेनॉल नीति लागू की जा रही है, तो उसके फायदे और नुकसान दोनों पूरी पारदर्शिता से देश के सामने रखे जाने चाहिए। यदि महंगाई लगातार लोगों की आय को खा रही है, तो सरकार को ऐसे कदम उठाने होंगे जिससे लोगों की जेब में बचत बढ़े, बाजार में खरीदारी बढ़े और उद्योगों को भी नई ऊर्जा मिले।

अर्थव्यवस्था की असली ताकत जनता की जेब होती है

किसी भी देश की आर्थिक मजबूती केवल जीडीपी, शेयर बाजार या सरकारी रिपोर्टों से नहीं मापी जाती। उसकी असली ताकत इस बात से तय होती है कि आम नागरिक कितनी आसानी से अपना घर चला पा रहा है, कितनी बचत कर पा रहा है और अपने बच्चों के भविष्य के लिए कितना विश्वास महसूस कर रहा है। यदि पेट्रोल महंगा रहेगा, महंगाई बढ़ती रहेगी, नौकरियां असुरक्षित होंगी और लोगों की खरीदने की क्षमता घटती जाएगी, तो विकास के बड़े-बड़े आंकड़े भी आम आदमी की जिंदगी में खुशी नहीं ला पाएंगे। इसलिए अब समय आ गया है कि आर्थिक नीतियों का सबसे बड़ा पैमाना सरकारी दावे नहीं, बल्कि जनता की जेब और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी बने।

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