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ओपिनियन | जननायक कर्पूरी ठाकुर: सत्ता नहीं, समाज बदलने का संकल्प

एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 17 फरवरी 2026

17 फरवरी सिर्फ एक पुण्यतिथि नहीं है, यह भारतीय राजनीति के उस स्वर्ण अध्याय की याद दिलाती है जब सत्ता का अर्थ कुर्सी नहीं, समाज के अंतिम आदमी तक न्याय पहुंचाना था। जननायक कर्पूरी ठाकुर का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि साधारण परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी असाधारण राजनीतिक विरासत गढ़ सकता है। वे उन विरले नेताओं में थे जिन्होंने राजनीति को वंचितों की आवाज़ बनाया, न कि सत्ता का साधन।

24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर जिले के पितौंझिया (आज का कर्पूरी ग्राम) में एक साधारण नाई परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर ने गरीबी को बहुत करीब से देखा। यही अनुभव उनके राजनीतिक चिंतन की नींव बना। वे महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण तीन वर्ष जेल में रहे। आजादी के बाद उन्होंने राजनीति को करियर नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का मिशन बनाया।

1952 में ताजपुर से विधायक बनने के बाद उनका सफर लगातार आगे बढ़ता गया। वे बिहार के उपमुख्यमंत्री बने, शिक्षा मंत्री बने और दो बार मुख्यमंत्री पद संभाला। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान पद नहीं, बल्कि नीति रही—सामाजिक न्याय की नीति। 1978 में लागू किया गया “कर्पूरी ठाकुर फॉर्मूला” भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर है। पिछड़े वर्गों के लिए 26% आरक्षण, उसमें भी अत्यंत पिछड़ों और महिलाओं के लिए अलग उप-वर्गीकरण—यह उस समय का क्रांतिकारी कदम था। बाद में मंडल आयोग की सिफारिशों में भी इसी सोच की गूंज सुनाई दी।

उन्होंने सिर्फ आरक्षण तक खुद को सीमित नहीं रखा। शराबबंदी लागू कर गरीब परिवारों को आर्थिक और सामाजिक बर्बादी से बचाने का प्रयास किया। शिक्षा को सरल और जनसुलभ बनाने, हिंदी को बढ़ावा देने और भूमि सुधार के जरिए दलितों-पिछड़ों को जमीन दिलाने की दिशा में काम किया। उनका नारा—“आजादी और रोटी”—दरअसल लोकतंत्र की मूल भावना का विस्तार था।

कर्पूरी ठाकुर की सादगी उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। खादी के कपड़े, साइकिल से चलना, सरकारी सुविधाओं से दूरी—यह सब दिखावे के लिए नहीं, बल्कि उनके स्वभाव का हिस्सा था। वे उन नेताओं में थे जिनके खिलाफ व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा। राजनीति में नैतिकता की जो मिसाल उन्होंने पेश की, वह आज के दौर में और भी प्रासंगिक लगती है।

जनवरी 2024 में भारत सरकार द्वारा उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस विचारधारा की मान्यता है जिसने सामाजिक न्याय को भारतीय राजनीति के केंद्र में स्थापित किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज की राजनीति उस विरासत को आगे बढ़ा पा रही है? क्या सामाजिक न्याय सिर्फ चुनावी नारा बनकर रह गया है, या वास्तव में वंचितों के जीवन में परिवर्तन ला रहा है?

कर्पूरी ठाकुर की पुण्यतिथि हमें आत्ममंथन का अवसर देती है। उनका जीवन बताता है कि राजनीति का असली उद्देश्य सत्ता की सीढ़ियां चढ़ना नहीं, बल्कि समाज की सीढ़ियां समतल करना है। जब तक देश में असमानता और वंचना मौजूद है, तब तक जननायक कर्पूरी ठाकुर की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

जननायक कर्पूरी ठाकुर अमर रहें।
सामाजिक न्याय की मशाल जलती रहे।

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