अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग/वॉशिंगटन | 6 अगस्त 2026
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच चल रही आर्थिक और तकनीकी लड़ाई ने एक बार फिर नया मोड़ ले लिया है। अमेरिका की ओर से चीनी कंपनियों और ड्रोन पर हाल में लगाए गए प्रतिबंधों के जवाब में चीन ने भी पलटवार करते हुए कई बड़े कदमों का ऐलान कर दिया है। बीजिंग ने अमेरिका को भेजे जाने वाले ड्रोन, उनके महत्वपूर्ण कलपुर्जों और ऐसी तकनीकों के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा करने का फैसला किया है जिनका इस्तेमाल आम नागरिक जरूरतों के साथ-साथ सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है। इसके साथ ही चीन ने छह अमेरिकी संस्थाओं के साथ कारोबारी लेनदेन पर भी रोक लगा दी है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका ने हाल में जो कदम उठाए हैं, उनसे चीन के वैध अधिकारों और आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचा है और ये फैसले दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बनी सहमति की भावना के भी खिलाफ हैं। बीजिंग ने साफ शब्दों में कहा है कि उसने जवाबी कार्रवाई मजबूरी में की है और यदि अमेरिका आगे चीन के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाता है तो चीन भी अतिरिक्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।
चीन की इस जवाबी कार्रवाई में सबसे ज्यादा ध्यान ड्रोन पर लगाए गए नए निर्यात नियंत्रण पर है। अब अमेरिका जाने वाले कुछ ड्रोन, उनके महत्वपूर्ण पुर्जे और उनसे जुड़ी संवेदनशील तकनीक सामान्य तरीके से निर्यात नहीं की जा सकेगी। चीन ऐसे निर्यात की हर मामले के आधार पर अलग-अलग समीक्षा करेगा। खास तौर पर उन चीजों पर नजर रहेगी जिन्हें ‘डुअल-यूज’ यानी दोहरे इस्तेमाल वाली तकनीक माना जाता है। आसान भाषा में समझें तो ऐसी तकनीक जिसका इस्तेमाल खेतों में सर्वे करने, तस्वीरें लेने, उद्योगों की निगरानी या दूसरे सामान्य कामों के लिए किया जा सकता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर वही तकनीक सैन्य निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने या रक्षा से जुड़े कामों में भी इस्तेमाल हो सकती है। आज ड्रोन केवल शादी की वीडियो रिकॉर्डिंग या खेतों में दवा छिड़कने का साधन नहीं रह गए हैं। दुनिया भर के युद्धों ने दिखाया है कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी आधुनिक युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण हथियार और निगरानी उपकरण बन सकते हैं। यही वजह है कि अमेरिका और चीन दोनों अब इस तकनीक को केवल व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देख रहे हैं।
चीन का यह कदम अचानक नहीं आया है। इसके पीछे अमेरिका की हालिया कार्रवाइयां हैं। अमेरिकी Federal Communications Commission ने चीनी ड्रोन के आयात को लेकर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए हैं। दूसरी तरफ अमेरिका के Department of Homeland Security ने 43 चीनी कंपनियों को Uyghur Forced Labor Prevention Act से जुड़ी Entity List में शामिल किया है। अमेरिका का कहना है कि वह ऐसे उत्पादों के आयात को रोकना चाहता है जिनके उत्पादन में कथित तौर पर जबरन श्रम का इस्तेमाल हुआ हो। चीन इन आरोपों और प्रतिबंधों का लगातार विरोध करता रहा है। बीजिंग का कहना है कि अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार और दूसरे मुद्दों के नाम पर चीनी कंपनियों को निशाना बना रहा है और चीन की तकनीकी तथा औद्योगिक प्रगति को रोकने की कोशिश कर रहा है। इसी टकराव के बीच चीन ने अब अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब देते हुए अपने पास मौजूद निर्यात नियंत्रण और आर्थिक प्रतिबंधों के हथियार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि बीजिंग ने कार्रवाई करते समय संयम बरता है। उसका कहना है कि वह अमेरिका के साथ टकराव को अनियंत्रित रूप से बढ़ाना नहीं चाहता, लेकिन अपने आर्थिक और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। चीन ने वॉशिंगटन से कहा है कि वह बीजिंग के खिलाफ उठाए गए हालिया प्रतिबंधात्मक कदम वापस ले और उन कार्रवाइयों को बंद करे जिन्हें चीन ‘गलत’ मानता है। साथ ही चेतावनी भी दी गई है कि यदि अमेरिका ने आगे और प्रतिबंध लगाए तो चीन की तरफ से भी नए जवाबी कदम आ सकते हैं। यानी फिलहाल दोनों देशों के बीच दरवाजा बातचीत के लिए बंद नहीं हुआ है, लेकिन संदेश बिल्कुल साफ है—एक देश पाबंदी लगाएगा तो दूसरा भी चुप नहीं बैठेगा।
