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ट्रंप के बाद अब पुतिन की मेजबानी करेगा चीन, दुनिया को क्या संदेश दे रहे हैं शी जिनपिंग?

अंतरराष्ट्रीय / कूटनीति / भू-राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 19 मई 2026

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हाई-प्रोफाइल चीन यात्रा खत्म होने के महज चार दिन बाद अब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बीजिंग पहुंचने वाले हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक ही सप्ताह में दुनिया की दो सबसे बड़ी सैन्य शक्तियों — अमेरिका और रूस — के नेताओं की मेजबानी कर रहे हैं। इस घटनाक्रम को केवल राजनयिक शिष्टाचार नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में तेजी से बदलते समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।

चीनी सरकारी मीडिया ने इसे “वैश्विक कूटनीति का नया केंद्र” बताया है। बीजिंग का संदेश साफ माना जा रहा है — चीन अब केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बल्कि विश्व राजनीति का केंद्रीय शक्ति केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है। पहले ट्रंप के साथ व्यापार, ताइवान और ईरान युद्ध पर बातचीत और अब पुतिन के साथ रणनीतिक साझेदारी और ऊर्जा समझौतों पर चर्चा, यह दिखाता है कि शी जिनपिंग वैश्विक संकटों के बीच चीन को निर्णायक भूमिका में स्थापित करना चाहते हैं।

क्रेमलिन के अनुसार पुतिन मंगलवार रात चीन पहुंचेंगे और बुधवार को शी जिनपिंग के साथ विस्तृत बैठक करेंगे। दोनों नेताओं के बीच “Power of Siberia 2” गैस पाइपलाइन सहित कई बड़े ऊर्जा और रणनीतिक समझौतों पर चर्चा होगी। यह पाइपलाइन रूस से चीन तक गैस आपूर्ति क्षमता में 50 बिलियन क्यूबिक मीटर की वृद्धि कर सकती है। माना जा रहा है कि पश्चिमी प्रतिबंधों और मध्य-पूर्व संकट के बीच रूस और चीन ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अपने संबंध और मजबूत करना चाहते हैं।

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यूक्रेन युद्ध के बाद चीन और रूस की नजदीकी लगातार पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ाती रही है। पश्चिमी विश्लेषकों का आरोप है कि चीन ने आर्थिक और कूटनीतिक समर्थन देकर रूस को यूक्रेन युद्ध जारी रखने में मदद की है। आंकड़ों के अनुसार 2022 के बाद से चीन और रूस के बीच व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है और चीन रूस के तेल और गैस का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। चीन ने अब तक रूस से सैकड़ों अरब डॉलर के जीवाश्म ईंधन खरीदे हैं, जिससे मॉस्को को युद्ध के दौरान भारी आर्थिक सहारा मिला।

दिलचस्प बात यह भी है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की हालिया बैठक में यूक्रेन युद्ध लगभग हाशिए पर रहा। बातचीत का मुख्य फोकस व्यापार, ताइवान और मध्य-पूर्व संकट था। ट्रंप ने बीजिंग छोड़ते समय संकेत दिया कि वे ताइवान को अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति पर पुनर्विचार कर सकते हैं। इसे चीन की बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि बीजिंग लंबे समय से अमेरिका पर ताइवान से दूरी बनाने का दबाव डालता रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पुतिन और शी की इस मुलाकात के पीछे ताइवान भी एक बड़ा रणनीतिक मुद्दा हो सकता है। चीन भविष्य में किसी संभावित ताइवान संकट की स्थिति में अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। यही कारण है कि रूस से तेल और गैस आपूर्ति के स्थायी और विस्तृत नेटवर्क पर जोर बढ़ गया है।

इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया में एक नए शक्ति ध्रुव की बहस को और तेज कर दिया है। एक तरफ अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी हैं, दूसरी तरफ चीन और रूस लगातार अपने रणनीतिक गठबंधन को मजबूत कर रहे हैं। बीजिंग अब खुद को केवल एशिया की ताकत नहीं बल्कि वैश्विक कूटनीतिक मंच का केंद्रीय खिलाड़ी साबित करने में जुटा है।

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप और पुतिन की लगातार यात्राएं केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं हैं। यह दुनिया को यह संदेश भी है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का केंद्र तेजी से बीजिंग की ओर खिसक रहा है। अब दुनिया की निगाहें इस बात पर होंगी कि शी जिनपिंग, ट्रंप और पुतिन के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल वैश्विक शक्ति संतुलन को किस दिशा में ले जाने के लिए करते हैं।

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