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जब नौकरियां गायब हों, तो बेरोज़गारों को दोष दो : “कॉकरोचशास्त्र” का उदय

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 19 मई 2026

कॉकरोच जज, बेरोज़गार गणराज्य और अंधेरे में चलता शासन

शिवाजी सरकार

भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था ने पिछले कुछ वर्षों में कई नए राजनीतिक और वैचारिक शब्द गढ़े हैं। कभी “टुकड़े-टुकड़े गैंग” आया, कभी “अर्बन नक्सल”, कभी “आंदोलनजीवी”, कभी “लोकतंत्रजीवी”। लेकिन अब शायद भारतीय सार्वजनिक जीवन की सबसे विचित्र, सबसे तीखी और सबसे अमानवीय शब्दावली सामने आई है — “कॉकरोच”। जब देश का सर्वोच्च न्यायिक पद यह संकेत देता दिखाई दे कि बेरोज़गार युवा, एक्टिविस्ट, सोशल मीडिया पर सवाल पूछने वाले और RTI कार्यकर्ता “परजीवी” हैं, तो यह केवल एक टिप्पणी नहीं रह जाती, बल्कि यह उस मानसिकता की खिड़की बन जाती है जिसमें सत्ता से सवाल पूछना धीरे-धीरे अपराध और बेरोज़गारी धीरे-धीरे चरित्र दोष में बदल दी जाती है। यही वह क्षण है जहां “कॉकरोचशास्त्र” जन्म लेता है — एक ऐसा नया राजनीतिक विज्ञान जिसमें व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पीड़ितों पर डाल दी जाती है।

सभ्यता ने मानवता को कई महान सिद्धांत दिए। आइंस्टीन ने समय को मोड़ दिया। डार्विन ने विकासवाद समझाया। मार्क्स ने वर्ग संघर्ष की व्याख्या की। लेकिन भारतीय लोकतंत्र ने अब शायद सबसे अनोखा सिद्धांत खोज लिया है — “बेरोज़गार युवा कॉकरोच हैं।” क्या अद्भुत खोज है। सदियों से अर्थशास्त्री बेरोज़गारी को समझने की कोशिश करते रहे। सरकारें रोजगार योजनाओं पर अरबों खर्च करती रहीं। छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते रहे। परिवार अपनी जमीन बेचकर बच्चों को कोचिंग भेजते रहे। लेकिन असली सच्चाई तो अब सामने आई है — समस्या नौकरियों की कमी नहीं, बल्कि बेरोज़गारों का ज़िंदा रह जाना है। वे खत्म क्यों नहीं हो जाते? वे बार-बार परीक्षा क्यों देते हैं? वे सवाल क्यों पूछते हैं? वे RTI क्यों लगाते हैं? वे सोशल मीडिया पर गुस्सा क्यों दिखाते हैं? आखिर यह “कॉकरोचीय जिजीविषा” क्यों है?

यह तुलना सत्ता के लिए बेहद सुविधाजनक है। कॉकरोच अंधेरे में रहते हैं। बेरोज़गार युवा भी अक्सर अंधेरे किराए के कमरों में रहते हैं जहां बिजली का बिल कई महीनों से बकाया होता है। कॉकरोच कम खाने में जीवित रहते हैं। प्रतियोगी छात्र भी चाय, बिस्कुट और मैगी पर सालों गुजार देते हैं। कॉकरोचों को कुचलना मुश्किल होता है। बेरोज़गार युवाओं की उम्मीदों को भी। कॉकरोच रोशनी से भागते हैं। नौकरी खोजने वाले भी रिश्तेदारों के सवालों से बचते फिरते हैं — “कुछ हुआ?”, “नौकरी लगी?”, “अब आगे क्या?”। शायद यही “वैज्ञानिक समानता” इस नए न्यायशास्त्र की नींव है।

