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पंजाब कांग्रेस में भूचाल: 2027 चुनाव से पहले पार्टी में टेंशन, गुटबाजी

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अमनप्रीत सिंह : चंडीगढ़ 9 दिसंबर 2025

पंजाब कांग्रेस में 2027 के विधानसभा चुनावों से काफी पहले ही तनाव और गुटबाज़ी खुलकर सतह पर आ चुकी है। पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक नवजोत कौर सिद्धू ने खुले मंच पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वॉरिंग पर गंभीर आरोप लगाकर राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। सिद्धू के इन आरोपों ने न केवल पार्टी की अंदरूनी खींचतान को उजागर किया है, बल्कि आने वाले चुनावों में कांग्रेस की एकजुटता पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

नवजोत कौर सिद्धू ने आरोप लगाया कि पंजाब कांग्रेस नेतृत्व में “कुछ लोग जानबूझकर साफ-सुथरी राजनीति करने वालों को किनारे कर रहे हैं” और पार्टी को अंदर से कमजोर करने का काम कर रहे हैं। उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि “कुछ नेताओं के निजी हित पार्टी व्यवस्था और जनता की उम्मीदों पर भारी पड़ रहे हैं।” सिद्धू का निशाना साफ तौर पर राजा वॉरिंग पर था, जिनके खिलाफ उन्होंने यह दावा किया कि संगठन ने विपक्ष की भूमिका को मजबूत करने के बजाय व्यक्तिगत राजनीति को प्राथमिकता दे दी है। उनके बयान में वह नाराज़गी साफ झलकती है, जो लंबे समय से पंजाब कांग्रेस में simmering unrest के तौर पर महसूस की जा रही थी।

इस बयानबाज़ी ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है, खासकर इसलिए क्योंकि पंजाब की राजनीति पहले से ही आपसी खींचतान और नेतृत्व संकट से जूझ रही है। नवजोत कौर सिद्धू ने कहा कि कांग्रेस तभी दमदार बन सकती है, जब पार्टी का नेतृत्व पारदर्शी हो और ज़मीनी कार्यकर्ताओं को महत्व दिया जाए—न कि उन लोगों को जो सिर्फ सत्ता और पद की राजनीति में लिप्त हों। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उनके आरोप संकेत देते हैं कि सिद्धू परिवार और मौजूदा नेतृत्व के बीच टकराव अब सार्वजनिक टकराव में बदल चुका है, जो कांग्रेस की चुनावी रणनीति को कमजोर कर सकता है।

राजा वॉरिंग पर लगाए गए आरोपों ने कांग्रेस हाईकमान के लिए भी स्थिति असहज कर दी है। वॉरिंग पहले भी कई विवादों में घिरे रहे हैं, लेकिन इस बार आरोप पार्टी के अंदर से आए हैं और वह भी ऐसी शख्सियत से, जो पंजाब कांग्रेस में अपनी साफ छवि और स्पष्टवादिता के लिए जानी जाती हैं। क़रीबी सूत्रों का मानना है कि वॉरिंग खेमे में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बेचैनी है, क्योंकि इससे संगठन की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ गई है। वहीं सिद्धू खेमे का दावा है कि “2027 के चुनावों से पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि पार्टी किस दिशा में जा रही है और नेतृत्व किसके हित में काम कर रहा है।”

इस पूरे विवाद के बाद पंजाब कांग्रेस में दो खेमों की रेखाएँ और भी स्पष्ट होती दिख रही हैं—एक पक्ष मजबूत और सामूहिक नेतृत्व की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा वर्तमान संगठनात्मक व्यवस्था को सही ठहरा रहा है। लेकिन दोनों स्थितियों के बीच पार्टी की छवि और एकता गंभीर रूप से प्रभावित होती दिख रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह खुला टकराव भाजपा और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियों को मनोवैज्ञानिक बढ़त दे सकता है, क्योंकि कांग्रेस का आंतरिक संघर्ष अक्सर चुनावी गणित को नुकसान पहुंचाता है। 2027 के लिए रोडमैप तैयार करने से पहले ही पार्टी के भीतर असंतोष की आवाज़ें गूंजना हाईकमान के लिए चुनौती बन सकती हैं।

कुल मिलाकर, नवजोत कौर सिद्धू के आरोपों ने साफ कर दिया है कि पंजाब कांग्रेस फिलहाल किसी भी तरह से एकजुट नहीं है। चुनावों से दो साल पहले ही अंदर की लड़ाई का खुले मंच तक पहुँचना एक संकेत है कि आगामी राजनीतिक दौर में कांग्रेस को न सिर्फ विपक्ष से, बल्कि अपने ही घर से बड़ी चुनौती झेलनी पड़ सकती है।

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