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ब्रिटिश दस्तावेज़ और RSS की भूमिका: आज़ादी की लड़ाई पर उठते असहज सवाल

एबीसी डेस्क 13 दिसंबर 2025

इतिहास सवाल पूछने से नहीं, झूठे राष्ट्रवाद से डरता है

 

सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस में सामने आए एक कथित ऐतिहासिक दस्तावेज़ ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को लेकर एक बार फिर गंभीर चर्चा छेड़ दी है। इस दस्तावेज़ पर British Home Department का नाम दर्ज बताया जा रहा है और इसमें साफ लिखा है कि 1925 से 1947 के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने किसी भी ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन में भाग नहीं लिया। अगर यह दस्तावेज़ अपने कथन के अनुसार सही और प्रामाणिक माना जाए, तो यह आज़ादी की लड़ाई के इतिहास पर कई असहज और जरूरी सवाल खड़े करता है।

इस दस्तावेज़ का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 1925 से 1947 वही दौर था, जब भारत में आज़ादी की लड़ाई अपने सबसे निर्णायक और उग्र चरण में थी। इसी कालखंड में असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियाँ, मजदूर-किसान संघर्ष और देशव्यापी जनांदोलन हुए। इसी दौर में लाखों लोगों ने जेलें काटीं, लाठियाँ खाईं, गोलियाँ झेलीं और फाँसी के फंदे तक चूमे। कांग्रेस, समाजवादी, क्रांतिकारी संगठन और अनगिनत साधारण भारतीयों ने अपने जीवन की कुर्बानी देकर स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाया।

ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ में यदि कोई संगठन पूरे इस दौर में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ किसी भी आंदोलन से अलग रहा, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सवाल किसी संगठन को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास को समझने के लिए जरूरी हैं। स्वतंत्रता संग्राम कोई एक दल या विचारधारा की बपौती नहीं था, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के त्याग और संघर्ष का परिणाम था। ऐसे में किसी संगठन की भूमिका या गैर-भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यह दस्तावेज़ एक बुनियादी बहस को जन्म देता है—देशभक्ति का प्रमाण क्या केवल नारों और भाषणों से मिलता है, या फिर संघर्ष और बलिदान से? आज जो लोग खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त बताते हैं और स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की विरासत पर दावा करते हैं, उनके वैचारिक स्रोतों की भूमिका पर यह दस्तावेज़ आईना दिखाने जैसा है। यह याद दिलाता है कि राष्ट्रवाद की कसौटी सत्ता में बैठकर नहीं, बल्कि विदेशी शासन के खिलाफ खड़े होकर तय होती है।

एक और अहम सवाल यह भी उठता है कि जो संगठन आज राष्ट्रवाद, सत्ता और इतिहास की व्याख्या पर अपना अधिकार जताते हैं, वे उस दौर में ब्रिटिश राज की नीतियों के खिलाफ खुलकर क्यों नहीं खड़े हुए? क्या रणनीतिक चुप्पी भी इतिहास का हिस्सा मानी जाएगी, या फिर उसे संघर्ष से दूरी कहा जाएगा—यह फैसला इतिहास और समाज को करना है।

इतिहास के साथ चयनात्मक व्यवहार सबसे बड़ा खतरा होता है। इतिहास को टुकड़ों में नहीं, बल्कि पूरे सच के साथ देखा जाना चाहिए। यदि कोई संगठन स्वतंत्रता आंदोलन से अलग रहा, तो बाद में वह उस आंदोलन की पूरी विरासत का अकेला उत्तराधिकारी होने का नैतिक अधिकार अपने आप नहीं पा जाता। सम्मान उन्हीं को मिलना चाहिए, जिन्होंने उस दौर में जोखिम उठाए, जेल गए और अपने जीवन की बाज़ी लगाई।

यह दस्तावेज़ हमें एक जरूरी बात याद दिलाता है—सत्ता में बैठकर देशभक्ति साबित करना आसान होता है, लेकिन विदेशी शासन के सामने खड़े होकर लाठियाँ खाना और जेल जाना ही असली देशभक्ति थी। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इतिहास को भावनाओं या प्रचार से नहीं, बल्कि तथ्यों और दस्तावेज़ों के आधार पर समझें।

अंततः, स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक सेनानियों के संघर्ष और बलिदान का सम्मान तभी होगा, जब इतिहास से जुड़े कठिन सवालों से हम मुंह न मोड़ें। इतिहास सवाल पूछने से नहीं डरता—डरता है तो केवल झूठे राष्ट्रवाद से।

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