लेकिन “कॉकरोचशास्त्र” केवल बेरोज़गारी तक सीमित नहीं है। यह धीरे-धीरे लोकतांत्रिक असहमति को भी कीड़ों में बदल देता है। कोई छात्र पेपर लीक पर सवाल पूछे — कॉकरोच। कोई युवती भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता मांगे — कॉकरोच। कोई RTI एक्टिविस्ट सरकारी फाइलें खोल दे — कॉकरोच। कोई पत्रकार असुविधाजनक सवाल पूछ दे — कॉकरोच। कोई सोशल मीडिया पर सत्ता की आलोचना कर दे — कॉकरोच। यानी लोकतंत्र का हर असुविधाजनक नागरिक अब “संक्रमण” है। यह भाषा केवल व्यंग्यात्मक नहीं, बल्कि खतरनाक भी है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज ने अपने नागरिकों को इंसान की जगह “कीड़ा”, “परजीवी” या “संक्रमण” कहना शुरू किया, तब लोकतंत्र कमजोर और दमन मजबूत हुआ।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा विमर्श उस दौर में पैदा हो रहा है जब भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। कभी यही युवा “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहलाते थे। सरकारें कहती थीं कि यही भारत की ताकत हैं। लेकिन जब वही युवा नौकरी मांगते हैं, परीक्षा में पारदर्शिता मांगते हैं, पेपर लीक पर गुस्सा दिखाते हैं या RTI के जरिए जवाबदेही मांगते हैं, तो वे अचानक “परजीवी” बन जाते हैं। यानी जब युवा चुप हों तो “भविष्य”, और जब सवाल पूछें तो “कॉकरोच”। यह परिवर्तन केवल शब्दों का नहीं, राजनीति के चरित्र का भी है।

भारत के कोचिंग शहरों को देखिए। प्रयागराज, कोटा, पटना, दिल्ली का मुखर्जी नगर — यहां लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। उनमें से हजारों अंततः बेरोज़गार रह जाते हैं। कुछ डिलीवरी बॉय बन जाते हैं। कुछ यूट्यूबर। कुछ ट्यूटर। कुछ एक्टिविस्ट। कुछ पत्रकार। कुछ सोशल मीडिया पर सिस्टम की पोल खोलने लगते हैं। शायद यही सबसे बड़ा अपराध है — बेरोज़गारी के बावजूद उनका टूटकर चुप न हो जाना। सत्ता को गुस्सा उनके गुस्से पर नहीं, बल्कि उनकी जिजीविषा पर है। वे हारने के बाद भी सवाल पूछते रहते हैं। यही “कॉकरोचीय गुण” सबसे असहज करता है।

RTI एक्टिविस्टों को ही लीजिए। वे बार-बार वही करते हैं जिससे सत्ता सबसे ज्यादा डरती है — अंधेरे में टॉर्च जलाना। आप एक फाइल बंद करते हैं, वे दूसरी मांग लेते हैं। आप एक जवाब टालते हैं, वे अपील कर देते हैं। आप एक आंकड़ा छिपाते हैं, वे दस और पूछ लेते हैं। शासन हमेशा अंधेरे में ज्यादा सहज रहता है। वहीं बजट गायब होते हैं। वहीं भर्ती अटकती है। वहीं रिक्त पद वर्षों तक पड़े रहते हैं। वहीं घोषणाएं बिना लागू हुए बार-बार दोहराई जाती हैं। फिर कोई RTI कार्यकर्ता टॉर्च लेकर आता है और पूरा सिस्टम असहज हो उठता है। सवाल यह है कि ऐसे में असली “कॉकरोच” कौन है — सवाल पूछने वाला नागरिक या जवाब से भागती व्यवस्था?

“कॉकरोचशास्त्र” का सबसे बड़ा राजनीतिक उपयोग यह है कि यह विफलताओं की जिम्मेदारी सत्ता से हटाकर जनता पर डाल देता है। अगर नौकरियां नहीं हैं तो बेरोज़गारों को दोष दो। अगर परीक्षा लीक हो जाए तो छात्रों को “अराजक” कह दो। अगर मीडिया सवाल पूछे तो उसे “नेगेटिव” कह दो। अगर एक्टिविस्ट जवाबदेही मांगें तो उन्हें “राष्ट्रविरोधी” बना दो। यह रणनीति नई नहीं है। इतिहास में हर असफल शासन ने जनता की बेचैनी को अपराध साबित करने की कोशिश की है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह सब डिजिटल युग में हो रहा है, जहां हर अपमान, हर बयान और हर व्यंग्य लाखों लोगों तक तुरंत पहुंच जाता है।

