ओपिनियन | प्रणव प्रियदर्शी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली 19 मई 2026
भारत में लोकतंत्र और राष्ट्रवाद को लेकर बहस नई नहीं है, लेकिन पिछले एक दशक में जिस तरह राजनीतिक विमर्श बदला है, उसने इस बहस को कहीं अधिक गंभीर बना दिया है। सत्ता, राष्ट्रवाद, धर्म, मीडिया, विश्वविद्यालय, न्यायपालिका और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच का संबंध आज पहले से कहीं अधिक तनावपूर्ण दिखाई देता है। यही कारण है कि “फ़ासीवाद” शब्द अब केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा नहीं रह गया, बल्कि समकालीन राजनीतिक चर्चाओं का केंद्रीय शब्द बन चुका है। हालांकि इस शब्द का इस्तेमाल बेहद सावधानी से होना चाहिए, क्योंकि हर मजबूत सरकार या हर राष्ट्रवादी राजनीति को फ़ासीवाद कहना इतिहास और राजनीति—दोनों के साथ अन्याय होगा। फिर भी यह सवाल पूछना जरूरी है कि क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम है, या उसके भीतर असहमति, बराबरी, संवैधानिक अधिकार और संस्थागत स्वतंत्रता भी उतनी ही जरूरी हैं?
इतिहास बताता है कि फ़ासीवाद कभी टैंकों और सैनिकों के साथ सीधे सत्ता पर कब्जा करके नहीं आता। वह अक्सर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के भीतर से उभरता है। वह चुनाव जीतता है, बहुमत हासिल करता है, राष्ट्रवाद की भाषा बोलता है और खुद को “सभ्यता का रक्षक” घोषित करता है। लेकिन उसकी राजनीति का असली आधार एक स्थायी भय होता है—यह विश्वास कि “राष्ट्र खतरे में है।” यह खतरा कभी बाहरी दुश्मन से जोड़ा जाता है, कभी किसी अल्पसंख्यक समुदाय से, कभी बुद्धिजीवियों से, कभी छात्रों से और कभी असहमति रखने वाले नागरिकों से। सत्ता तब जनता को यह समझाने लगती है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी, महंगाई या असमानता नहीं, बल्कि “राष्ट्र-विरोधी तत्व” हैं। यहीं से राजनीति का नैतिक संतुलन बदलना शुरू होता है।
भारत जैसे जटिल समाज में, जहां जाति, भाषा, क्षेत्र, वर्ग और धर्म की अनेक परतें मौजूद हैं, किसी एक राजनीतिक पहचान को स्थायी रूप से खड़ा करना आसान नहीं है। इसलिए इतिहास गवाह है कि हर उग्र राष्ट्रवादी राजनीति को एक साझा “दुश्मन” की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि कई आलोचक मानते हैं कि भारत में मुसलमानों को धीरे-धीरे उस “स्थायी राजनीतिक दुश्मन” के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसके खिलाफ बहुसंख्यक समाज को एकजुट किया जा सके। “लव जिहाद”, “जनसंख्या विस्फोट”, “घुसपैठ”, “राष्ट्र-विरोध” जैसे शब्द केवल राजनीतिक नारे नहीं रहते, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान को आकार देने लगते हैं। जब किसी समुदाय को लगातार संदेह, भय और घृणा के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है, तब लोकतांत्रिक बराबरी कमजोर होने लगती है।
“लव जिहाद” की राजनीति इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह केवल अंतर्धार्मिक विवाह का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि महिलाओं की स्वतंत्रता, समुदाय की “इज्जत” और पुरुषवादी नियंत्रण का मिश्रण बन जाता है। जब यह कहा जाता है कि “हमारी बेटियां खतरे में हैं”, तब उसके पीछे यह मान्यता छिपी होती है कि महिलाएं स्वतंत्र नागरिक नहीं, बल्कि समुदाय की संपत्ति हैं। इतिहास में ऐसी भाषा नाजी जर्मनी से लेकर अमेरिकी नस्लवादी राजनीति तक में दिखाई देती है, जहां महिलाओं के शरीर और विवाह को “राष्ट्र की शुद्धता” से जोड़ दिया गया था। भारत में भी यह बहस केवल संस्कृति की रक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक नियंत्रण की राजनीति में बदलती दिखाई देती है।