यह पूरा घटनाक्रम इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सितंबर में अमेरिका जाने की संभावना है। इससे पहले मई में बीजिंग में शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकातों के बाद दोनों देशों के रिश्तों में कुछ नरमी के संकेत दिखाई दिए थे। उम्मीद जगी थी कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक और तकनीकी तनाव को बातचीत के जरिए कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं। लेकिन ताजा घटनाक्रम बता रहा है कि ऊपर से बातचीत और कूटनीतिक गर्मजोशी के बावजूद जमीन पर अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। अब सवाल यह है कि सितंबर की संभावित मुलाकात से पहले दोनों देश तनाव कम करने का रास्ता तलाशेंगे या एक-दूसरे पर प्रतिबंध और जवाबी प्रतिबंध लगाने का सिलसिला और तेज होगा।
दरअसल अमेरिका और चीन की मौजूदा लड़ाई अब पुराने जमाने के व्यापार युद्ध से बहुत आगे निकल चुकी है। कभी दोनों देशों के बीच चर्चा मुख्य रूप से इस बात पर होती थी कि किस सामान पर कितना टैरिफ लगाया गया, व्यापार घाटा कितना है और चीन से अमेरिका कितना सामान खरीदता है। लेकिन अब मुकाबला भविष्य की अर्थव्यवस्था पर कब्जे का है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, अत्याधुनिक कंप्यूटर चिप, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रोबोटिक्स, ड्रोन, दुर्लभ खनिज और रक्षा से जुड़ी तकनीक इस प्रतिस्पर्धा के सबसे बड़े मैदान बन चुके हैं। अमेरिका नहीं चाहता कि संवेदनशील चीनी तकनीक उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बने, जबकि चीन नहीं चाहता कि अमेरिकी प्रतिबंध उसकी कंपनियों और तकनीकी प्रगति को दुनिया के सबसे बड़े बाजारों से बाहर कर दें। इसलिए दोनों देशों के बीच हर नया प्रतिबंध अब केवल आर्थिक फैसला नहीं रहता, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की लड़ाई का हिस्सा बन जाता है।
ड्रोन के मामले में यह संघर्ष और भी दिलचस्प है क्योंकि चीन दुनिया की ड्रोन सप्लाई चेन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ड्रोन के साथ कैमरे, बैटरियां, मोटर, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और दूसरे महत्वपूर्ण उपकरणों का विशाल औद्योगिक नेटवर्क जुड़ा हुआ है। ऐसे में यदि अमेरिका और चीन एक-दूसरे पर लगातार पाबंदियां बढ़ाते हैं तो असर केवल चीनी या अमेरिकी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। उन देशों और कंपनियों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है जो इन दोनों अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े वैश्विक सप्लाई नेटवर्क का हिस्सा हैं। तकनीक की दुनिया में एक देश में बना छोटा-सा पुर्जा दूसरे देश में तैयार होने वाले पूरे उत्पाद के लिए जरूरी हो सकता है। यही कारण है कि निर्यात नियंत्रण का असर कई बार सामान्य व्यापार प्रतिबंध से कहीं ज्यादा दूर तक जाता है।
इस टकराव का एक और पहलू भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका पिछले कुछ वर्षों से अपनी महत्वपूर्ण तकनीकी सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ चीन भी उन क्षेत्रों में अपनी पकड़ को रणनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ा रहा है जहां उसका उत्पादन या सप्लाई नेटवर्क मजबूत है। इसका मतलब यह है कि दोनों देश धीरे-धीरे ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं जहां व्यापार केवल कीमत और गुणवत्ता से तय नहीं होगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि उत्पाद किस देश से आया है, उसका इस्तेमाल किस क्षेत्र में हो सकता है और वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कितना संवेदनशील है। यह बदलाव वैश्वीकरण के उस पुराने मॉडल को भी चुनौती दे रहा है जिसमें कंपनियां दुनिया में जहां सबसे सस्ता और बेहतर उत्पादन मिलता था, वहीं से सामान खरीदती थीं।
फिलहाल चीन के फैसले का सबसे साफ संदेश वॉशिंगटन के लिए है—बीजिंग अब अमेरिकी प्रतिबंधों को केवल बयान जारी करके स्वीकार करने के मूड में नहीं है। अमेरिका चीनी कंपनियों और तकनीक पर नियंत्रण बढ़ाएगा तो चीन भी अमेरिकी संस्थाओं और संवेदनशील तकनीकी सप्लाई पर अपनी ताकत का इस्तेमाल करेगा। इसके बावजूद दोनों देशों के लिए पूरी तरह आर्थिक संबंध तोड़ना आसान नहीं है, क्योंकि अमेरिका और चीन आज भी एक-दूसरे के लिए बेहद महत्वपूर्ण बाजार और व्यापारिक साझेदार हैं। इसलिए आने वाले दिनों में दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि यह लड़ाई कहां तक जाती है। क्या सितंबर में संभावित शी जिनपिंग-अमेरिका संवाद तनाव कम करने का रास्ता खोलेगा, या ड्रोन से शुरू हुआ नया जवाबी दौर सेमीकंडक्टर, AI, रोबोटिक्स और दूसरी संवेदनशील तकनीकों तक और तेजी से फैलेगा? इतना तय है कि अमेरिका और चीन की यह खींचतान अब केवल दोनों देशों की कहानी नहीं रही—इसके फैसले दुनिया के बाजार, तकनीक और वैश्विक सप्लाई चेन की दिशा भी तय करेंगे।




