अंतरराष्ट्रीय / कूटनीति | ABC NATIONAL NEWS | 23 मई 2026
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ताइवान की राष्ट्रपति लाई चिंग-ते से संभावित बातचीत के संकेत ने एक बार फिर अमेरिका-चीन संबंधों में तनाव बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह बातचीत होती है, तो चीन इसे अपनी संप्रभुता और “वन चाइना पॉलिसी” के खिलाफ बड़ा कदम मान सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने लगातार दूसरी बार संकेत दिया है कि वह ताइवान की राष्ट्रपति से बात करेंगे। इससे यह साफ हो गया है कि यह कोई जुबानी गलती नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक पहल हो सकती है। ताइवान ने भी कहा है कि वह इस बातचीत का स्वागत करेगा, हालांकि अभी तक आधिकारिक तारीख तय नहीं हुई है।
चीन ने तुरंत इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि वह “ताइवान मुद्दे को अत्यंत सावधानी से संभाले” और ताइवान की स्वतंत्रता समर्थक ताकतों को गलत संकेत देना बंद करे।
आखिर चीन क्यों भड़कता है?
चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। बीजिंग का कहना है कि ताइवान एक अलग देश नहीं बल्कि चीन का ही एक प्रांत है, जिसे भविष्य में “पुनः एकीकृत” किया जाना है। चीन ने कभी भी बल प्रयोग से इनकार नहीं किया और कई बार स्पष्ट कहा है कि ताइवान की स्वतंत्रता उसकी “रेड लाइन” है।
1949 में चीनी गृहयुद्ध के बाद राष्ट्रवादी सरकार ताइवान चली गई थी, जबकि माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार ने चीन में सत्ता संभाली। तब से दोनों अलग-अलग प्रशासन के तहत चल रहे हैं, लेकिन चीन आज भी ताइवान को अपना हिस्सा मानता है।
अमेरिका की भूमिका क्या है?
अमेरिका आधिकारिक तौर पर “वन चाइना पॉलिसी” को मानता है, यानी वह चीन को ही आधिकारिक सरकार मानता है। लेकिन दूसरी ओर अमेरिका “ताइवान रिलेशंस एक्ट” के तहत ताइवान को अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए हथियार और रक्षा सहायता भी देता है।
यही दोहरी नीति चीन को सबसे ज्यादा परेशान करती है। बीजिंग का आरोप है कि अमेरिका ताइवान को धीरे-धीरे स्वतंत्र पहचान देने की कोशिश कर रहा है।
पहले भी बढ़ चुका है तनाव
2022 में तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद चीन ने ताइवान के आसपास बड़े सैन्य अभ्यास किए थे। मिसाइल परीक्षण, नौसैनिक घेराबंदी और लड़ाकू विमानों की गतिविधियों ने पूरे एशिया में तनाव बढ़ा दिया था।
अब यदि ट्रंप और ताइवान की राष्ट्रपति के बीच सीधी बातचीत होती है, तो चीन फिर से सैन्य अभ्यास या कड़े कूटनीतिक कदम उठा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग इसे “ताइवान की स्वतंत्रता को समर्थन” के रूप में पेश कर सकता है।
ताइवान क्या चाहता है?
ताइवान खुद को एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र प्रशासन वाला देश मानता है। वहां की सरकार का कहना है कि ताइवान के लोगों को अपने नेता चुनने और दुनिया से संबंध बनाने का अधिकार है। राष्ट्रपति लाई चिंग-ते कई बार चीन से बातचीत की पेशकश कर चुके हैं, लेकिन बीजिंग उन्हें “अलगाववादी” कहता है।
वैश्विक असर की आशंका
अमेरिका-चीन-ताइवान तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है। ताइवान दुनिया के सबसे बड़े सेमीकंडक्टर उत्पादन केंद्रों में शामिल है। किसी भी सैन्य तनाव का असर वैश्विक सप्लाई चेन, टेक उद्योग और विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर है कि क्या ट्रंप वास्तव में ताइवान की राष्ट्रपति से बात करेंगे और यदि ऐसा हुआ तो चीन की अगली प्रतिक्रिया कितनी आक्रामक होगी।




