अंतरराष्ट्रीय / कूटनीति / विश्लेषण | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग / वॉशिंगटन / मॉस्को | 21 मई 2026
चीन की राजधानी बीजिंग में पिछले एक सप्ताह के भीतर दुनिया के दो सबसे प्रभावशाली और परस्पर प्रतिद्वंद्वी नेताओं — अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन — का जिस तरह भव्य स्वागत किया गया, उसने वैश्विक कूटनीति में चीन की नई रणनीति को लेकर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दिलचस्प बात यह रही कि दोनों नेताओं को लगभग समान स्तर का राजकीय सम्मान दिया गया — राष्ट्रीय झंडे, सैन्य बैंड, बच्चों की मौजूदगी, औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर और अत्यंत नियंत्रित प्रतीकात्मक कूटनीतिक मंचन। यह केवल प्रोटोकॉल नहीं था; यह एक बेहद सोच-समझकर तैयार किया गया भू-राजनीतिक संदेश था।
बीबीसी की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, शी जिनपिंग यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि चीन अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि ऐसी वैश्विक धुरी बन चुका है जिसके साथ अमेरिका और रूस — दोनों को संबंध बनाए रखने की जरूरत है। ट्रंप और पुतिन के स्वागत में दिखाई गई समानता का मतलब यह नहीं कि चीन दोनों देशों को समान दृष्टि से देखता है, बल्कि यह कि बीजिंग खुद को उस “केंद्रीय शक्ति” के रूप में स्थापित करना चाहता है जिसके चारों ओर नई विश्व व्यवस्था घूमे।
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, AI, ताइवान और इंडो-पैसिफिक को लेकर गहरी प्रतिस्पर्धा बनी हुई है। दूसरी ओर रूस और चीन यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिकी प्रभाव के खिलाफ रणनीतिक रूप से करीब आए हैं। इसके बावजूद शी जिनपिंग ने दोनों नेताओं को लगभग एक जैसी कूटनीतिक गर्मजोशी देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि चीन किसी एक खेमे का हिस्सा नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का निर्णायक केंद्र है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अब “मध्यस्थ महाशक्ति” की छवि गढ़ना चाहता है। पश्चिम एशिया संकट, यूक्रेन युद्ध, होर्मुज जलडमरूमध्य तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन संकट के बीच बीजिंग यह दिखाना चाहता है कि उसके बिना कोई बड़ा वैश्विक समाधान संभव नहीं है। यही कारण है कि शी जिनपिंग एक तरफ ट्रंप के साथ तनाव प्रबंधन की राजनीति कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पुतिन के साथ “नो लिमिट्स पार्टनरशिप” को भी मजबूत बनाए हुए हैं।
हालांकि इस पूरी कूटनीति के भीतर शक्ति संतुलन का एक और संकेत छिपा हुआ है। रूस आज आर्थिक और ऊर्जा बाज़ार के लिहाज से चीन पर पहले से कहीं अधिक निर्भर हो चुका है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप से दूरी बढ़ने के कारण मॉस्को को बीजिंग की जरूरत है। इसके विपरीत अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा जरूर है, लेकिन दोनों की अर्थव्यवस्थाएं अब भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में शी जिनपिंग दोनों पक्षों से संबंध बनाए रखते हुए चीन की रणनीतिक स्थिति को अधिकतम मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
बीबीसी रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि चीन अब केवल “फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड” की भूमिका से आगे बढ़ चुका है। AI, सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ मिनरल्स, क्लीन एनर्जी, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक व्यापार मार्गों पर उसकी बढ़ती पकड़ उसे नई वैश्विक शक्ति बना रही है। यही वजह है कि ट्रंप और पुतिन — दोनों को बीजिंग जाकर चीन के साथ संबंधों को सार्वजनिक रूप से मजबूत दिखाने की जरूरत महसूस हो रही है।
भारत के लिए भी यह पूरा घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि दुनिया अब स्पष्ट रूप से बहुध्रुवीय शक्ति संरचना की ओर बढ़ रही है, जहां अमेरिका, चीन, रूस और यूरोप के बीच संतुलन की राजनीति और अधिक जटिल होती जाएगी। भारत को आने वाले वर्षों में ऐसी कूटनीति अपनानी होगी जिसमें वह रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत करते हुए अपनी स्वतंत्र वैश्विक भूमिका भी बनाए रख सके।
बीजिंग में ट्रंप और पुतिन को मिला लगभग समान सम्मान दरअसल एक प्रतीकात्मक संदेश था — चीन अब खुद को केवल एक देश नहीं, बल्कि “वैश्विक मंच” के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। और शायद यही 21वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक कहानी बनती जा रही है।




