राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अगस्त 2026
छात्रों के प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल का मामला अब केवल पुलिस कार्रवाई या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद सबसे बुनियादी और गंभीर सवाल इसके कानूनी आधार को लेकर खड़ा हो गया है—दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पैलेट गन इस्तेमाल करने की इजाजत आखिर किसने दी? किस नियम के तहत दी? क्या दिल्ली पुलिस के पास ऐसा कोई स्टैंडिंग ऑर्डर मौजूद है जो भीड़ नियंत्रण के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति देता है? और यदि ऐसा कोई आदेश मौजूद नहीं है तो छात्रों के खिलाफ इस हथियार के कथित इस्तेमाल का कानूनी आधार आखिर क्या था? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वकील की ओर से रखी गई दलीलों ने इसी सवाल को बहस के केंद्र में ला दिया है।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि दिल्ली पुलिस के पुराने रिकॉर्ड और स्टैंडिंग ऑर्डर्स को खंगाला गया है। वकील ने दावा किया कि उन्होंने 1967 से लेकर अब तक के उपलब्ध स्टैंडिंग ऑर्डर्स पर गहन शोध किया, लेकिन ऐसा कोई स्टैंडिंग ऑर्डर नहीं मिला जिसमें पैलेट गन को भीड़ नियंत्रण के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का स्पष्ट उल्लेख हो। अदालत के सामने इसी आधार पर सवाल रखा गया कि यदि दिल्ली पुलिस के नियमों में पैलेट गन का स्पष्ट प्रावधान मौजूद नहीं है, तो प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ इसके कथित इस्तेमाल की अनुमति कहां से आई? यदि सरकार या पुलिस के पास कोई आदेश, अधिसूचना, SOP या अन्य वैधानिक प्रावधान मौजूद है तो उसे अदालत के सामने रखा जाना चाहिए। और यदि ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं है तो यह और भी गंभीर प्रश्न बन जाता है कि इतने संवेदनशील हथियार का इस्तेमाल किस अधिकारी के फैसले और किस कानूनी अधिकार के आधार पर किया गया।
सुनवाई में पैलेट गन के इस्तेमाल के इतिहास और इससे जुड़े सरकारी दिशा-निर्देशों का भी जिक्र हुआ। अदालत के सामने यह बात रखी गई कि पैलेट गन का इस्तेमाल पहले जम्मू-कश्मीर में सामने आया था। इसके बाद भीड़ नियंत्रण से जुड़े सरकारी स्तर के दिशा-निर्देश, 2011 की SOP और 2016 में इस विषय पर गठित उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों का उल्लेख किया गया। लेकिन यहां मूल सवाल फिर दिल्ली पुलिस पर आकर टिकता है। जम्मू-कश्मीर में किसी विशेष सुरक्षा परिस्थिति के लिए अपनाई गई व्यवस्था अपने-आप दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन पर लागू नहीं हो जाती। यदि दिल्ली पुलिस ने इसका इस्तेमाल किया तो उसके पास दिल्ली में लागू स्पष्ट कानूनी या प्रशासनिक अधिकार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में उठी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा यही है—वह दस्तावेज कहां है?
