पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 जून 2026
भारत के लिए एक बड़ी मौसम संबंधी चुनौती सामने आती दिखाई दे रही है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (ESSO) ने पुष्टि की है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Niño) की स्थिति सक्रिय हो चुकी है और दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इसके और मजबूत होने की संभावना है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अल नीनो मध्यम या मजबूत स्तर तक पहुंचता है तो इसका असर भारत के मानसून, कृषि, जल संसाधनों और तापमान पर पड़ सकता है।
ताजा जलवायु बुलेटिन के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया गया है। इतना ही नहीं, समुद्र की गहराई में भी गर्म पानी का विस्तार देखा गया है, जो अल नीनो के मजबूत होने का संकेत माना जाता है। मौसम विभाग का कहना है कि अब महासागर और वायुमंडल दोनों में अल नीनो के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं।
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रणाली है, जो तब विकसित होती है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक स्तर पर हवा के दबाव और पवन प्रवाह में बदलाव आता है, जिसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। कहीं भारी बारिश और बाढ़ आती है तो कहीं सूखा और भीषण गर्मी का संकट पैदा हो जाता है।
भारत के लिए अल नीनो विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसका सीधा संबंध मानसून से जुड़ा हुआ है। इतिहास बताता है कि कई बार मजबूत अल नीनो के दौरान भारत में मानसूनी वर्षा सामान्य से कम रही है। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, जलाशयों में पानी की कमी हो सकती है और खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है।
मौसम विभाग के अनुसार, मई 2026 में प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इसके साथ ही अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के बड़े हिस्सों में भी सामान्य से अधिक गर्म पानी देखा गया है। अप्रैल की तुलना में मई में यह गर्माहट और अधिक फैल गई, जिससे अल नीनो की स्थिति मजबूत होती दिखाई दे रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के मध्य तक ENSO (एल नीनो-दक्षिणी दोलन) तटस्थ स्थिति में था। इसके बाद अगस्त 2025 से फरवरी 2026 तक ला नीना प्रभाव रहा, जिसने कई क्षेत्रों में वर्षा को बढ़ावा दिया। मार्च 2026 में स्थिति फिर सामान्य हुई, लेकिन जून आते-आते समुद्र का तापमान अल नीनो स्तर तक पहुंच गया।
मॉनसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम (MMCFS) के मॉडल संकेत देते हैं कि जून से सितंबर के बीच अल नीनो और मजबूत हो सकता है तथा पूरे मानसून सीजन में सक्रिय बना रह सकता है। यदि ऐसा होता है तो देश के कई हिस्सों में वर्षा वितरण प्रभावित हो सकता है।
हालांकि एक राहत की बात यह है कि हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD) फिलहाल तटस्थ स्थिति में बना हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि IOD सकारात्मक होता है तो वह अल नीनो के कुछ नकारात्मक प्रभावों को संतुलित कर सकता है। लेकिन वर्तमान संकेत बताते हैं कि मानसून के दौरान IOD तटस्थ ही रहेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो का असर केवल बारिश तक सीमित नहीं रहता। इससे तापमान में वृद्धि, हीटवेव की घटनाओं में इजाफा, बिजली की मांग में बढ़ोतरी और कृषि उत्पादन पर दबाव जैसी स्थितियां भी पैदा हो सकती हैं। ऐसे में सरकारों, किसानों और जल प्रबंधन एजेंसियों को पहले से तैयारी करनी होगी।
फिलहाल मानसून आगे बढ़ रहा है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की नजर प्रशांत महासागर पर टिकी हुई है। यदि अल नीनो आने वाले महीनों में और मजबूत होता है तो भारत को कमजोर मानसून, अधिक गर्मी और कृषि चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि मौसम विभाग लगातार स्थिति की निगरानी कर रहा है और समय-समय पर चेतावनी जारी कर रहा है।
एक बात साफ है—अल नीनो की वापसी केवल मौसम की खबर नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, खेती और करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा बड़ा मुद्दा है।