1. कॉकरोचशास्त्र : भारत के बेरोज़गारों पर न्यायपालिका की महान खोज

2. कॉकरोचशास्त्र : अंधेरे में शासन, लेबलों में न्याय

3. कॉकरोचशास्त्र : जब बेरोज़गार व्यवस्था के “परजीवी” बना दिए जाएं

4. कॉकरोच जज और युवाओं को अमानवीय बनाने की कला

5. कॉकरोचशास्त्र : न्याय, युवा और बहिष्कार का नया विज्ञान

6. जब नौकरियां गायब हों, तो बेरोज़गारों को दोष दो : कॉकरोचशास्त्र का उदय

7. कॉकरोचशास्त्र : सत्ता बहिष्कृतों को कैसे नाम देती है

8. शासन का कॉकरोच सिद्धांत

9. कॉकरोचशास्त्र : युवाओं को नाम दो, ताकतवरों को बचाओ

10. अंधेरे में शासन, रोशनी में कॉकरोच

और अधिक तीखा, अधिक व्यंग्यात्मक

11. कॉकरोचशास्त्र : बेरोज़गारों को दोष देने में न्यायपालिका की ऐतिहासिक उपलब्धि

12. एक जज की महान खोज : भारत के बेरोज़गार कॉकरोच हैं

13. कॉकरोच न्याय और सरकारी घृणा का विज्ञान

14. कॉकरोच सिद्धांत : असहमति को अमानवीय बनाने की कला, एक लेबल हर बार

15. कॉकरोच अर्थशास्त्र : नौकरियां नहीं, सिर्फ लेबल

16. परजीवी सिद्धांत : जब सत्ता बहिष्कार पर पलती है

17. कॉकरोच न्याय : विफल शासन के लिए सुरुचिपूर्ण लेबल

18. जनसांख्यिकीय लाभांश से कॉकरोच कॉलोनी तक

19. कॉकरोचशास्त्र और अपमान की राजनीति

20. जज, कॉकरोच और बेरोज़गार गणराज्य

साहित्यिक / संपादकीय शैली

21. अंधेरे में शासन

22. कॉकरोचों की जिजीविषा

23. टिमटिमाते बल्ब के नीचे

24. कीड़ों में बदल दिए गए, फिर भी उठ खड़े हुए

25. चुपचाप गायब होने से इनकार

26. गरिमा की जगह लेबल

27. लेबलों की सभ्यता

28. जब जिजीविषा को परजीवी कहा जाए

29. बेरोज़गारों का अपमान करके उनका सम्मान करना

30. असली परजीवी कहीं और है

और शायद यही इस पूरे “कॉकरोच सिद्धांत” का सबसे बड़ा व्यंग्य भी है। बेरोज़गार युवाओं को अपमानित करने की कोशिश में यह व्यवस्था अनजाने में उनकी सबसे बड़ी ताकत स्वीकार कर बैठती है — उनकी जीवटता। कॉकरोच आसानी से खत्म नहीं होते। बेरोज़गार युवा भी नहीं। वे फिर परीक्षा देंगे। फिर सवाल पूछेंगे। फिर RTI लगाएंगे। फिर सोशल मीडिया पर लिखेंगे। फिर विरोध करेंगे। वे चुपचाप गायब होने से इनकार करते हैं। और यही चीज़ हर सत्ता को सबसे ज्यादा बेचैन करती है।

“कॉकरोचशास्त्र” के कुछ वन लाइनर

1. “जब सरकार नौकरियां नहीं दे पाती, तब वह बेरोज़गारों को ही समस्या घोषित कर देती है।”

2. “पहले युवा ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ थे, अब सवाल पूछते ही ‘कॉकरोच’ हो गए।”

3. “व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी नहीं, बेरोज़गारों का ज़िंदा रहना है।”

4. “जिस लोकतंत्र में सवाल पूछना संक्रमण बन जाए, वहां चुप्पी को ही राष्ट्रभक्ति कहा जाता है।”

5. “कॉकरोच अंधेरे में जीते हैं, इसलिए शायद उन्हें शासन की असली संरचना सबसे अच्छी समझ आती है।”

6. “भारत में नौकरियां कम हैं, लेकिन लेबल बहुत हैं।”

7. “RTI कार्यकर्ता असल में लोकतंत्र के कीटनाशक नहीं, उसकी आखिरी ऑक्सीजन हैं।”

8. “जब भर्ती रुकती है तो आंदोलन जन्म लेते हैं, और जब जवाबदेही रुकती है तो व्यंग्य।”

9. “सत्ता को बेरोज़गारों का गुस्सा नहीं, उनकी जिजीविषा डराती है।”

10. “लोकतंत्र में नागरिक सवाल पूछे तो एक्टिविस्ट, ज्यादा पूछे तो परजीवी, और लगातार पूछे तो कॉकरोच।”

11. “जो व्यवस्था गरिमा नहीं दे सकती, वह अपमान को सिद्धांत बना देती है।”

12. “असली परजीवी वह नहीं जिसे बाहर रखा गया, बल्कि वह है जो बहिष्कार पर पलता है।”

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