ओपिनियन / राजनीति | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 मई 2026
देश की राजनीति में अचानक उभरी “कॉकरोच जनता पार्टी” को फिलहाल केवल मजाक, मीम या सोशल मीडिया ट्रेंड मान लेना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में कई बड़े आंदोलन शुरुआत में व्यंग्य, गुस्से और डिजिटल असंतोष के रूप में ही सामने आए थे। अन्ना आंदोलन भी शुरू में व्यवस्था-विरोधी भावनाओं का विस्फोट था, जिसने बाद में देश की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया। इसलिए “कॉकरोच जनता पार्टी” को अभी पूरी तरह खारिज करने के बजाय यह देखना जरूरी है कि यह आंदोलन आगे किन मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राजनीतिक और सामाजिक राय रखता है। यह सच है कि इस पूरे आंदोलन के पीछे युवाओं का गुस्सा सबसे बड़ा कारण बना। खासकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा की उस टिप्पणी ने, जिसमें बेरोजगार युवाओं को “कॉकरोच” कहे जाने का आरोप लगा, व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की। इससे यह संकेत भी मिला कि देश का युवा अब केवल राजनीतिक व्यवस्था ही नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति भी सवाल उठाने लगा है। यह स्थिति सामान्य नहीं है और इसके लिए केवल युवा नहीं, संस्थाओं की कार्यशैली भी जिम्मेदार मानी जाएगी।
भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को अत्यंत शक्तिशाली बनाया ताकि वह नागरिक अधिकारों की अंतिम रक्षा कर सके। लेकिन जब आम नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि अदालतों के फैसले और टिप्पणियां किसी खास राजनीतिक विचारधारा की ओर झुकी हुई दिखाई दे रही हैं, तब संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है। पिछले कुछ वर्षों में कई संवेदनशील मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को लेकर समाज के एक हिस्से में असंतोष बढ़ा है। लोकतंत्र में न्यायपालिका की गरिमा केवल उसके अधिकारों से नहीं, बल्कि जनता के भरोसे से भी तय होती है।
युवाओं की नाराजगी केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है। विपक्षी दलों को लेकर भी गहरी निराशा दिखाई दे रही है। संविधान, लोकतंत्र, बेरोजगारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर विपक्ष जिस आक्रामकता की उम्मीद पैदा करता था, वह जमीन पर दिखाई नहीं दी। खासकर “कॉकरोच” विवाद जैसे मुद्दे पर बड़ी विपक्षी पार्टियों की चुप्पी ने युवाओं के भीतर यह भावना और मजबूत की कि उनकी आवाज को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
लेकिन असली सवाल अब शुरू होता है। किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता केवल गुस्से या वायरल लोकप्रियता से तय नहीं होती। उसका असली परीक्षण तब होता है जब वह समाज के कठिन और विभाजनकारी मुद्दों पर अपनी स्पष्ट स्थिति रखता है।
यही “कॉकरोच जनता पार्टी” का असली लिटमस टेस्ट भी होगा।
क्या यह आंदोलन केवल बेरोजगारी और युवाओं की नाराजगी तक सीमित रहेगा, या फिर वह उन टीवी डिबेट्स और मीडिया नैरेटिव पर भी सवाल उठाएगा जो रोज हिंदू-मुसलमान के नाम पर समाज को बांटने का काम करते हैं? क्या यह आंदोलन तथाकथित “गोदी मीडिया” की भूमिका पर खुलकर बोलेगा, जिसने वर्षों तक राजनीतिक ध्रुवीकरण को टीआरपी और सत्ता के हथियार में बदल दिया?
महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जिस मीडिया ने “इंडिया गठबंधन” को लगातार “इंडी एलायंस” कहकर राजनीतिक फ्रेम देने की कोशिश की, वही मीडिया “कॉकरोच जनता पार्टी” को किस तरह का मंच देता है। क्या उसे भी मनोरंजन, व्यंग्य और सनसनी तक सीमित कर दिया जाएगा, या उसके सवालों को गंभीरता से सुना जाएगा?
भारत की राजनीति में हर नया आंदोलन शुरुआत में “सिस्टम विरोध” के रूप में आता है, लेकिन धीरे-धीरे उसे यह तय करना पड़ता है कि वह सत्ता संरचना, मीडिया नैरेटिव, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के सवाल पर कहां खड़ा है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” अभी केवल एक डिजिटल विस्फोट है। लेकिन यदि यह आंदोलन युवाओं की वास्तविक बेचैनी, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक सौहार्द के सवालों को लगातार उठाता है, तो यह भविष्य में एक बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है। और यदि यह भी बाकी आंदोलनों की तरह केवल ट्रेंड बनकर रह गया, तो सोशल मीडिया की भीड़ इसे उतनी ही तेजी से भुला देगी, जितनी तेजी से उसने इसे उठाया है। सबकी नजर इसी पर है कि यह आंदोलन आगे केवल वायरल रहेगा या वैचारिक भी बनेगा।




