ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 जून 2026
क्या चीन से मानवाधिकार सीखने की बारी आ गई है?
“चीन” और “मानवाधिकार” — दशकों तक यह दो ऐसे शब्द माने जाते रहे हैं जो एक ही वाक्य में सहजता से नहीं बैठते। पश्चिमी मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में चीन का नाम अक्सर सेंसरशिप, राजनीतिक नियंत्रण, अभिव्यक्ति की सीमाओं और राज्य की कठोर शक्ति के संदर्भ में आता रहा है। ऐसे में जब बीजिंग में आयोजित वैश्विक मानवाधिकार सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि चीन के मानवाधिकार मॉडल की सराहना करते दिखाई देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—आखिर ऐसा क्या है चीन में जिसकी दुनिया तारीफ कर रही है?
असल में यह बहस मानवाधिकारों की दो अलग-अलग अवधारणाओं के बीच है।
पश्चिमी दुनिया मानवाधिकारों को मुख्यतः राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताओं के चश्मे से देखती है—बोलने की स्वतंत्रता, चुनाव, प्रेस की आज़ादी, विरोध प्रदर्शन का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता। दूसरी ओर चीन का तर्क है कि भूखे पेट लोकतंत्र की चर्चा बेमानी है। यदि नागरिक के पास भोजन नहीं, रोजगार नहीं, घर नहीं, शिक्षा नहीं और स्वास्थ्य सुविधा नहीं, तो बाकी अधिकारों का महत्व सीमित रह जाता है।
यही कारण है कि चीन पिछले दो दशकों से “राइट टू डेवलपमेंट” यानी विकास के अधिकार को मानवाधिकारों का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है।
तथ्य यह है कि चीन ने पिछले चालीस वर्षों में 80 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र भी इसे मानव इतिहास का सबसे बड़ा गरीबी उन्मूलन अभियान मान चुके हैं। करोड़ों लोगों को सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराना क्या मानवाधिकार नहीं है? यही सवाल चीन दुनिया से पूछ रहा है।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही सच है कि चीन के मॉडल पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी मौजूद हैं। शिनजियांग, तिब्बत, इंटरनेट सेंसरशिप, राजनीतिक असहमति पर नियंत्रण और मीडिया स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय आलोचना लगातार होती रही है। आलोचकों का कहना है कि आर्थिक विकास महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित नहीं किया जा सकता।
यहीं पर मानवाधिकारों की वैश्विक बहस दिलचस्प हो जाती है।
क्या मानवाधिकार केवल मतदान का अधिकार है, या फिर सम्मानजनक जीवन का अधिकार भी? क्या भूख से मरता व्यक्ति वास्तव में स्वतंत्र माना जा सकता है? क्या विकास और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी हैं, या दोनों का संतुलन ही आदर्श मॉडल है?
बीजिंग सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि दुनिया अब केवल पश्चिमी दृष्टिकोण को अंतिम सत्य मानने को तैयार नहीं दिख रही। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देश मानवाधिकारों की बहस में आर्थिक न्याय, विकास और सामाजिक सुरक्षा को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानने लगे हैं जितना राजनीतिक स्वतंत्रता को।
भारत के लिए भी यह बहस महत्वपूर्ण है। भारत न तो चीन जैसा एकदलीय राज्य है और न पश्चिमी देशों जैसा सामाजिक-आर्थिक ढांचा। भारत का अनुभव बताता है कि लोकतंत्र और विकास दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, हालांकि यह रास्ता कठिन और धीमा होता है।
शायद सही सवाल यह नहीं है कि “चीन सही है या पश्चिम?” बल्कि यह है कि क्या मानवाधिकारों की परिभाषा इतनी व्यापक होनी चाहिए जिसमें स्वतंत्रता भी शामिल हो और विकास भी।
क्योंकि अंततः एक नागरिक को केवल वोट नहीं चाहिए, उसे रोजगार भी चाहिए। केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य भी चाहिए। केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन भी चाहिए।
इसलिए चीन की सराहना को केवल प्रचार कहकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा और उसे मानवाधिकारों का आदर्श मॉडल घोषित करना भी जल्दबाज़ी होगी। लेकिन इतना निश्चित है कि बीजिंग सम्मेलन ने एक पुराने प्रश्न को फिर जीवित कर दिया है—क्या मानवाधिकारों की दुनिया में अब पश्चिम अकेला निर्णायक नहीं रहा?
संभव है कि आने वाले वर्षों में दुनिया “स्वतंत्रता बनाम विकास” की बहस से आगे बढ़कर “स्वतंत्रता और विकास” दोनों को मानवाधिकारों का आधार मानने लगे। और यदि ऐसा हुआ, तो चीन द्वारा उठाया गया यह विमर्श वैश्विक राजनीति की दिशा बदल सकता है।




