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अमेरिका-ईरान टकराव और गहराया, कुवैत तक पहुंची जंग की आंच

अंतरराष्ट्रीय | अमित भास्कर | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 जून 2026

मध्य-पूर्व में जारी युद्ध ने सोमवार को और गंभीर रूप ले लिया जब अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले की पुष्टि की और इसके जवाब में ईरान ने अमेरिकी सैन्य अड्डे को निशाना बनाने का दावा किया। लगातार बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरे क्षेत्र में व्यापक संघर्ष की आशंकाओं को और बढ़ा दिया है।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार अमेरिकी सेना ने ईरान के गोरुक और केशम द्वीप स्थित रडार तथा ड्रोन नियंत्रण केंद्रों पर कार्रवाई की। अमेरिका का कहना है कि यह हमला आत्मरक्षा में किया गया, क्योंकि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र के ऊपर उड़ रहे अमेरिकी MQ-1 ड्रोन को मार गिराया था।

वहीं ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने उस अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाया, जिसका उपयोग ईरानी क्षेत्र पर हमलों के लिए किया गया था। हालांकि ईरान ने उस सैन्य अड्डे का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।

तनाव का असर अब खाड़ी देशों तक भी पहुंचता दिखाई दे रहा है। कुवैत ने बताया कि उसकी वायु रक्षा प्रणालियों ने कई ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम किया। पूरे देश में सायरन बजने से लोगों में दहशत का माहौल बन गया।

इसी बीच इजरायल ने लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई और तेज कर दी है। इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में स्थित 900 वर्ष पुराने ऐतिहासिक ब्यूफोर्ट किले और एक रणनीतिक पहाड़ी क्षेत्र पर कब्जा करने का दावा किया है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सेना को लेबनान में जमीनी अभियान और आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।

दूसरी ओर अमेरिका युद्धविराम की कोशिशों में भी जुटा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन और इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से बातचीत कर नए युद्धविराम प्रस्ताव पर चर्चा की। हालांकि अब तक किसी ठोस सहमति के संकेत नहीं मिले हैं।

युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। लेबनान में बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 2 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका, ईरान, इजरायल और लेबनान के बीच यह टकराव और बढ़ता है तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फिलहाल पूरा विश्व मध्य-पूर्व के हालात पर नजर बनाए हुए है।

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