एबीसी डेस्क | ओपिनियन | 9 दिसंबर 2025
भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद जनता के विश्वास पर टिकी है, लेकिन आज उसी विश्वास को सबसे बड़े खतरे का सामना करना पड़ रहा है। देश के नागरिकों ने जिन योजनाओं को अपने योगदान, भावनाओं और आकांक्षाओं से जोड़ा—जैसे ‘बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ’, ‘किसान सेवा’ और ‘स्वच्छ भारत’—उन्हीं योजनाओं को भाजपा ने एक चतुराई से तैयार किए गए ‘डोनेशन ड्राइव’ का शीर्षक बना दिया, जिससे जनता को यह भ्रम हो जाए कि वे सरकार को सहयोग दे रहे हैं। RTI के खुलासे ने यह साफ कर दिया कि पार्टी ने इन योजनाओं के नाम पर पूरी तरह बिना किसी सरकारी अनुमति के पैसे जमा किए। इस तथ्य का अर्थ यह नहीं कि कोई प्रशासनिक गलती हुई—बल्कि यह बताता है कि सत्ता के गलियारों में किस हद तक राजनीतिक स्वार्थ नैतिक जिम्मेदारियों पर हावी हो चुका है। जिस पार्टी को जनता ने शासन सौंपा, उसी ने सरकारी योजनाओं को अपनी प्राइवेट फंडिंग मशीन में बदल दिया। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा का अपमान है।
यह घटना एक अकेला प्रकरण नहीं, बल्कि उस गहराई में पैठ चुके राजनीतिक व्यवहार का हिस्सा है जो पिछले दशक में लगातार बढ़ता गया है। narendramodi.in और NaMo App जैसे प्लेटफॉर्म, जिनका इस्तेमाल देश भर में प्रधानमंत्री की आधिकारिक गतिविधियों और सरकारी घोषणाओं के प्रसार के लिए होना चाहिए, वे सीधे-सीधे पार्टी फंड इकट्ठा करने की मशीनों में बदल दिए गए। इससे जनता का भ्रम और भी गहरा हुआ कि उनका योगदान किसी सरकारी योजना के खाते में जा रहा है। वास्तव में यह पूरा अभियान एक ऐसी रणनीति की तरह काम करता रहा जिसमें जनता, सरकार और पार्टी—तीनों की सीमाएँ धुंधली कर दी गईं, ताकि सत्ताधारी दल सरकारी योजनाओं की प्रतिष्ठा और संवेदनशीलता का फायदा उठाकर पैसा बटोर सके। जब लोकतंत्र में सरकार और पार्टी एक ही रंग में रंग दिए जाते हैं, तब नागरिकों के सामने सत्य और प्रचार का अंतर मिट जाता है—और यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है, क्योंकि यहीं से लोकतंत्र के पतन की शुरुआत होती है।
और सबसे महत्वपूर्ण व चिंताजनक प्रश्न यह है कि यह सब प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट और ऐप के ज़रिए हुआ। सवाल उठता है—क्या प्रधानमंत्री को इस फंडिंग मॉडल की प्रकृति और इसके गैरकानूनी होने का पता नहीं था? अगर उन्हें सब मालूम था, तो यह सीधे-सीधे सत्ता के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। अगर नहीं मालूम था, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही की बेहद भयावह तस्वीर पेश करता है, जिसमें प्रधानमंत्री के अधीन चल रहे तंत्र में पारदर्शिता नाम की कोई चीज नहीं। दोनों स्थितियाँ ही लोकतंत्र के लिए विध्वंसकारी हैं। जनता उन डिजिटल मंचों पर भरोसा करती है जो प्रधानमंत्री के नाम से संचालित हैं—उन पर सरकार के नाम का फंड नहीं, बल्कि पार्टी की तिजोरी फैलाना लोकतांत्रिक नैतिकता की अंतिम सांस है।
