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सऊदी-UAE ने घटाई अमेरिकी बॉन्ड होल्डिंग: क्या डॉलर सिस्टम से दूरी बना रहा खाड़ी क्षेत्र?

अंतरराष्ट्रीय / अर्थव्यवस्था / तेल राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | रियाद / अबू धाबी / वॉशिंगटन | 21 मई 2026

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, वैश्विक बॉन्ड बाजार में अस्थिरता और अमेरिका की आर्थिक नीतियों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने मार्च 2026 में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड होल्डिंग्स में उल्लेखनीय कटौती की है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सऊदी अरब ने अपने अमेरिकी ट्रेजरी निवेश में 10.8 अरब डॉलर की कमी करते हुए इसे 149.6 अरब डॉलर तक ला दिया, जबकि UAE ने 5.8 अरब डॉलर घटाकर अपनी होल्डिंग 114.1 अरब डॉलर कर दी। यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया भर के निवेशक अमेरिकी ब्याज दरों, डॉलर की दिशा और वैश्विक ऊर्जा संकट को लेकर सतर्क होते जा रहे हैं।

हालांकि सालाना आधार पर देखें तो दोनों देशों की अमेरिकी बॉन्ड होल्डिंग अभी भी पिछले वर्ष से अधिक है, लेकिन अचानक हुई यह मासिक कटौती कई बड़े संकेत दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देश अब अपनी विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों और निवेश रणनीति को अधिक विविध बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। अमेरिका में लगातार ऊंची महंगाई, फेडरल रिजर्व द्वारा लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रखने की आशंका और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों ने बॉन्ड बाजारों पर दबाव बढ़ा दिया है। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 4.5 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है, जिसने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों और संप्रभु निवेश कोषों को अपने पोर्टफोलियो पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है।

सऊदी अरब की होल्डिंग्स में 107 अरब डॉलर लंबी अवधि के ट्रेजरी बॉन्ड और 42.6 अरब डॉलर अल्पकालिक प्रतिभूतियों में हैं। वहीं UAE के पोर्टफोलियो में 48.6 अरब डॉलर लंबी अवधि और 65.5 अरब डॉलर अल्पकालिक अमेरिकी ट्रेजरी में निवेशित हैं। लेकिन इस बदलाव का महत्व केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी माना जा रहा है। हाल के वर्षों में सऊदी अरब और UAE दोनों ने चीन, भारत और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने आर्थिक संबंध तेजी से बढ़ाए हैं। BRICS विस्तार, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और डॉलर पर निर्भरता कम करने की बहस के बीच खाड़ी देशों की यह रणनीति वैश्विक वित्तीय शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव का संकेत मानी जा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि केवल खाड़ी देश ही नहीं, बल्कि जापान और चीन जैसे बड़े अमेरिकी बॉन्ड धारकों ने भी मार्च में अपनी होल्डिंग्स कम की हैं। जापान ने 47.7 अरब डॉलर और चीन ने 41 अरब डॉलर की कटौती की। इसके विपरीत ब्रिटेन और केमैन आइलैंड्स जैसे वित्तीय केंद्रों ने अपनी होल्डिंग बढ़ाई। कुल विदेशी अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स फरवरी के 9.49 ट्रिलियन डॉलर से घटकर मार्च में 9.35 ट्रिलियन डॉलर पर आ गईं। हालांकि यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में अभी भी अधिक है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल निवेश पोर्टफोलियो में तकनीकी बदलाव नहीं है। इसके पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक असुरक्षा, तेल बाजार में तनाव, पश्चिम एशिया संकट और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था को लेकर बढ़ती बहस भी जुड़ी हुई है। अमेरिका लंबे समय से दुनिया की “सेफ हेवन इकॉनमी” माना जाता रहा है, लेकिन अब कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार और रणनीतिक निवेश को अधिक बहुध्रुवीय ढांचे में बांटना चाहते हैं।

सऊदी अरब और UAE के लिए यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देश अब अपनी अर्थव्यवस्था को केवल तेल निर्यात तक सीमित नहीं रखना चाहते। Vision 2030 जैसे कार्यक्रमों के तहत वे टेक्नोलॉजी, AI, इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स और वैश्विक निवेश में नई भूमिका तलाश रहे हैं। ऐसे में उनकी विदेशी निवेश रणनीति भी अधिक लचीली और बहुस्तरीय होती दिखाई दे रही है।

फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह केवल अस्थायी वित्तीय पुनर्संतुलन है या डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में धीरे-धीरे उभर रहे बड़े बदलाव की शुरुआत। यदि आने वाले वर्षों में चीन, खाड़ी देश और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं अमेरिकी बॉन्ड होल्डिंग्स में लगातार कटौती करती हैं, तो इसका असर केवल वॉल स्ट्रीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।

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