संजीव कुमार । नई दिल्ली 21 नवंबर 2025
खेल की दुनिया और राजनीति की दुनिया दोनों में फर्क होना चाहिए, लेकिन आज दोनों का ऐसा अजीब मिश्रण बन गया है कि खिलाड़ी मैदान से कम और सियासत के बाउंसरों से ज़्यादा जूझ रहे हैं। मिचेल स्टार्क इसका जीवंत उदाहरण हैं—35 की उम्र में भी दुनिया के सबसे कठिन फ़ॉर्मेट टेस्ट क्रिकेट में लगातार गेंदबाज़ी करके, अपनी फिटनेस, मानसिक शक्ति और समर्पण से हर मैच को ‘फायर ब्रेथर’ में बदलते हुए। इंग्लैंड के खिलाफ पर्थ में 7 विकेट लेना कोई मामूली उपलब्धि नहीं; यह उस क्रिकेटर की पहचान है जिसने अपने करियर को कभी राजनीति, ग्लैमर या “भारतीय क्रिकेट” जैसी आंतरिक खींचतान में बर्बाद नहीं होने दिया। स्टार्क आज भी पूरी गति से दौड़ते हैं, बाउंसर फेंकते हैं, यॉर्कर मारते हैं और टेस्ट क्रिकेट का सम्मान बढ़ाते हैं।
उधर भारत में हालात देखिए—सबसे फिट, सबसे समर्पित और सबसे अधिक प्रदर्शन करने वाले बल्लेबाज विराट कोहली और रोहित शर्मा को राजनीति के दबाव में संन्यास लेने को मजबूर होना पड़ा। यह विडंबना नहीं तो क्या है? दो ऐसे बल्लेबाज जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को नया स्वर दिया, विदेशों में ऐतिहासिक जीत दिलाई, टेस्ट क्रिकेट को नया सम्मान दिलाया—आज वही खिलाड़ी “टीम कॉम्बिनेशन”, “भविष्य की योजना” और आंतरिक लॉबी की वजह से बाहर हो जाते हैं। भारतीय क्रिकेट में मेहनत से ज्यादा राजनीति, और फिटनेस से ज्यादा रिश्ते काम करने लगे हैं।
यह भी अजीब है कि विराट और रोहित जैसे खिलाड़ी, जिनकी रोज़ाना की ट्रेनिंग शायद एक औसत गेंदबाज से भी ज्यादा होती है, उन्हें संन्यास लेने पर मजबूर होना पड़ा—जबकि दुनिया में 35+, 36+ खिलाड़ियों की बाढ़ है जो लगातार खेल रहे हैं, और प्रदर्शन भी कर रहे हैं। जेम्स एंडरसन 41 की उम्र में भी टेस्ट खेल रहे थे। स्टार्क, स्टोक्स, स्मिथ—सब उम्र को धता बताकर क्रिकेट में डटे हुए हैं। लेकिन भारत में राजनीतिक समीकरण यह तय कर रहे हैं कि कौन खेलेगा और कौन “ड्रॉप” होगा।
सबसे बड़ा सवाल WTC—वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप—का है। पहले ही भारत दो बार फाइनल खेलकर हार चुका है। अब सोचिए—अगर स्टार्क जैसे योद्धा पर्थ में 7 विकेट लेकर इंग्लैंड की कमर तोड़ सकते हैं, तो भारत में ऐसे योद्धाओं को ड्रेसिंग रूम की सियासत से क्यों तोड़ा जा रहा है? विराट और रोहित जैसे बड़े मैच के खिलाड़ी नहीं होंगे, तो WTC फाइनल में किससे उम्मीद रखेंगे? आँकड़े भी यही कहते हैं—बड़े मैच बड़े खिलाड़ियों से जीते जाते हैं। लेकिन भारत की टीम आज ‘टैलेंट बनाम राजनीति’ की लड़ाई में उलझी हुई है।
यह है राजनीति का स्तर—एक देश में उम्र बढ़ने के बावजूद खिलाड़ी मैदान में आग उगल रहे हैं। दूसरे देश में, खिलाड़ी फिट, फॉर्म में और मानसिक रूप से बेहतर होने के बावजूद, “बोर्ड की राजनीति”, “चयन समिति का एजेंडा”, और “आंतरिक खेमेबाज़ी” की वजह से किनारे कर दिए जाते हैं। फर्क सिर्फ फिटनेस का नहीं—सोच का है। मिचेल स्टार्क अभी भी अपनी क्रिकेट संस्कृति के कारण खेल रहे हैं। विराट और रोहित भारतीय क्रिकेट संस्कृति के कारण नहीं खेल रहे।
अब सवाल यह नहीं कि WTC किसके हाथ आएगा; सवाल यह है कि क्या भारत WTC कभी जीतेगा—जब तक राजनीति खिलाड़ियों के प्रदर्शन से ऊपर बैठी रहेगी? खेल मैदान पर चलता है—बोर्डरूम में नहीं। और आज भारत में बोर्डरूम का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि मैदान पर उतने बड़े खिलाड़ी नहीं बचे, जिन्हें देखकर विपक्ष की टांगें कांपें।
विराट और रोहित को हमने नहीं खोया—हमने अपनी क्रिकेट सोच खो दी है। और यही असली हार है—2025 की, 2027 की, और शायद आने वाले WTC की भी।