यह कोई मामूली तकनीकी सवाल नहीं है। पैलेट गन सामान्य लाठी, वाटर कैनन या बैरिकेडिंग जैसा भीड़ नियंत्रण का साधन नहीं मानी जा सकती। इससे निकलने वाले छर्रे शरीर के विभिन्न हिस्सों में गंभीर चोट पहुंचा सकते हैं और आंख में लगने की स्थिति में दृष्टि को स्थायी नुकसान पहुंचने का खतरा हो सकता है। इसलिए किसी भी नागरिक, विशेष रूप से प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ ऐसे साधन का इस्तेमाल यदि किया जाता है तो उसके पीछे स्पष्ट नियम, आवश्यकता, अनुपात और जवाबदेही होना बेहद जरूरी है। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपने जवानों की सुरक्षा करने का पूरा अधिकार है, लेकिन राज्य को मिली शक्ति का इस्तेमाल भी कानून के दायरे में ही होना चाहिए। पुलिस को बल प्रयोग का अधिकार होना और किसी भी तरह के बल प्रयोग की खुली छूट होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
इस पूरे विवाद को कुछ देर के लिए राजनीति से अलग रखकर देखा जाए तो सवाल हर परिवार से जुड़ जाता है। कल्पना कीजिए कि प्रदर्शनकारियों की उस भीड़ में आपका अपना बेटा या बेटी खड़ा है—वह परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, भर्ती में कथित अनियमितता या अपने भविष्य से जुड़े किसी मुद्दे को लेकर आवाज उठा रहा है। यदि भीड़ हिंसक हो जाती है तो पुलिस कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है, लेकिन क्या ऐसे हथियार का इस्तेमाल, जिससे किसी युवा की आंखों की रोशनी या शरीर का कोई हिस्सा स्थायी रूप से प्रभावित हो सकता है, बिना स्पष्ट और सार्वजनिक नियम के किया जा सकता है? यही वह प्रश्न है जिसे किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन या विरोध के चश्मे से देखने के बजाय नागरिक अधिकार और Rule of Law के सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि छात्र आंदोलन से जुड़े कई प्रदर्शनकारी पहले ही पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगा चुके हैं। आंदोलनकारियों की ओर से लाठीचार्ज, हिरासत, उत्पीड़न और अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए हैं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि प्रदर्शन स्थल पर उनकी ओर पैलेट गन तैनात की गई और फायरिंग में चोटें आईं। ये आरोप अपने-आप में अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं हैं और संबंधित पुलिस तथा सरकार का पक्ष और आधिकारिक रिकॉर्ड भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है और कानूनी अधिकार का प्रश्न अदालत के सामने उठ गया है, तब केवल आरोपों को खारिज कर देना पर्याप्त जवाब नहीं होगा। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या इस्तेमाल हुआ, किसके आदेश पर हुआ और किस नियम के तहत हुआ।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब उस “ऑर्डर” का है। यदि पैलेट गन इस्तेमाल करने की अनुमति किसी वरिष्ठ अधिकारी ने दी थी तो क्या वह आदेश लिखित था? यदि लिखित था तो उसे अदालत में पेश किया जा सकता है। यदि मौखिक आदेश था तो वह किस अधिकारी ने दिया? क्या उस अधिकारी के पास ऐसा आदेश देने की वैधानिक शक्ति थी? क्या मौके की परिस्थितियों का आकलन दर्ज किया गया था? क्या पैलेट गन इस्तेमाल करने से पहले कम नुकसान पहुंचाने वाले उपलब्ध विकल्प अपनाए गए थे? कितने राउंड चलाए गए? किस दिशा में चलाए गए? कितने लोग घायल हुए? कार्रवाई के बाद कोई आंतरिक समीक्षा हुई या नहीं? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि कार्रवाई कानून के दायरे में थी या उससे बाहर।
सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस का एक महत्वपूर्ण परिणाम भविष्य के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाने की जरूरत के रूप में भी सामने आया है। अदालत इस सवाल को देख रही है कि पैलेट गन जैसे साधन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए या नहीं और यदि किसी अत्यंत असाधारण परिस्थिति में इसकी अनुमति दी जाए तो उसकी सीमाएं क्या हों। यह केवल एक प्रदर्शन का सवाल नहीं है। अदालत द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जाने का असर भविष्य में दिल्ली सहित देश के दूसरे हिस्सों में होने वाले प्रदर्शनों और पुलिस की भीड़ नियंत्रण नीति पर भी पड़ सकता है।
ऐसे किसी प्रोटोकॉल में कई बुनियादी सवालों का उत्तर जरूरी होगा। पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति किस स्तर का अधिकारी दे सकता है? किन परिस्थितियों में इसे अंतिम विकल्प माना जाएगा? क्या उससे पहले चेतावनी देना अनिवार्य होगा? क्या वाटर कैनन, बैरिकेडिंग और अन्य कम नुकसान पहुंचाने वाले उपायों को आजमाना जरूरी होगा? क्या इस्तेमाल की वीडियोग्राफी होगी? प्रत्येक फायरिंग का रिकॉर्ड रखा जाएगा? किसी व्यक्ति को गंभीर चोट लगने पर स्वतंत्र जांच होगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या शांतिपूर्ण या मुख्य रूप से शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों के खिलाफ ऐसे हथियार का इस्तेमाल बिल्कुल प्रतिबंधित होना चाहिए? स्पष्ट नियम पुलिस को भी कानूनी अनिश्चितता से बचाएंगे और नागरिकों को भी मनमाने बल प्रयोग से सुरक्षा देंगे।
लेकिन भविष्य के लिए नियम बनाना उस दिन हुई कथित कार्रवाई के सवाल का जवाब नहीं हो सकता। यदि प्रदर्शनकारी छात्रों पर वास्तव में पैलेट गन इस्तेमाल की गई थी तो उस समय लागू कानून और आदेश की जांच अलग से जरूरी है। बाद में बनाया गया प्रोटोकॉल पहले हुई कार्रवाई को स्वतः वैध नहीं बना सकता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में उठे प्रश्न का सबसे सीधा उत्तर सरकारी रिकॉर्ड से ही आ सकता है—उस दिन क्या आदेश जारी हुआ था? किसने जारी किया था? किस प्रावधान के तहत जारी किया गया था?
