ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 जून 2026
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि नागरिक समाज, स्वतंत्र संस्थाओं और सरकार से सवाल पूछने वाली आवाज़ों से भी मजबूत होता है। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा FCRA नियमों में किए गए ताजा संशोधन एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या भारत धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ रहा है जहां असहमति को नियंत्रित करना शासन का प्रमुख उद्देश्य बनता जा रहा है?
गृह मंत्रालय ने विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए नए नियम लागू किए हैं। अब उन्हें अपने सभी सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी सरकार को देनी होगी, अपनी गतिविधियों का दायरा पहले से घोषित करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात — राजनीतिक प्रकृति की सामग्री से दूरी बनानी होगी।
सरकार इसे पारदर्शिता और जवाबदेही का कदम बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में यह पारदर्शिता का मामला है या फिर आलोचनात्मक आवाज़ों पर नियंत्रण का नया तंत्र?
भारत में पिछले एक दशक के दौरान हजारों NGOs के FCRA लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं। मानवाधिकार, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर काम करने वाले अनेक संगठनों को पहले ही वित्तीय और प्रशासनिक दबावों का सामना करना पड़ा है। अब सोशल मीडिया गतिविधियों को भी सरकारी निगरानी के दायरे में लाकर संदेश साफ दिखाई देता है—सिर्फ पैसा नहीं, आपकी आवाज़ भी निगरानी में रहेगी।
सबसे बड़ा सवाल “राजनीतिक कंटेंट” की परिभाषा को लेकर है। क्या बेरोजगारी पर रिपोर्ट प्रकाशित करना राजनीतिक गतिविधि है? क्या पर्यावरणीय विनाश पर सवाल उठाना राजनीतिक है? क्या किसी सरकारी नीति की आलोचना करना राजनीतिक माना जाएगा? यदि इसका उत्तर “हाँ” है तो फिर लोकतंत्र और नियंत्रित लोकतंत्र के बीच की रेखा बहुत पतली रह जाती है।
सरकार कहती है कि विदेशी धन का इस्तेमाल राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। यह तर्क अपनी जगह उचित लग सकता है। लेकिन लोकतंत्र में नागरिक समाज की भूमिका केवल सेवा कार्य करना नहीं होती। उसका काम सरकारों को जवाबदेह बनाना भी होता है। यदि हर आलोचना को राजनीतिक गतिविधि मान लिया जाए तो नागरिक समाज केवल राहत सामग्री बांटने वाली संस्थाओं तक सीमित होकर रह जाएगा।
विडंबना यह है कि सोशल मीडिया को लोकतंत्र का नया सार्वजनिक चौक कहा जाता है। आज जनहित याचिकाओं से लेकर सड़क सुरक्षा, महिला अधिकार, पर्यावरण संरक्षण और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियानों तक, कई महत्वपूर्ण मुद्दे सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनते हैं। ऐसे में NGOs के डिजिटल संवाद पर बढ़ती निगरानी स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंता पैदा करती है।
यह भी सच है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी हस्तक्षेप को लेकर सरकार की चिंताएं पूरी तरह निराधार नहीं हैं। किसी भी संप्रभु राष्ट्र को यह अधिकार है कि वह विदेशी धन के प्रवाह और उसके उपयोग की निगरानी करे। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन भी उतना ही आवश्यक है।
यही वह बिंदु है जहां आलोचक इन नए नियमों को “अघोषित इमरजेंसी” जैसे शब्दों से जोड़ने लगे हैं। उनका आरोप है कि असहमति की जगह लगातार सिकुड़ रही है और संस्थागत निगरानी का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि आपातकाल जैसी ऐतिहासिक तुलना सावधानी से की जानी चाहिए, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि लोकतंत्र की गुणवत्ता का आकलन इस बात से होता है कि सरकार अपने आलोचकों के साथ कैसा व्यवहार करती है।
आज प्रश्न केवल NGOs का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत में नागरिक समाज स्वतंत्र रूप से काम कर पाएगा? क्या सरकार की आलोचना और राष्ट्रविरोध के बीच अंतर बना रहेगा? और क्या लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार सुरक्षित रहेगा?
FCRA के नए नियमों ने इन सवालों को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। आने वाले महीनों में अदालतें, नागरिक समाज और राजनीतिक दल इस बहस को किस दिशा में ले जाते हैं, उस पर लोकतांत्रिक विमर्श का भविष्य काफी हद तक निर्भर करेगा।




