अवधेश कुमार । नई दिल्ली 26 नवंबर 2025
देश में बढ़ती कस्टोडियल डेथ्स को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब ऐसी घटनाओं को किसी भी हाल में सहन नहीं करेगा। अदालत ने कहा कि हिरासत में मौत न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता और संवैधानिक मूल्यों पर एक गहरा धब्बा है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब एक मामले में पुलिस हिरासत में हुई मौत का मुद्दा अदालत के सामने उठाया गया। जजों ने तीखे शब्दों में कहा कि कोई भी सभ्य समाज, कोई भी लोकतांत्रिक शासन और कोई भी संवैधानिक ढांचा ऐसी घटनाओं को स्वीकार नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हिरासत में व्यक्ति राज्य की जिम्मेदारी होता है—उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा पुलिस और प्रशासन का पहला कर्तव्य है। कोर्ट ने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि “अगर पुलिस हिरासत में मौतें होती रहीं, तो यह न केवल कानून व्यवस्था में जनता के भरोसे को तोड़ देगा, बल्कि यह देश को एक ऐसे मोड़ पर ले जाएगा जहां मानवाधिकारों का हनन सामान्य बात बन जाएगा।” अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि “आप हिरासत में मौत नहीं होने दे सकते… यह अस्वीकार्य है और अब देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।” ये टिप्पणियाँ पूरे देश में गूंज उठीं, क्योंकि कस्टोडियल टॉर्चर और मौतें लंबे समय से भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे चिंताजनक समस्याओं में शुमार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और पुलिस विभागों को कठोर निर्देश देते हुए कहा कि कस्टोडियल डेथ के हर मामले की स्वतंत्र और त्वरित जांच अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। अदालत ने जोर दिया कि ऐसे मामलों में दोषी पाए गए पुलिसकर्मियों के खिलाफ न केवल विभागीय कार्रवाई, बल्कि आपराधिक मुकदमा भी चलाया जाना चाहिए ताकि एक स्पष्ट संदेश दिया जा सके कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कस्टोडियल हिंसा शारीरिक यातना का ही नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली के प्रति जनता की आस्था के साथ खिलवाड़ का मामला है, और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि देश में पुलिस सुधारों पर अब तक ठोस प्रगति क्यों नहीं हो पाई, जबकि वर्षों से सुप्रीम कोर्ट, मानवाधिकार आयोग और विभिन्न समितियाँ इसके लिए सिफारिशें देती रही हैं। अदालत ने कहा कि “जब तक पुलिस बल को आधुनिक, जवाबदेह और पारदर्शी नहीं बनाया जाएगा, तब तक हिरासत में हिंसा और मौतों को रोकना मुश्किल है।” सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से पूछा कि क्या वे इन सुधारों को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने को तैयार हैं या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी देश की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक बड़ा संदेश है—कि मानव जीवन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और राज्य किसी भी बहाने से इससे पीछे नहीं हट सकता। यह फैसला न केवल पीड़ित परिवारों के लिए आशा का संदेश है, बल्कि उन पुलिसकर्मियों के लिए भी कठोर चेतावनी है जो हिरासत को शक्ति प्रदर्शन या दमन का साधन समझते हैं। अदालत ने कहा कि भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है, और ऐसे लोकतंत्र में कस्टोडियल डेथ जैसी घटनाएँ न केवल शर्मनाक हैं, बल्कि अस्वीकार्य भी। अब देश और अदालत दोनों स्पष्ट हैं—हिरासत में मौतें होंगी तो जवाबदेही भी तय होगी, और सजा भी तय होगी।




