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बिहार की एक विधानसभा में 5000 ‘डबल वोटर’ ?

नई दिल्ली 12 नवंबर 2025

एक सीट, दो-दो वोटर — बिहार की लिस्ट में घुसपैठिए मतदाता, चुनाव आयोग खामोश

भारतीय लोकतंत्र की साख पर फिर एक गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है। The Reporters’ Collective की एक खोजी रिपोर्ट ने सनसनी मचा दी है — बिहार की एक अकेली विधानसभा, वाल्मीकिनगर, की मतदाता सूची में उत्तर प्रदेश के 5000 से अधिक संदिग्ध नाम शामिल पाए गए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ये वही लोग हैं जो उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में पहले से दर्ज हैं, लेकिन उन्हें बिहार में भी नया EPIC नंबर (मतदाता पहचान क्रमांक) देकर शामिल कर लिया गया है। यह न सिर्फ कानूनी रूप से गलत है बल्कि चुनावी प्रक्रिया में सीधा हेरफेर है।

रिपोर्ट के अनुसार, इन संदिग्ध मतदाताओं की पहचान पूरी तरह मेल खाती है — नाम, उम्र, पिता का नाम, और कभी-कभी तो पता तक — सिर्फ फर्क यह है कि बिहार की सूची में नया EPIC नंबर डाल दिया गया है ताकि पकड़ में न आएं। यानी, जो व्यक्ति कानपुर या बस्ती का वोटर है, वही नाम अब बिहार के वाल्मीकिनगर में वोट देने का अधिकार रखता है। यह मामला सिर्फ एक सीट का है — अगर पूरे प्रदेश की जांच हो जाए, तो आंकड़ा लाखों में जा सकता है।

और यही वह बिंदु है जिसने विपक्षी दलों को आगबबूला कर दिया है। चुनाव आयोग से लेकर प्रशासन तक कहीं कोई जवाब नहीं आया। ना कोई प्रेस नोट, ना कोई जांच का आदेश। जैसे सबकुछ जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा हो। यह वही आयोग है जो वोटर लिस्ट में छोटी तकनीकी त्रुटियों पर राजनीतिक दलों को नोटिस भेज देता है, लेकिन अब जब हजारों डबल वोटर उजागर हो गए हैं, तो “मौन की राजनीति” चल रही है।

यह सिर्फ यूपी और बिहार का मामला नहीं है — रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड के लोगों के नाम भी बिहार की मतदाता सूची में मौजूद हैं। ट्विटर और एक्स पर कई यूज़र्स ने सबूत के तौर पर स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं, जहां एक ही व्यक्ति के दो या तीन वोटर आईडी कार्ड मौजूद हैं — अलग-अलग राज्यों में, अलग-अलग नंबरों के साथ।

अब सवाल यह है कि यह “तकनीकी त्रुटि” है या “राजनीतिक चाल”? क्योंकि अगर यह मात्र चूक होती, तो इतनी बड़ी संख्या में एक ही पैटर्न से दोहरी प्रविष्टियाँ संभव नहीं थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनियोजित साजिश है — ऐसे लोगों को उन क्षेत्रों में डाला जा रहा है जहां सत्ताधारी दल को कमी का डर है या माहौल पलटने की जरूरत है।

और इस पूरे घोटाले का सबसे भयावह पहलू यह है कि जनता को इसकी कोई जानकारी नहीं दी जा रही। जिस देश में चुनाव आयोग लोकतंत्र का संरक्षक माना जाता था, वही अब शक के घेरे में है। क्या यह वही भारत है जहां “एक आदमी, एक वोट” का सिद्धांत कभी गर्व का प्रतीक हुआ करता था?

वास्तविकता यह है कि इस तरह के खुलासों के बाद “कौन जीत रहा है” या “किसका पलड़ा भारी है” जैसी चर्चाएँ बेअर्थ हो जाती हैं। जब वोटर लिस्ट ही गंदी कर दी गई हो, जब लोकतंत्र का पहला पन्ना ही फर्जी नामों से भरा हो, तब जीत और हार दोनों ही झूठी लगती हैं।

अगर इस पर अब भी चुनाव आयोग ने कार्रवाई नहीं की, तो आने वाले चुनावों का हर नतीजा जनता के विश्वास पर चोट करेगा — और भारत की लोकतांत्रिक आत्मा की सच्चाई यही रह जाएगी कि अब वोट गिनने वाले नहीं, वोट गढ़ने वाले जीतते हैं।

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