यह घोटाला सिर्फ वित्तीय अनियमितता का आरोप नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का दस्तावेज है। ‘बेटी बचाओ–बेटी पढ़ाओ’ जैसी सामाजिक संवेदना से जुड़ी नीति, जिसे देश की बहनों और बेटियों के उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक माना जाता है, उसे चंदा उगाही के साधन में बदल देना—यह दिखाता है कि सत्ता की राजनीति ने संवेदनाओं को किस हद तक कुचल दिया है। किसान सेवा जैसे शब्द देश की सबसे मेहनतकश आबादी—किसानों—की कठिनाइयों और गरिमा का प्रतीक हैं। और जब इसी नाम का उपयोग चंदा बटोरने के लिए किया गया, तो यह उसी किसान के साथ धोखा था जिसकी आय दोगुनी करने के वादे आज भी अधूरे पड़े हैं। स्वच्छ भारत, जिसे जनता ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन की तरह अपनाया—उसे पार्टी फंड के लेबल में बदल देना सामाजिक भागीदारी और राष्ट्रीय स्वाभिमान दोनों का अपमान है। यह केवल सरकारी योजनाओं को हड़पना नहीं; यह जनता के विश्वास की लूट है।
यह भी याद रखना चाहिए कि यह घटना एक लंबी श्रृंखला का मात्र एक अध्याय है। इससे पहले भी चुनावी बॉन्ड्स के माध्यम से अपारदर्शी फंडिंग के आरोप लगे। PM CARES फंड को लेकर वर्षों से सवाल उठ रहे हैं कि पारदर्शिता क्यों नहीं है, ऑडिट क्यों नहीं है, और यह सार्वजनिक फंड होते हुए भी निजी ट्रस्ट की तरह क्यों चलता है। सरकारी विज्ञापनों में भाजपा की ब्रांडिंग को मिलाकर पेश करना अब एक स्थापित प्रथा बन चुकी है। हर बार यह कहा गया कि “सब कुछ कानून के दायरे में है।” लेकिन इस नए मामले में कानून को छुआ तक नहीं गया—सीधे-सीधे जनता की भावनाओं और योजनाओं को भुनाकर पैसा वसूला गया। यहाँ कानून का दायरा नहीं, बल्कि कानून का डर ही समाप्त हो चुका प्रतीत होता है। और जब सत्ताधारी दल कानून से ऊपर और जनता से दूर खड़ा हो जाए, तो लोकतंत्र का भविष्य अंधेरे में डूबने लगता है।
भयावह यह भी है कि इतनी गंभीर जानकारी सामने आने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा नेतृत्व की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। यह चुप्पी केवल असहजता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक अहंकार का प्रतीक है—मानो सत्ता को भरोसा हो कि जनता अब सवाल नहीं करेगी, या सवाल करेगी तो उसके पास कोई जवाब न देने की शक्ति भी मौजूद है। लेकिन जनता पूछ रही है—और यह सवाल लंबे समय तक टलने वाले नहीं हैं:
सरकारी योजनाओं के नाम पर पार्टी फंड कैसे इकट्ठा किया गया? पैसा किसके खाते में गया? किस स्तर पर इसकी मंजूरी दी गई? क्या यह पैसा जनता को वापस मिलेगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या प्रधानमंत्री इस पूरे खेल से वाकिफ थे? इन सवालों से भागकर लोकतंत्र नहीं बचाया जा सकता, और न ही जनमत को हमेशा के लिए धोखा दिया जा सकता है।
RTI ने इस घोटाले की परतें खोल दी हैं। अब समय है कि जनता अपनी आवाज़ और अधिक बुलंद करे, क्योंकि यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के भविष्य का है। जब कोई पार्टी सरकार को अपनी शाखा की तरह चलाने लगती है, और सरकारी योजनाओं को अपनी प्राइवेट फंडिंग मशीन में बदल देती है, तब यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि सत्ता का निजीकरण है। और अब फैसला जनता के हाथ में है—वह इस अंधकारमय घोटालेबाज़ी को स्वीकार करे या लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए खड़ी हो। यदि आज आवाज़ न उठी, तो कल हर सरकारी योजना एक राजनीतिक दुकान बन जाएगी, और भारत का लोकतंत्र एक प्रॉपर्टी, ब्रांड और व्यवसाय में बदल जाएगा।




