ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 29 जुलाई 2026
पाकिस्तान की राजनीति में आज सबसे प्रभावशाली व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि फील्ड मार्शल असीम मुनीर हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जिस तरह देश की विदेश और सुरक्षा नीति को अपने हाथों में केंद्रित किया है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान अब लोकतांत्रिक सरकार से ज्यादा सैन्य रणनीति के आधार पर संचालित हो रहा है?
असीम मुनीर की नई विदेश नीति तीन मजबूत स्तंभों पर टिकी दिखाई देती है—सऊदी अरब का धन, चीन का रणनीतिक सहयोग और अमेरिका का राजनीतिक समर्थन। इस त्रिकोण को पाकिस्तान की नई कूटनीतिक दिशा माना जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यह रणनीति पाकिस्तान की बिगड़ती अर्थव्यवस्था और आंतरिक अस्थिरता का स्थायी समाधान बन सकती है, या यह केवल समय खरीदने की कोशिश है?
हाल के महीनों में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा साझेदारी मजबूत हुई है और इसके तुरंत बाद पाकिस्तान को अरबों डॉलर की वित्तीय राहत भी मिली। भले ही इस्लामाबाद इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग बताता हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संयोग अक्सर संदेश भी देते हैं।
दूसरी ओर, चीन पहले से ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और रक्षा सहयोग दोनों देशों के रिश्तों की मजबूत नींव हैं। लेकिन चीन की मदद भी पाकिस्तान की आर्थिक समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं बन सकी। विदेशी कर्ज बढ़ता गया, जबकि घरेलू उत्पादन और निवेश अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाए।
सबसे दिलचस्प बदलाव अमेरिका के साथ रिश्तों में देखने को मिला है। कभी पाकिस्तान पर “झूठ और धोखे” का आरोप लगाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब असीम मुनीर के साथ खुलकर संवाद कर रहे हैं। ईरान संकट के दौरान पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका ने वॉशिंगटन के साथ उसकी बातचीत के नए रास्ते खोले हैं। लेकिन यह समझना होगा कि अमेरिका की विदेश नीति भावनाओं से नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है। जब तक पाकिस्तान अमेरिकी रणनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोगी रहेगा, तब तक यह निकटता बनी रह सकती है।
असल चुनौती पाकिस्तान के भीतर है। आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी, राजनीतिक ध्रुवीकरण, आतंकवाद और बलूचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वा तक सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में केवल विदेश नीति की सफलताएं जनता के रोजमर्रा के संकटों को दूर नहीं कर सकतीं।
यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी लड़ाई सीमाओं के बाहर नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं के भीतर है। यदि संस्थागत स्थिरता, आर्थिक सुधार, निवेश का अनुकूल वातावरण और लोकतांत्रिक विश्वास बहाल नहीं होता, तो विदेशी सहायता भी सीमित राहत ही दे पाएगी।
असीम मुनीर निस्संदेह पाकिस्तान की वैश्विक स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने सऊदी अरब, चीन और अमेरिका के साथ समानांतर रिश्तों को साधने का प्रयास किया है। लेकिन इतिहास बताता है कि किसी भी देश की स्थायी ताकत बाहरी सहयोग से नहीं, बल्कि मजबूत अर्थव्यवस्था, स्थिर शासन और जनता के विश्वास से बनती है।
पाकिस्तान आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी विदेश नीति पहले से कहीं अधिक सक्रिय दिखाई देती है, लेकिन उसकी घरेलू चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। यदि इस असंतुलन को दूर नहीं किया गया, तो अरबों डॉलर की मदद, नई सामरिक साझेदारियां और बड़े कूटनीतिक दावे भी पाकिस्तान की किस्मत बदलने के लिए पर्याप्त साबित नहीं होंगे।
आखिरकार, किसी राष्ट्र का भविष्य विदेशी राजधानियों में नहीं, बल्कि उसकी अपनी आर्थिक क्षमता, राजनीतिक स्थिरता और संस्थागत मजबूती में तय होता है। यही कसौटी आने वाले वर्षों में यह तय करेगी कि असीम मुनीर का नया कूटनीतिक मॉडल पाकिस्तान के लिए बदलाव की शुरुआत बनेगा या केवल एक और महत्वाकांक्षी प्रयोग।




