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बातचीत का मतलब आत्मसमर्पण नहीं: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का अमेरिका-इजरायल को सख्त संदेश

अंतरराष्ट्रीय | एजेंसी/ ABC NATIONAL NEWS | तेहरान | 10 मई 2026

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने बड़ा बयान देते हुए साफ कहा है कि बातचीत करने का मतलब आत्मसमर्पण नहीं होता। उन्होंने कहा कि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और जनता के अधिकारों की रक्षा पूरी मजबूती और अधिकार के साथ करेगा। पेजेशकियन का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात लगातार गहराते जा रहे हैं और पूरी दुनिया की नजर ईरान की अगली रणनीति पर टिकी हुई है।

एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति पेजेशकियन ने कहा कि ईरान बातचीत से पीछे नहीं हटता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि तेहरान दबाव के आगे झुकने को तैयार है। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य ईरानी जनता के अधिकारों को सुरक्षित करना और राष्ट्रीय हितों की पूरी ताकत के साथ रक्षा करना है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।

ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर दबाव बढ़ा रहे हैं। हाल के हफ्तों में पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां तेज हुई हैं। अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है, जबकि इजरायल लगातार ईरान समर्थित समूहों को निशाना बना रहा है। दूसरी ओर ईरान भी बार-बार यह संकेत दे चुका है कि यदि उसकी सुरक्षा या संप्रभुता को चुनौती दी गई तो वह कड़ा जवाब देगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पेजेशकियन का बयान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण संदेश देता है। एक तरफ वे ईरान के भीतर यह दिखाना चाहते हैं कि सरकार राष्ट्रीय हितों पर कोई नरमी नहीं बरत रही, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों को यह संदेश देने की कोशिश है कि बातचीत की प्रक्रिया को कमजोरी समझने की भूल न की जाए।

ईरान लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। तेहरान का कहना है कि उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के बावजूद वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति जारी रखेगा। पेजेशकियन ने भी अपने संबोधन में कहा कि ईरानी जनता ने वर्षों तक कठिन परिस्थितियों का सामना किया है, लेकिन देश ने कभी अपने अधिकारों से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।

इस बयान के पीछे एक बड़ा कूटनीतिक संकेत भी देखा जा रहा है। हाल के दिनों में कुछ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ देशों द्वारा ईरान और पश्चिमी देशों के बीच संवाद बहाल कराने की कोशिशें तेज हुई हैं। माना जा रहा है कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति पर पड़ रहे असर के कारण कई देश युद्ध टालने के लिए सक्रिय हो गए हैं। हालांकि ईरान साफ कर चुका है कि किसी भी बातचीत की बुनियाद सम्मान और बराबरी पर आधारित होनी चाहिए।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंता बनी हुई है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका सीधा असर भारत समेत दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

भारत के लिए भी यह स्थिति बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। भारत ईरान और खाड़ी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर ऊर्जा आयात करता है। ऐसे में युद्ध या बड़े सैन्य टकराव की स्थिति तेल आपूर्ति और कीमतों दोनों को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि भारत समेत कई देश लगातार संयम और बातचीत की अपील कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति और जटिल हो सकती है। एक तरफ कूटनीतिक बातचीत की कोशिशें जारी हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्य तैयारी भी तेज हो रही है। ऐसे में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन का यह बयान केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों को दिया गया एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि ईरान बातचीत करेगा, लेकिन दबाव में झुकेगा नहीं।

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