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इज़रायल पर चुप्पी भविष्य में भारत को नहीं बचा पाएगी: जस्टिस एस. मुरलीधर

अंतरराष्ट्रीय | मानवाधिकार | पश्चिम एशिया | ABC NATIONAL NEWS | 1 जुलाई 2026

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और गाज़ा में मानवीय संकट को लेकर भारत की विदेश नीति पर अब देश के वरिष्ठ न्यायविदों की ओर से भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं। ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश तथा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) द्वारा गठित स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस. मुरलीधर ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में भारत सरकार से अपनी विदेश नीति की पुनर्समीक्षा करने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के उपलब्ध साक्ष्यों के बावजूद दुनिया चुप रहती है, तो भविष्य में वह स्वयं को नैतिक रूप से सही नहीं ठहरा पाएगी।

जस्टिस मुरलीधर ने कहा, “मैं वास्तव में चाहता हूँ कि भारत सरकार अपनी विदेश नीति पर फिर से विचार करे और खुद से पूछे कि क्या हम मानवता के बुनियादी सिद्धांतों को नजरअंदाज होने देंगे? यदि हमारे सामने गंभीर सबूत मौजूद हैं और फिर भी हम कार्रवाई नहीं करते, तो भविष्य में हम खुद को नैतिक रूप से सही नहीं ठहरा पाएंगे।”

उन्होंने उन देशों से भी अपील की जो इज़रायल को हथियार उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम उन देशों से भी अपील कर रहे हैं जो इज़रायल को हथियार सप्लाई करते हैं और भारत भी उनमें शामिल है कि वे ऐसा करना बंद करें।”

जस्टिस मुरलीधर का यह बयान ऐसे समय आया है जब गाज़ा में इज़रायली सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस जारी है। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियां, अनेक मानवाधिकार संगठन और कई देश गाज़ा में बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत, अस्पतालों, स्कूलों और राहत शिविरों पर हमलों तथा मानवीय संकट को लेकर गंभीर चिंता जता चुके हैं। दूसरी ओर, इज़रायल का कहना है कि उसकी सैन्य कार्रवाई 7 अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद आत्मरक्षा के अधिकार के तहत है और उसका निशाना हमास का सैन्य ढांचा है, न कि आम नागरिक।

जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि यदि इतने स्पष्ट आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समुदाय प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों और वैश्विक न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होंगे। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि सार्वभौमिक सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए।

उन्होंने कुलभूषण जाधव मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि जब पाकिस्तान में उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिली थी, तब भारत स्वयं अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) गया था। इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की बात आती है, तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था या मंच से उठ रहा है।

पिछले महीनों में पश्चिम एशिया का संकट केवल गाज़ा तक सीमित नहीं रहा। इज़रायल और ईरान के बीच सीधे मिसाइल और ड्रोन हमलों ने पूरे क्षेत्र को व्यापक संघर्ष के मुहाने पर ला खड़ा किया। इन हमलों में दोनों देशों में जान-माल का नुकसान हुआ और क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी। इससे वैश्विक कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

भारत अब तक इस पूरे संकट पर संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाता रहा है। एक ओर उसने आतंकवाद की निंदा की है और इज़रायल की सुरक्षा चिंताओं को स्वीकार किया है, वहीं दूसरी ओर गाज़ा में तत्काल मानवीय सहायता, नागरिकों की सुरक्षा, युद्धविराम और दो-राष्ट्र समाधान का भी लगातार समर्थन किया है। ऐसे में जस्टिस एस. मुरलीधर का बयान इस बहस को नया आयाम देता है कि क्या भारत को अपने रणनीतिक हितों के साथ-साथ मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रश्नों पर भी अधिक मुखर भूमिका निभानी चाहिए।

जस्टिस मुरलीधर की टिप्पणी केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग के अध्यक्ष के रूप में उनके अनुभव और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून की समझ पर आधारित हस्तक्षेप के रूप में देखी जा रही है। उनका मूल संदेश स्पष्ट है—यदि दुनिया मानवाधिकार उल्लंघनों के गंभीर आरोपों पर भी राजनीतिक और सामरिक हितों के कारण चुप रहती है, तो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था की नैतिक विश्वसनीयता को बचा पाना बेहद कठिन होगा।

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