राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 जून 2026
देश में पुलिसिंग और निगरानी व्यवस्था को तकनीक के जरिए और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को ‘अभिज्ञान’ (Abhigyan) नामक एक नए मोबाइल एप्लीकेशन का शुभारंभ किया, जिसके जरिए पुलिसकर्मी सड़क, बाजार, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर संदिग्ध व्यक्ति के अंगूठे के निशान लेकर कुछ ही सेकंड में उसका आपराधिक रिकॉर्ड जांच सकेंगे।
यह ऐप राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा विकसित किया गया है और इसे देश के राष्ट्रीय स्वचालित फिंगरप्रिंट पहचान तंत्र (NAFIS) से जोड़ा गया है। इस डेटाबेस में वर्तमान में लगभग 1.3 करोड़ अपराधियों, संदिग्धों और दोषसिद्ध व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड मौजूद हैं।
नई व्यवस्था के तहत पुलिसकर्मियों को पोर्टेबल फिंगरप्रिंट स्कैनर उपलब्ध कराए जाएंगे। किसी भी व्यक्ति का अंगूठा स्कैन करते ही उसकी जानकारी सीधे राष्ट्रीय डेटाबेस से मिलान की जाएगी और यदि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित है या वह किसी मामले में वांछित है तो उसकी जानकारी तुरंत मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाएगी।
गृह मंत्री अमित शाह ने नई प्रणाली को “ग्राउंड लेवल पुलिसिंग में क्रांतिकारी बदलाव” बताते हुए कहा कि अपराधियों की पहचान और गिरफ्तारी अब पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज और प्रभावी होगी। उनका कहना था कि तकनीक आधारित पुलिसिंग से अपराध नियंत्रण और जांच प्रक्रिया दोनों मजबूत होंगी।
हालांकि इस नई व्यवस्था के सामने आते ही निजता, नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को लेकर बहस भी शुरू हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क पर किसी व्यक्ति को रोककर उसका बायोमेट्रिक डेटा लेना एक संवेदनशील विषय है और इसके लिए स्पष्ट कानूनी दिशानिर्देश आवश्यक होंगे। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या केवल संदेह के आधार पर किसी नागरिक के फिंगरप्रिंट लिए जा सकेंगे और यदि हां, तो उसके अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के कई देशों में ऐसी तकनीकों का उपयोग होता है, लेकिन वहां इसके साथ मजबूत डेटा सुरक्षा कानून और स्वतंत्र निगरानी तंत्र भी मौजूद रहते हैं। भारत में डिजिटल निगरानी और व्यक्तिगत डेटा संरक्षण को लेकर पहले से ही बहस चल रही है। ऐसे में अभिज्ञान ऐप का इस्तेमाल किस दायरे में होगा और उसकी निगरानी कौन करेगा, यह महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है।
सरकार का दावा है कि यह प्रणाली केवल अपराध नियंत्रण और जांच में सहायता के लिए विकसित की गई है तथा इसका उपयोग कानून के निर्धारित प्रावधानों के तहत ही किया जाएगा। लेकिन नागरिक अधिकार समूहों का मानना है कि तकनीक जितनी शक्तिशाली होती है, उसके दुरुपयोग की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है।
एक ओर जहां पुलिस और जांच एजेंसियां इसे अपराधियों के खिलाफ बड़ा हथियार मान रही हैं, वहीं दूसरी ओर यह व्यवस्था आने वाले दिनों में निजता बनाम सुरक्षा की बहस को और तेज कर सकती है।
फिलहाल इतना तय है कि डिजिटल पुलिसिंग के नए दौर में अब केवल पहचान पत्र ही नहीं, बल्कि आपकी उंगलियों के निशान भी आपकी पहचान और इतिहास का पूरा ब्योरा सामने ला सकते हैं। भारत की कानून व्यवस्था में यह बदलाव तकनीकी दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है, लोकतांत्रिक और संवैधानिक दृष्टि से उतना ही बड़ा विमर्श भी पैदा करने वाला है।




