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CJI सूर्यकांत: मंदिर का धन सिर्फ़ भगवान का, बैंक उपयोग पर रोक

सुमन कुमार। नई दिल्ली 5 दिसंबर 2025

देश की न्यायपालिका से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला संदेश सामने आया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने मंदिरों की आय, चढ़ावा और संपत्ति के उपयोग को लेकर एक स्पष्ट और अत्यंत सशक्त टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि “मंदिर का पैसा भगवान का है; इसे किसी बैंक, संस्था या अन्य वित्तीय ढांचे के लिए जबरन उपयोग में नहीं लाया जा सकता।” CJI के इस बयान ने धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन, सरकार और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका, और श्रद्धालुओं के अधिकारों पर चल रही राष्ट्रीय बहस को नया आयाम दे दिया है। उनकी टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि धार्मिक स्थलों पर चढ़ाया गया धन केवल पूजा–अर्चना, धर्मार्थ कार्यों और देवस्थान की आवश्यकताओं के लिए ही नियत है, किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी तब आई जब कुछ राज्यों की मंदिर प्रशासन प्रणालियों पर प्रश्नचिह्न उठे। कई याचिकाओं में आरोप था कि मंदिर की संपत्ति का उपयोग कई बार ऐसे उद्देश्यों के लिए किया गया जो न तो धार्मिक थे और न ही श्रद्धालुओं की आस्था के अनुरूप। इसी संदर्भ में CJI सूर्यकांत ने कहा कि मंदिर की आय को राज्य के राजस्व की तरह देखना या उसका वित्तीय संस्थाओं के हित में उपयोग करना पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर की संपत्ति और धन “देवता का ट्रस्ट” होता है, जिसका उपयोग केवल उसी पवित्र उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए जिसके लिए वह दिया गया है।

CJI की टिप्पणियों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कई राज्यों में मंदिरों का प्रबंधन सरकारी नियंत्रण में है। इस व्यवस्था पर लंबे समय से बहस चल रही है—कुछ लोग इसे पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए ज़रूरी बताते हैं, तो कई लोग इसे धार्मिक स्वायत्तता का उल्लंघन मानते हैं। CJI का बयान इस बहस के केंद्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण दृष्टिकोण पेश करता है। उन्होंने संकेत दिया कि सरकारें चाहे मंदिरों का प्रबंधन क्यों न संभालें, लेकिन मंदिर की आय को अपने वित्तीय संसाधन की तरह उपयोग करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। यह टिप्पणी धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकार से सीधे जुड़ती है, और आने वाले समय में इससे कई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ प्रभावित हो सकती हैं।

इसके अलावा, CJI सूर्यकांत ने यह भी ज़ोर देकर कहा कि मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले धन पर श्रद्धालुओं का विश्वास आधारित होता है। यह विश्वास तभी बरकरार रह सकता है जब लोगों को पूरी पारदर्शिता मिले कि उनका दिया हुआ चढ़ावा किस दिशा में और किस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने यह आदर्श प्रस्तुत किया कि मंदिरों की आय का उपयोग देवस्थान की मरम्मत, धार्मिक गतिविधियों, सामाजिक सेवा, भोजनालयों, चरitable कार्यों और गरीब-वंचित समुदायों की सहायता जैसे पवित्र उद्देश्यों के लिए किया जाए। यदि यह धन किसी अन्य आर्थिक ढांचे में मोड़ दिया जाए तो यह जनता की आस्था के साथ अन्याय होगा।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, CJI की यह टिप्पणी कई लंबित याचिकाओं और राज्य सरकारों की नीतियों को प्रभावित कर सकती है। विशेष रूप से दक्षिण भारत के कई राज्यों में मंदिर प्रशासन पर सरकारी नियंत्रण को लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है। कई धार्मिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि मंदिर का पैसा कभी-कभी सरकारी योजनाओं या बैंकों के संरक्षण के लिए उपयोग किया जाता है, जो धार्मिक संपत्ति की प्रकृति के बिल्कुल खिलाफ है। CJI सूर्यकांत की स्पष्टता ने इन चिंताओं को मजबूती दी है, और यह संकेत दिया है कि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर एक व्यापक कानूनी ढांचा तय कर सकता है।

कुल मिलाकर, CJI सूर्यकांत की टिप्पणियाँ केवल एक अदालत के भीतर कही गई बात नहीं हैं—वे देश की धार्मिक संरचनाओं, सांविधिक अधिकारों, श्रद्धालुओं की आस्था और राज्य के हस्तक्षेप पर एक गहरी और आवश्यक बहस की दिशा तय करती हैं। उनका यह कहना कि “मंदिर का पैसा भगवान का है” न केवल एक कानूनी सिद्धांत है, बल्कि एक नैतिक चेतावनी भी है कि धार्मिक संसाधनों का उपयोग किसी भी कीमत पर उनके मूल उद्देश्य से विचलित नहीं होना चाहिए। आने वाले दिनों में इस टिप्पणी का प्रभाव प्रशासन, राजनीति, धार्मिक संगठनों और आम जनता के बीच व्यापक रूप से महसूस किया जाएगा।

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