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स्टूडियो से दरबार तक गोद में बैठा एंकर : ‘राष्ट्र’ की ठेकेदारी और सत्ता का दलाल स्वामी

अजय कुमार | नई दिल्ली 7 जनवरी 2026

यह पत्रकारिता नहीं है—यह दरबारी उद्घोषणा है। यह बहस नहीं—यह फैसले की डिक्री (Conclusive Determination) है। यह सवाल नहीं—यह लेबल चिपकाने की फैक्ट्री है। अर्नब गोस्वामी एक बार फिर उसी पुराने अवतार में लौट आए हैं, जहाँ कैमरा चलता है, आवाज़ चढ़ती है, ग्राफिक्स गरजते हैं और निष्कर्ष पहले से तय रहता है: जो सत्ता से असहमत, वह राष्ट्र-विरोधी। स्टूडियो अदालत बन जाता है, एंकर जज, और पैनलिस्ट्स ताली बजाने वाले जूरी। दर्शक? वह तो बस TRP का ईंधन है। सोशल मीडिया पर उठता शोर कोई संयोग नहीं। डॉक्टरों, लेखकों, टिप्पणीकारों—सबका एक ही आरोप है: गोस्वामी की पत्रकारिता का चेक क्लियर हो चुका है, इसलिए नैरेटिव भी क्लियर है। यह व्यंग्य नहीं, यह उस भरोसे की शवयात्रा है जो कभी टीवी पत्रकारिता पर था। ‘डीप स्टेट’, ‘राष्ट्र की अस्मिता’, ‘भारत एक विचार नहीं’—ये सब अब हेडलाइनों के हथियार हैं, जिनसे असहमति का सिर कलम किया जाता है। बहस का काम तर्क नहीं, देशभक्ति का सर्टिफिकेट बाँटना रह गया है।

यहाँ पत्रकार सवाल नहीं पूछता, देशभक्ति मापता है। यहाँ तथ्य नहीं, फ्रेमिंग बिकती है। यहाँ नीति नहीं, निष्ठा जांची जाती है। गोस्वामी के स्टूडियो में जो चिल्लाता है, वही सही; जो शांत है, वही संदिग्ध। जो सवाल पूछे, वह ‘एजेंडा’; जो हाँ में हाँ मिलाए, वह ‘राष्ट्रवादी’। यह कैसा मीडिया है जहाँ डेसिबल लोकतंत्र का पैमाना बन गया है? सबसे बड़ा तमाशा यह है कि अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को घरेलू राजनीति की चिमटी में पकड़कर विपक्ष के गाल खींचे जाते हैं। वेनेज़ुएला हो या कोई और वैश्विक संकट—सब कुछ स्टूडियो-राष्ट्रवाद की चक्की में पीस दिया जाता है। जटिलता गायब, संदर्भ गायब—बस डर, उबाल और झंडा। सवाल यह नहीं कि नीति क्या है; सवाल यह है कि आप किसके साथ खड़े हैं। यह पत्रकारिता नहीं, भावनात्मक ब्लैकमेल है।

गोस्वामी की शैली पहचानी जाती है: पहले आरोप, फिर शोर, फिर ग्राफिक्स, फिर फैसला। बीच में तथ्य? अगर आ गए तो भी शोर में दबा दिए जाते हैं। यह एंकर-ड्रिवन ऑटोप्सी है—जहाँ मरीज जिंदा हो या नहीं, पोस्टमॉर्टम पहले हो जाता है। और जो असहमत हो, उसे ‘राष्ट्र-विरोधी’ का टैग—जैसे यह कोई डिस्काउंट कूपन हो। व्यंग्य यह है कि जो खुद को “राष्ट्र की आवाज़” बताते हैं, वे राष्ट्र की बहस से सबसे ज्यादा डरते हैं। बहस में तर्क चाहिए, तर्क में तथ्य; और तथ्य अक्सर सत्ता से सवाल पूछते हैं। इसलिए बेहतर है कि सवाल ही गायब कर दिए जाएँ। गोस्वामी का स्टूडियो यही करता है—सवालों की हत्या और नैरेटिव की ताजपोशी।

यह भी कहा जा रहा है—और यह कहना अपने आप में एक तमाचा है—कि पेंडिंग पेमेंट क्लियर होते ही पेंडिंग विवेक भी क्लियर हो गया। चाहे यह आरोप व्यंग्य हो, लेकिन यह उस साख-संकट की पहचान है जिसमें टीवी पत्रकारिता फँसी है। जब दर्शक एंकर को सत्ता का प्रवक्ता समझने लगें, तो समझिए पत्रकारिता पीआर बन चुकी है। आज सवाल यह नहीं कि राहुल गांधी क्या बोले थे या किस संदर्भ में बोले थे। सवाल यह है कि किसने, किस मंच से, किस लहजे में, और किस मकसद से उसे ‘राष्ट्र-विरोधी’ ठहराया। लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं होती—लेकिन गोस्वामी के स्टूडियो में यह राजद्रोह का ट्रेलर बन जाती है।

 सीधा सवाल: गोस्वामी, आप पत्रकार हैं या सत्ता के दलाल? अगर पत्रकार हैं, तो सवाल सत्ता से पूछिए। अगर दलाल हैं, तो कम से कम ईमानदारी से कबूलिए कि यह शो नहीं, दरबार है; यह बहस नहीं, भक्ति है; और यह राष्ट्रवाद नहीं, टीआरपी का राष्ट्रवाद है। इतिहास का एक नियम है—जो मीडिया सत्ता की गोद में बैठता है, वह जनता की अदालत में कठघरे में खड़ा होता है। आज सोशल मीडिया का उबाल उसी अदालत की घंटी है। शोर जितना भी हो, सच की आवाज़ उससे तेज़ होती है—और वह आवाज़ पूछ रही है: पत्रकारिता कब लौटेगी?

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