ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 जून 2026
भारतीय राजनीति में दलबदल अब कोई असाधारण घटना नहीं रह गई है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह निर्वाचित सांसदों और विधायकों के बड़े समूह अपनी पार्टियां छोड़कर सत्ता पक्ष के साथ खड़े होते दिखाई दे रहे हैं, उसने लोकतंत्र और जनादेश की पवित्रता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों की संभावित बगावत और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के बड़े समूह के अलग होने की घटनाएं इस प्रवृत्ति का नया उदाहरण हैं।
विडंबना यह है कि संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, ऐसे राजनीतिक अवसरवाद को रोकने के लिए बनाई गई थी। लेकिन आज वही कानून राजनीतिक इंजीनियरिंग का उपकरण बनता दिखाई दे रहा है। जिस प्रावधान का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता और जनादेश की रक्षा करना था, उसी के भीतर मौजूद “विलय” (Merger) का अपवाद दलबदलुओं के लिए सुरक्षा कवच बन गया है।
2003 में संविधान संशोधन के जरिए “स्प्लिट” यानी एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने पर मिलने वाली छूट को समाप्त कर दिया गया था। माना गया था कि इससे खरीद-फरोख्त और राजनीतिक अस्थिरता पर रोक लगेगी। लेकिन राजनीतिक दलों ने जल्द ही इसका नया रास्ता खोज लिया। अब दो-तिहाई सदस्यों के समूह को साथ लेकर दलबदल किया जाता है और उसे “विलय” का नाम दे दिया जाता है। नतीजा यह है कि कानून की आत्मा बची नहीं, केवल उसकी शब्दावली बची रह गई है।
महाराष्ट्र में शिवसेना का मामला इसका ताजा उदाहरण है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एक साथ अलग होने की चर्चा है। यदि उनकी संख्या लोकसभा में पार्टी के कुल सांसदों के दो-तिहाई के बराबर होती है, तो वे दलबदल विरोधी कानून से बचने का दावा कर सकते हैं। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल संसदीय दल का अलग होना ही विलय कहलाता है? सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि केवल विधायी दल का अलग होना पर्याप्त नहीं है; मूल राजनीतिक दल का भी विलय होना आवश्यक है।
इसी तरह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर उठी बगावत ने भी राजनीतिक हलकों को चौंकाया है। बड़ी संख्या में सांसदों द्वारा अलग राह चुनना केवल पार्टी का आंतरिक संकट नहीं है, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक विश्वास पर भी चोट है जिसके आधार पर मतदाताओं ने उन्हें चुना था। जनता किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसकी पार्टी, विचारधारा और चुनावी वादों को भी वोट देती है। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद राजनीतिक निष्ठा बदल देना मतदाता के विश्वास के साथ छल के समान है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन घटनाओं का सीधा लाभ सत्ता पक्ष को मिलता दिखाई देता है। लोकसभा और राज्यसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की संख्या लगातार बढ़ रही है। संवैधानिक संशोधनों के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत लोकतंत्र में इसलिए रखा गया था ताकि व्यापक राजनीतिक सहमति सुनिश्चित हो सके। लेकिन यदि यह संख्या चुनावी जनादेश से नहीं बल्कि लगातार हो रहे दलबदल से हासिल की जाती है, तो संविधान निर्माताओं की मूल भावना कमजोर पड़ जाती है।
आज स्थिति यह है कि दलबदल विरोधी कानून का भय लगभग समाप्त हो चुका है। राजनीतिक दलों को भरोसा है कि यदि पर्याप्त संख्या जुटा ली जाए तो कानून से बचने का रास्ता मिल जाएगा। दूसरी ओर, कई संवैधानिक प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय लंबित हैं, जिसका लाभ राजनीतिक खिलाड़ी उठा रहे हैं। स्पीकर और सभापति भी अक्सर ऐसे मामलों में त्वरित निर्णय लेने के बजाय समय लेते हैं, जिससे दलबदल करने वालों को राजनीतिक लाभ मिल जाता है।
लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। यह जनादेश, जवाबदेही और राजनीतिक नैतिकता पर भी आधारित है। यदि चुने हुए प्रतिनिधि चुनाव के बाद अपनी राजनीतिक पहचान बदलने लगें और उसे संवैधानिक वैधता का आवरण मिल जाए, तो जनता का लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होगा।
भारत को आज दल-बदल विरोधी कानून की नई समीक्षा की आवश्यकता है। या तो “विलय” की परिभाषा को और स्पष्ट बनाया जाए, या फिर ऐसे मामलों में जनता के पास दोबारा जाने की व्यवस्था हो। आखिरकार सांसद और विधायक जनता के प्रतिनिधि हैं, किसी राजनीतिक सौदेबाजी के मोहरे नहीं।
दलबदल को विलय का नाम देने से वह लोकतांत्रिक नहीं हो जाता। लोकतंत्र की असली ताकत जनादेश के सम्मान में है, न कि उसकी कानूनी व्याख्याओं में छिपे रास्ते खोजने में।




