एक्सप्लेनर/ बिजनेस/ टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | 29 जुलाई 2026
क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी जेब में रखा नोट अगर बारिश में भीग जाए, वॉशिंग मशीन में धुल जाए या महीनों तक इस्तेमाल होने के बाद भी नया जैसा दिखे तो कैसा होगा? भारत अब इसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। केंद्र सरकार ने 10 और 20 रुपये के प्लास्टिक नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में जानकारी दी कि करीब 200 करोड़ प्लास्टिक नोट, जिनकी कुल कीमत लगभग 3,000 करोड़ रुपये होगी, परीक्षण के लिए जारी किए जाएंगे।
यह केवल नोट का नया डिजाइन नहीं है, बल्कि भारतीय मुद्रा प्रणाली में एक बड़ा तकनीकी बदलाव माना जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि प्लास्टिक नोट आखिर आए कहां से? दुनिया ने इन्हें क्यों अपनाया? और क्या भारत में यह प्रयोग सफल होगा?
एक गैराज में हुई घटना ने बदल दी दुनिया की करेंसी
प्लास्टिक नोटों की कहानी किसी बैंक या सरकारी प्रयोगशाला से नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया के एक साधारण गैराज से शुरू हुई। वर्ष 1967 में ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक डेविड सोलोमन के गैराज में लगी आग के दौरान कुछ प्लास्टिक सामग्री पूरी तरह नहीं जली। इससे उनके मन में विचार आया कि यदि ऐसा मजबूत और टिकाऊ पदार्थ मुद्रा बनाने में इस्तेमाल किया जाए तो नोट अधिक सुरक्षित और लंबे समय तक चल सकते हैं।
इसके बाद ऑस्ट्रेलिया की वैज्ञानिक संस्था CSIRO (Commonwealth Scientific and Industrial Research Organisation) और रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया ने लगभग दो दशकों तक इस तकनीक पर शोध किया। आखिरकार 1988 में ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बना जिसने पॉलीमर (Polymer) बैंक नोट जारी किए। यह कदम देश की द्विशताब्दी (Bicentennial) के अवसर पर उठाया गया था।
दुनिया के 40 से ज्यादा देशों में चल रहे हैं प्लास्टिक नोट
आज ऑस्ट्रेलिया के अलावा कनाडा, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, ब्रुनेई, वियतनाम, रोमानिया, नाइजीरिया, पापुआ न्यू गिनी, मालदीव, यूके समेत 40 से अधिक देशों में पॉलीमर नोट प्रचलन में हैं। कई देशों ने नकली नोटों पर रोक और कम रखरखाव लागत के कारण इन्हें अपनाया है।
ब्रिटेन ने 2016 से धीरे-धीरे अपने कागजी नोटों को हटाकर पॉलीमर नोट जारी किए। कनाडा ने भी यही रास्ता अपनाया और दावा किया कि इससे नकली नोटों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई।
भारत को प्लास्टिक नोटों की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत में हर साल करोड़ों कागजी नोट खराब हो जाते हैं। खासकर 10 और 20 रुपये के नोट सबसे अधिक हाथ बदलते हैं और जल्दी फट जाते हैं। रिजर्व बैंक को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है।
प्लास्टिक नोट इस समस्या का समाधान माने जा रहे हैं। इनकी उम्र कागज के नोटों की तुलना में ढाई से चार गुना तक अधिक हो सकती है। ये पानी से खराब नहीं होते, जल्दी नहीं फटते और गंदगी भी कम पकड़ते हैं।
क्या होंगे प्लास्टिक नोटों के फायदे?
सबसे बड़ा फायदा इनकी लंबी उम्र है। जहां कागजी नोट कुछ महीनों या कुछ वर्षों में खराब हो जाते हैं, वहीं पॉलीमर नोट कई वर्षों तक उपयोग में रह सकते हैं।
इन पर विशेष पारदर्शी विंडो, माइक्रो प्रिंटिंग, होलोग्राम और अन्य आधुनिक सुरक्षा फीचर लगाए जा सकते हैं, जिससे नकली नोट बनाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
बारिश, नमी और धूल का इन पर कम असर होता है। अगर गलती से नोट कपड़ों के साथ वॉशिंग मशीन में भी धुल जाए तो उसके खराब होने की संभावना बहुत कम रहती है। इसके अलावा ये अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ रहते हैं क्योंकि इनकी सतह पर गंदगी कम चिपकती है।
क्या कुछ नुकसान भी हैं?
हर नई तकनीक की तरह पॉलीमर नोटों के भी कुछ नुकसान हैं। इनकी शुरुआती छपाई लागत कागजी नोटों से अधिक होती है। हालांकि लंबे समय तक उपयोग होने के कारण कुल लागत बाद में कम हो सकती है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी में पॉलीमर नोट मुड़ सकते हैं या सिकुड़ सकते हैं। इनके नष्ट होने के बाद पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) की प्रक्रिया भी अलग होती है, इसलिए इनके पर्यावरणीय प्रभाव पर लगातार अध्ययन किए जाते रहे हैं।
इसके अलावा शुरुआती दौर में लोगों और बैंकिंग सिस्टम को नई मुद्रा के अनुरूप ढालना भी एक चुनौती हो सकता है।
भारत में क्या होगा आगे?
सरकार फिलहाल इन्हें पूरे देश में लागू नहीं कर रही है। पहले फील्ड ट्रायल के जरिए अलग-अलग मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों में इन नोटों की मजबूती, टिकाऊपन और उपयोगिता का परीक्षण किया जाएगा। यदि परिणाम सकारात्मक रहे, तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोट भी पॉलीमर सामग्री में जारी किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान के बढ़ते दौर के बावजूद नकद लेनदेन अभी भी भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यदि अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और लंबे समय तक चलने वाले नोट प्रचलन में आते हैं, तो इससे रिजर्व बैंक की छपाई लागत घट सकती है और नकली नोटों पर भी प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।
भारत की मुद्रा व्यवस्था अब एक नए दौर की दहलीज पर खड़ी है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो आने वाले वर्षों में भारतीयों की जेब में रखे कागज के नोट धीरे-धीरे इतिहास बन सकते हैं और उनकी जगह मजबूत, सुरक्षित और लंबे समय तक चलने वाले प्लास्टिक नोट ले सकते हैं।