फ़ासीवादी प्रवृत्तियों का अगला टकराव हमेशा विश्वविद्यालयों से होता है। कारण स्पष्ट है—विश्वविद्यालय सवाल पूछते हैं, आलोचना करते हैं, इतिहास की पुनर्व्याख्या करते हैं और सत्ता से जवाब मांगते हैं। यही वजह है कि दुनिया के लगभग हर अधिनायकवादी दौर में छात्रों, प्रोफेसरों और बौद्धिक संस्थानों को निशाना बनाया गया। जब विश्वविद्यालयों को “राष्ट्र-विरोधी अड्डे” कहा जाता है, जब इतिहास की किताबों को राजनीतिक दृष्टिकोण से दोबारा लिखा जाता है, जब शोध और आलोचना को “एजेंडा” घोषित किया जाता है, तब असल लड़ाई केवल शिक्षा की नहीं होती—वह भविष्य की स्मृति पर नियंत्रण की लड़ाई होती है। इतिहास को नियंत्रित करना किसी भी वैचारिक सत्ता का सबसे शक्तिशाली हथियार होता है।
इसी तरह मीडिया की भूमिका भी बदलती है। लोकतंत्र में मीडिया का काम सत्ता से सवाल पूछना, तथ्यों की जांच करना और जनता के प्रति जवाबदेही तय करना होता है। लेकिन जब मीडिया का बड़ा हिस्सा “राष्ट्रवाद” और “सुरक्षा” के नाम पर सत्ता के साथ खड़ा दिखाई देने लगे, तब उसकी प्राथमिकता बदल जाती है। फिर हर रात टीवी पर एक नया “दुश्मन” चाहिए होता है—कभी मुसलमान, कभी छात्र, कभी पत्रकार, कभी किसान, कभी मानवाधिकार कार्यकर्ता। इसका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि लगातार भावनात्मक उत्तेजना बनाए रखना होता है। क्योंकि शांत और सोचने वाली जनता सत्ता के लिए हमेशा चुनौती होती है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं। यदि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस होने लगे, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर संदेह पैदा हो, पुलिस पर राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप बढ़ने लगें, और कानून असहमति को दबाने के औजार के रूप में दिखने लगें—तो लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाता है। संविधान केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं, समान अधिकारों और संस्थागत संतुलन का ढांचा है। यदि यह संतुलन कमजोर होता है, तो लोकतंत्र का बाहरी ढांचा बचा रह सकता है, लेकिन उसकी आत्मा धीरे-धीरे खोने लगती है।
इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि अधिनायकवाद अचानक नहीं आता। वह धीरे-धीरे सामान्य बनाया जाता है। पहले नफरत सामान्य होती है, फिर हिंसा सामान्य होती है, फिर असहमति पर दमन सामान्य होता है, फिर जेलें सामान्य हो जाती हैं। और अंततः जनता अन्याय के प्रति संवेदनहीन हो जाती है। यही वह क्षण होता है जब लोकतंत्र सबसे ज्यादा खतरे में होता है—जब नागरिक यह कहना शुरू कर दें: “हमें क्या फर्क पड़ता है?” लोकतंत्र केवल संविधान की किताब से नहीं बचता; वह नागरिक चेतना, असहमति की संस्कृति और नैतिक साहस से बचता है।
भारत के सामने आज मूल प्रश्न यही है कि क्या यह देश संवैधानिक नागरिकता के सिद्धांत पर आगे बढ़ेगा या धार्मिक-राजनीतिक पहचान के आधार पर? क्या यहां नागरिक बराबरी सर्वोच्च मूल्य बनी रहेगी, या बहुसंख्यक पहचान “राष्ट्र” की परिभाषा तय करेगी? क्या विश्वविद्यालय स्वतंत्र सोच की जगह बने रहेंगे, या केवल आज्ञाकारी नागरिक तैयार करने वाली संस्थाएं बन जाएंगे? क्या इतिहास तथ्य और बहस पर आधारित रहेगा, या सत्ता-निर्मित मिथकों का उपकरण बन जाएगा?
और शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आने वाली पीढ़ियां खुद को स्वतंत्र नागरिक मानेंगी या केवल किसी राजनीतिक-वैचारिक पहचान की अनुयायी प्रजा? क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों में नहीं, बल्कि इस बात में होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे असहमत और सबसे अलोकप्रिय नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है।




