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शी जिनपिंग की प्योंगयांग यात्रा: किम जोंग उन की कूटनीतिक जीत या चीन की रणनीतिक चाल?

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | सियोल/बीजिंग | 11 जून 2026

उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भव्य स्वागत केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं था, बल्कि एशिया की बदलती भू-राजनीति का एक बड़ा संकेत भी माना जा रहा है। दो दिनों तक चले इस दौरे में उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन ने शी जिनपिंग का 21 तोपों की सलामी, सैन्य सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ स्वागत किया। विश्लेषकों का मानना है कि इस यात्रा ने एक तरफ किम जोंग उन की अंतरराष्ट्रीय हैसियत को नई मजबूती दी, वहीं दूसरी ओर चीन ने भी रूस के बढ़ते प्रभाव के बीच उत्तर कोरिया को अपने रणनीतिक दायरे में और मजबूती से बांधने की कोशिश की है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि दोनों देशों ने परमाणु निरस्त्रीकरण (Denuclearisation) जैसे संवेदनशील मुद्दे को लगभग पूरी तरह नजरअंदाज किया। एक समय था जब चीन उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दबाव बनाता था, लेकिन इस बार बातचीत में इस विषय का उल्लेख तक नहीं हुआ। इससे संकेत मिल रहे हैं कि बीजिंग अब व्यावहारिक रूप से उत्तर कोरिया को परमाणु शक्ति के रूप में स्वीकार करने की दिशा में बढ़ रहा है। यही वजह है कि पश्चिमी देशों में इस यात्रा को चीन की रणनीति में बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

वॉशिंगटन स्थित स्टिम्सन सेंटर की कोरिया विशेषज्ञ जेनी टाउन का कहना है कि किम जोंग उन लंबे समय से यह दावा करते रहे हैं कि उत्तर कोरिया वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन चुका है। रूस के साथ उनके बढ़ते सैन्य और रणनीतिक संबंधों ने इस दावे को पहले ही मजबूती दी थी। अब शी जिनपिंग का वर्ष 2026 का पहला विदेशी दौरा प्योंगयांग होना किम के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि उत्तर कोरिया अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग नहीं है।

विश्लेषकों का मानना है कि चीन का उद्देश्य केवल दोस्ती दिखाना नहीं था। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग ने बीजिंग को चिंतित किया था। चीन नहीं चाहता कि प्योंगयांग पूरी तरह मॉस्को के प्रभाव में चला जाए। इसी कारण शी जिनपिंग की यात्रा को उत्तर कोरिया को दोबारा चीनी प्रभाव क्षेत्र में मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यूरेशिया ग्रुप के विश्लेषक जेरेमी चान के अनुसार चीन ने इस यात्रा के माध्यम से अपना प्रमुख लक्ष्य हासिल किया है—उत्तर कोरिया को रूस के साथ-साथ चीन के भी समान रूप से करीब रखना।

हालांकि दोनों देशों की आधिकारिक रिपोर्टों में अंतर भी साफ दिखाई दिया। उत्तर कोरिया ने यात्रा को एक ऐतिहासिक और भावनात्मक साझेदारी के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि चीन ने व्यापार, पर्यटन, कानून व्यवस्था और आर्थिक सहयोग जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर अधिक जोर दिया। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देशों के हित पूरी तरह समान नहीं हैं और संबंधों की अपनी सीमाएं भी हैं।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उत्तर कोरिया ने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में चीन की “वन चाइना पॉलिसी” का समर्थन किया। इसका सीधा संबंध ताइवान विवाद से है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में ताइवान को लेकर चीन और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो उत्तर कोरिया का राजनीतिक समर्थन बीजिंग के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि उत्तर कोरिया रूस की तरह चीन को सैन्य सहायता देने के लिए तैयार है।

यात्रा के दौरान एक और बात पर दुनिया की नजरें टिकी थीं—किम जोंग उन की बेटी किम जु-ए की मौजूदगी। दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसियां और कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ लंबे समय से मानते रहे हैं कि किम अपनी बेटी को भविष्य के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रहे हैं। लेकिन इस यात्रा के दौरान जारी तस्वीरों और वीडियो में उनकी बेटी कहीं दिखाई नहीं दी। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की औपचारिक और पारंपरिक कूटनीतिक शैली के कारण ऐसा किया गया होगा।

शी जिनपिंग की प्योंगयांग यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पूर्वी एशिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। चीन और उत्तर कोरिया दोनों इस यात्रा को अपनी-अपनी जीत बता रहे हैं। किम जोंग उन को अंतरराष्ट्रीय वैधता और प्रतिष्ठा मिली है, जबकि चीन ने रूस के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के संबंधों में मौजूद रणनीतिक सीमाएं और आपसी अविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। यही कारण है कि यह साझेदारी जितनी मजबूत दिखाई दे रही है, उतनी सरल और स्थायी भी नहीं मानी जा रही।

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