महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 9 दिसंबर 2025
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान बुधवार को लोकसभा में चुनावी सुधारों पर हुई बहस में उस समय माहौल गरम हो गया, जब कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने केंद्र सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि भारत में सबसे बड़ा और ऐतिहासिक चुनाव सुधार किसी और ने नहीं, बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया था। तिवारी के इस बयान ने सदन में मौजूद सत्ता पक्ष के सांसदों की तीखी प्रतिक्रियाएँ भी खींचीं। लेकिन तिवारी अपने तर्कों पर अडिग रहे और उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे राजीव गांधी के कार्यकाल में भारतीय लोकतंत्र को नई मजबूती मिली।
मनीष तिवारी ने कहा कि आधुनिक भारत की चुनावी प्रणाली—विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लागू करने, वोटर लिस्ट के डिजिटलीकरण, और पारदर्शिता बढ़ाने की शुरुआत—राजीव गांधी सरकार के निर्णयों का परिणाम थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार अक्सर पारदर्शिता और चुनावी सुधारों की बात करती है, लेकिन यह इतिहास का सच है कि संस्थागत सुधारों की नींव कांग्रेस के समय रखी गई थी। उनके अनुसार, राजीव गांधी ने न केवल तकनीकी सुधारों को बढ़ावा दिया, बल्कि चुनाव आयोग को भी वास्तविक स्वतंत्रता और शक्ति प्रदान की, जिससे भारत का लोकतंत्र मजबूत हुआ।
तिवारी ने केंद्र सरकार के नेतृत्व पर यह आरोप भी लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में चुनाव प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता, चुनावी बाँड, संस्थाओं पर दबाव और मीडिया की भूमिका—ये सभी मुद्दे जनता के बीच अविश्वास पैदा करते हैं और लोकतंत्र की पारदर्शिता को कमज़ोर करते हैं। तिवारी ने सत्ता पक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि “सत्ता में बैठे लोग चुनावी सुधारों की बात तो करते हैं, लेकिन सुधार की दिशा देशहित में होनी चाहिए, न कि राजनीतिक फ़ायदे के लिए।”
सदन में मौजूद कई विपक्षी नेताओं ने तिवारी के बयान का समर्थन किया और कहा कि आज भारत को वास्तविक, व्यापक और निष्पक्ष चुनाव सुधारों की ज़रूरत है—जैसे कि राजनीतिक दलों के फंडिंग में पारदर्शिता, चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार, और चुनावों के दौरान सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर नियंत्रण। विपक्ष का यह भी कहना था कि चुनावी बॉन्ड स्कीम ने राजनीति में “अनाम धन” को बढ़ावा दिया और इससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हुई।
उधर, बीजेपी सांसदों ने इस बयान का विरोध करते हुए कहा कि कांग्रेस अपने दौर की खामियों को भूलकर इतिहास की चुनिंदा तस्वीर पेश करती है। उनका कहना था कि मौजूदा सरकार ने चुनावी सुधारों को नए स्तर पर पहुँचाया है—जैसे कि मतदाता पहचान को आधार से जोड़ने का प्रयास, बूथ स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाना और चुनाव में डिजिटल प्रक्रियाओं को मजबूत करना। लेकिन विपक्ष ने तुरंत प्रतिवाद किया कि “सुधार” और “नियंत्रण” के बीच बहुत महीन फर्क होता है, और सरकार के कई कदम इस फर्क को मिटाते नज़र आते हैं।
बहस का रोचक पहलू यह भी रहा कि मनीष तिवारी ने अपने भाषण में सिर्फ अतीत की उपलब्धियों की बात नहीं की, बल्कि यह भी कहा कि भारत का लोकतंत्र लगातार बदल रहा है और इसके लिए निरंतर सुधार अनिवार्य हैं। उन्होंने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि अगर वास्तव में चुनावी सुधारों पर ईमानदार बहस चाहिए, तो राजनीतिक फ़ंडिंग, मीडिया की भूमिका और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा की जानी चाहिए।
लोकसभा में चली इस तीखी बहस ने एक बात स्पष्ट कर दी—कि चुनावी सुधार सिर्फ राजनीतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा मुद्दा है। और इसी वजह से यह आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा का केंद्र बना रहेगा।