यहां दिल्ली पुलिस और संबंधित सरकारी अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि उनके पास पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति देने वाला स्पष्ट स्टैंडिंग ऑर्डर, SOP, अधिसूचना या कोई दूसरा वैधानिक आधार मौजूद है तो उसे अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिए। इससे विवाद का बड़ा हिस्सा तथ्यात्मक रूप से साफ हो सकता है। लेकिन यदि अदालत के सामने ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान प्रस्तुत नहीं किया जा पाता, तो प्रश्न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली का नहीं रहेगा; तब मामला राज्य की शक्ति के इस्तेमाल और उसकी जवाबदेही का बन जाएगा।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार निरंकुश नहीं है। प्रदर्शनकारी हिंसा नहीं कर सकते, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचा सकते और पुलिस पर हमला करने की छूट किसी को नहीं है। ठीक उसी तरह पुलिस की शक्ति भी निरंकुश नहीं है। संविधान और कानून राज्य को व्यवस्था बनाए रखने की ताकत देते हैं, लेकिन उसी कानून का उद्देश्य नागरिक को राज्य की अनियंत्रित शक्ति से बचाना भी है। इसलिए किसी प्रदर्शन में बल प्रयोग की वैधता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि सरकार प्रदर्शनकारियों से सहमत थी या नहीं। पैमाना केवल कानून, आवश्यकता और आनुपातिकता होना चाहिए।
छात्रों से जुड़ा होने के कारण यह मामला और संवेदनशील हो जाता है। देश के युवा जब परीक्षा, भर्ती, पेपर लीक या अपने भविष्य से जुड़े मुद्दों पर सड़क पर उतरते हैं तो सरकार से अपेक्षा केवल उनकी मांग मान लेने की नहीं होती; सरकार किसी मांग से असहमत भी हो सकती है। लेकिन असहमति और दमन के बीच स्पष्ट संवैधानिक रेखा होती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा तब होती है जब उसके सामने असुविधाजनक सवाल पूछने वाले नागरिक खड़े हों। सत्ता से सहमत नागरिकों के अधिकारों की रक्षा आसान है; असहमति रखने वालों के अधिकारों की रक्षा ही लोकतंत्र की असली कसौटी है।
अब गेंद सरकारी रिकॉर्ड और न्यायिक परीक्षण के पाले में है। यदि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह नियमों के मुताबिक थी तो संबंधित आदेश, SOP और निर्णय प्रक्रिया सामने आने चाहिए। यदि कोई अधिकारी निर्धारित अधिकार से बाहर गया तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। और यदि मौजूदा नियम ही अस्पष्ट हैं तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जाने से भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को लेकर भ्रम समाप्त होना चाहिए।
हर घायल छात्र जवाब पाने का हकदार है। सवाल केवल यह नहीं कि पैलेट गन चली या नहीं—सवाल यह भी है कि यदि चली तो किसके आदेश पर चली, किस कानून के तहत चली और उस फैसले की जिम्मेदारी कौन लेगा? किसी लोकतंत्र में पुलिस के हाथ में शक्ति जरूरी है, लेकिन उस शक्ति के ऊपर कानून उससे भी ज्यादा जरूरी है। और यदि कानून में अनुमति नहीं थी, तो देश को यह जानने का अधिकार है—छात्रों पर पैलेट गन चलाने का आदेश आखिर किसने दिया?




