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संसद में ‘जय हिंद’–‘वंदे मातरम्’ पर रोक की चर्चा से देश में भूचाल

ऋषिका । नई दिल्ली 28 नवंबर 2025

राज्यसभा की बुलेटिन में दर्ज एक टिप्पणी ने पूरे देश में तूफ़ान खड़ा कर दिया है। बताया गया है कि सदन की कार्यवाही के दौरान “जय हिन्द” और “वंदे मातरम्” जैसे राष्ट्रवादी नारों के प्रयोग को उचित नहीं माना गया है। यह जानकारी सामने आते ही विपक्ष से लेकर आम भारतीयों तक, हर किसी में रोष गहराता जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि आखिर देश की आज़ादी और राष्ट्रीय एकता के दो सबसे गौरवशाली नारों को सदन में बोलने में परेशानी किसे है? ये वही नारे हैं जिनसे अंग्रेज़ कांपते थे, वही नारे जिन्हें सुनकर स्वतंत्रता सेनानियों की छाती चौड़ी हो जाती थी—तो आज इन्हीं नारों से समस्या किन लोगों को हो सकती है?

देशभक्ति की मूल भावना से जुड़े इन नारों पर आपत्तियों को देखकर यह चिंता और गहरी हो जाती है कि क्या भारत का लोकतंत्र अब उन मूल भावनाओं से ही दूर किया जा रहा है जिनसे इसकी आत्मा बनती है? आखिर “जय हिन्द” और “वंदे मातरम्” जैसे शब्दों में ऐसा कौन-सा खतरा छिपा है, जो सदन तक को असहज कर रहा है? यह वही सदन है, जहां भारत की आज़ादी, लोकतंत्र और राष्ट्र की एकता को सुदृढ़ करने वाले फैसले लिए जाते हैं। और अब उसी सदन में देश की आत्मा बने नारों पर रोक—यह सवाल हर भारतीय को भीतर तक झकझोर रहा है।

लंबे संघर्ष और बलिदान से निकला “जय हिन्द” सिर्फ एक नारा नहीं, भारत की धड़कन है। 1907 में त्रावणकोर (केरल) के क्रांतिकारी चेम्पकरामन पिल्लै ने इसे गढ़ा, और फिर जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसका प्रचार किया। 1943-44 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इसे आज़ाद हिंद फौज का आधिकारिक अभिवादन बनाकर राष्ट्रव्यापी पहचान दिलाई। नेताजी अपने हर भाषण, हर प्रसारण—चाहे साउथ ईस्ट एशिया हो या जर्मनी—“जय हिन्द” के साथ समाप्त करते थे, क्योंकि इसमें किसी धर्म, जाति या संप्रदाय का उल्लेख नहीं था। यह पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष और एकता का संदेश देने वाला राष्ट्रनाद था। स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना ने भी इसे अपना औपचारिक सलाम बनाया और आज तक जब कोई सैनिक “जय हिन्द” कहता है, तो हर भारतीय में देशभक्ति की लहर दौड़ जाती है। जवाहरलाल नेहरू ने भी इसे अपने भाषणों के माध्यम से देशभर में लोकप्रिय बनाया।

दूसरी ओर, “वंदे मातरम्” वह कालजयी गीत और नारा है जिसने भारत माता को पूजनीय रूप में स्थापित करके स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा भर दी। 1870 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित यह गीत 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाया। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-जन की आवाज़ बन गया। अंग्रेज़ों ने 1906 से 1910 के बीच इसे कई बार प्रतिबंधित किया, लेकिन हर बार भारतीय अधिक जोश से इसे गाते हुए जेल जाते रहे। क्रांतिकारी भगत सिंह से लेकर खुदीराम बोस तक, हर महानायक की ज़ुबान पर फांसी के तख्ते तक “वंदे मातरम्” ही गूंजता था। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया। यह भारत की आत्मा, इतिहास और गर्व का अमूल्य प्रतीक है।

अब सवाल वही पुराना मगर सबसे तीखा है—इन नारों से दिक्कत किसे है? उन लोगों को, जिनका इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन के बलिदानों से नहीं बल्कि अंग्रेज़ों की चापलूसी और मुखबिरी से लिखा गया है? उन विचारों को, जिन्हें भारत की एकता से नहीं बल्कि अपनी सुविधाओं से मतलब था? आज जब आधुनिक भारत दुनिया में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब “जय हिन्द” और “वंदे मातरम्” जैसे नारों में यदि किसी को खतरा दिखता है, तो यह राष्ट्र की चेतना पर हमला माना जाएगा।

भारत के लिए यह सिर्फ नारे नहीं—यह हमारी सभ्यता की रीढ़ हैं। और अगर सदन तक में इनके प्रयोग पर आपत्ति उठाई जाती है, तो हर भारतीय का यह फर्ज़ बनता है कि वह अपने इतिहास और सम्मान की रक्षा के लिए आवाज़ बुलंद करे।

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