अंतरराष्ट्रीय / भू-राजनीति / ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग / मॉस्को / वॉशिंगटन | 21 मई 2026
बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ताजा शिखर वार्ता ने साफ संकेत दे दिया है कि दुनिया अब तेजी से नए भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है। दिलचस्प बात यह है कि यह बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद हुई, लेकिन इसके बावजूद चीन और रूस ने संयुक्त बयान जारी कर अमेरिका की मिसाइल रक्षा नीति, परमाणु रणनीति और वैश्विक “एकतरफावाद” पर खुला हमला बोला। यह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि उभरते वैश्विक शक्ति संघर्ष का संकेत है, जिसमें अमेरिका, चीन और रूस के बीच प्रतिस्पर्धा अब और अधिक स्पष्ट होती जा रही है।
शी और पुतिन ने ट्रंप की “Golden Dome” मिसाइल डिफेंस योजना को वैश्विक रणनीतिक स्थिरता के लिए खतरा बताया। दोनों देशों ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था को कमजोर कर रहा है और दुनिया को फिर से “जंगल के कानून” की ओर धकेल रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव, यूक्रेन युद्ध, ईरान संकट और इंडो-पैसिफिक प्रतिस्पर्धा पहले से ही वैश्विक अस्थिरता को बढ़ा रहे हैं। चीन और रूस अब खुद को उस धुरी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं जो अमेरिकी नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सकती है।
हालांकि इस पूरी बैठक का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि तमाम रणनीतिक नजदीकियों के बावजूद रूस वह बड़ा गैस समझौता हासिल नहीं कर पाया जिसकी उसे वर्षों से उम्मीद थी। “Power of Siberia 2” गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट, जो रूस से चीन तक 50 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस पहुंचाने के लिए प्रस्तावित है, अभी भी कीमत, फंडिंग और अनुबंध शर्तों में अटका हुआ है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय बाजार खोने के कारण रूस को चीन की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन बीजिंग इस स्थिति का लाभ उठाते हुए बेहद सावधानी से आगे बढ़ रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि चीन और रूस की साझेदारी बराबरी की नहीं, बल्कि बदलते शक्ति संतुलन की साझेदारी है, जहां फिलहाल चीन अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है।
दरअसल, शी जिनपिंग ने पिछले एक सप्ताह में दो बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक नेताओं — डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन — से मुलाकात कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि चीन अब केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता और कूटनीति का केंद्रीय खिलाड़ी बनना चाहता है। जहां ट्रंप पश्चिम एशिया संकट और ईरान युद्ध से निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं, वहीं पुतिन यूक्रेन में लंबी जंग में उलझे हुए हैं। इसके विपरीत चीन खुद को “स्थिर”, “संगठित” और “आर्थिक रूप से निर्णायक” शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम एक नए प्रकार के शीत युद्ध की शुरुआत जैसा दिखाई देता है, लेकिन यह 20वीं सदी वाले अमेरिका बनाम सोवियत संघ मॉडल से अलग होगा। अब संघर्ष केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि AI, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, सप्लाई चेन, रेयर अर्थ मिनरल्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक वित्तीय ढांचे के नियंत्रण का है। चीन इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है, जबकि रूस सैन्य शक्ति और ऊर्जा संसाधनों के जरिए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है।
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। एक ओर भारत अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारियां मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस उसके लिए रक्षा और ऊर्जा का महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है। चीन के साथ सीमा तनाव भी जारी है। ऐसे में भारत को आने वाले वर्षों में बेहद संतुलित और व्यावहारिक कूटनीति अपनानी होगी। क्योंकि दुनिया अब तेजी से ऐसे बहुध्रुवीय दौर में प्रवेश कर रही है, जहां हर बड़ा देश अपने प्रभाव क्षेत्र और आर्थिक सुरक्षा को लेकर अधिक आक्रामक होता जा रहा है।
बीजिंग में शी-पुतिन की यह मुलाकात केवल दो नेताओं की बैठक नहीं थी। यह उस बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक है, जहां अमेरिका की एकध्रुवीय शक्ति को खुली चुनौती दी जा रही है और दुनिया नए शक्ति संतुलन की ओर बढ़ रही है। सवाल अब केवल इतना नहीं है कि अगली महाशक्ति कौन होगी, बल्कि यह है कि आने वाली वैश्विक व्यवस्था के नियम कौन तय करेगा।




