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नेटफ्लिक्स पर बड़ा मुकदमा, टेक्सास अटॉर्नी जनरल ने लगाया “जासूसी” और लत लगाने का आरोप

अंतरराष्ट्रीय / टेक्नोलॉजी/ मनोरंजन | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 12 मई 2026

दुनिया की दिग्गज स्ट्रीमिंग कंपनी नेटफ्लिक्स एक बड़े कानूनी विवाद में फंस गई है। अमेरिका के टेक्सास राज्य के अटॉर्नी जनरल केन पैक्सटन ने नेटफ्लिक्स के खिलाफ मुकदमा दायर करते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि कंपनी बिना स्पष्ट सहमति के उपभोक्ताओं का निजी डेटा इकट्ठा कर रही थी और अपने प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन कर रही थी ताकि लोग उसकी लत के शिकार हो जाएं।मुकदमे में आरोप लगाया गया है कि नेटफ्लिक्स यूजर्स की देखने की आदतें, पसंद, स्क्रीन टाइम, सर्च पैटर्न और अन्य डिजिटल गतिविधियों से जुड़ा डेटा बिना पर्याप्त जानकारी और अनुमति के एकत्र कर रही थी। टेक्सास अटॉर्नी जनरल का दावा है कि कंपनी इस डेटा का इस्तेमाल एल्गोरिदम को और अधिक प्रभावशाली बनाने तथा लोगों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर रोके रखने के लिए कर रही थी।

केन पैक्सटन ने अपने बयान में कहा कि
“टेक कंपनियां उपभोक्ताओं की निजी जिंदगी को उत्पाद की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। अगर कोई कंपनी लोगों की आदतों और मानसिक व्यवहार को समझकर उन्हें प्लेटफॉर्म से चिपकाए रखने की रणनीति अपनाती है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।”

मुकदमे में यह भी आरोप लगाया गया है कि नेटफ्लिक्स ने अपने प्लेटफॉर्म की डिजाइन, ऑटो-प्ले फीचर, लगातार सुझाव देने वाले एल्गोरिदम और कंटेंट रिकमेंडेशन सिस्टम को इस तरह तैयार किया जिससे यूजर्स लंबे समय तक स्क्रीन से जुड़े रहें। टेक्सास प्रशासन का दावा है कि यह मॉडल खास तौर पर युवाओं और किशोरों को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि नेटफ्लिक्स ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि वह यूजर्स की प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा को गंभीरता से लेती है और सभी सेवाएं लागू कानूनों और गोपनीयता नियमों के तहत संचालित की जाती हैं। नेटफ्लिक्स ने यह भी कहा कि उसके प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध फीचर्स यूजर अनुभव को बेहतर बनाने के लिए बनाए गए हैं, न कि किसी को “लत” लगाने के उद्देश्य से।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल नेटफ्लिक्स तक सीमित नहीं रहेगा। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर “एल्गोरिदमिक एडिक्शन” यानी तकनीक के जरिए लोगों को स्क्रीन पर बनाए रखने की रणनीति को लेकर दुनिया भर में बहस तेज हुई है। TikTok, Instagram, YouTube और Meta जैसी कंपनियां भी पहले ऐसे आरोपों का सामना कर चुकी हैं।

डिजिटल अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि टेक कंपनियां अब केवल मनोरंजन या सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म नहीं रह गई हैं, बल्कि वे लोगों के व्यवहार, सोच और समय को प्रभावित करने वाली शक्तिशाली डिजिटल संरचनाएं बन चुकी हैं। ऐसे में डेटा गोपनीयता और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सवाल लगातार गंभीर होते जा रहे हैं।

यह मुकदमा ऐसे समय आया है जब अमेरिका में टेक कंपनियों पर निगरानी बढ़ाने की मांग तेज हो रही है। कई राज्यों में बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के प्रभाव को लेकर नए कानूनों पर चर्चा चल रही है। टेक्सास प्रशासन का यह कदम आने वाले समय में अन्य राज्यों को भी बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।

अगर अदालत इस मामले में टेक्सास सरकार के पक्ष में फैसला देती है, तो इसका असर पूरी डिजिटल इंडस्ट्री पर पड़ सकता है। इससे डेटा कलेक्शन, यूजर एल्गोरिदम और प्लेटफॉर्म डिजाइन को लेकर नए नियम लागू हो सकते हैं। फिलहाल इस मुकदमे ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या टेक कंपनियां लोगों की सुविधा बढ़ा रही हैं या धीरे-धीरे उनकी डिजिटल आदतों और निजी जिंदगी पर नियंत्रण स्थापित कर रही हैं।

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