अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 23 अप्रैल 2026
नेपाल की राजधानी काठमांडू इन दिनों सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि दुनिया की दो बड़ी ताकतों के बीच खामोश टकराव का केंद्र बन गया है। China और United States—दोनों ही अपने-अपने हितों को लेकर नेपाल के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। दिलचस्प बात यह रही कि दोनों देशों के बड़े अधिकारी लगभग एक ही समय पर काठमांडू पहुंचे और अलग-अलग बैठकों के जरिए नेपाल सरकार को अपने संदेश देने की कोशिश करते दिखे। इससे साफ हो गया कि नेपाल अब सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक अहम रणनीतिक मैदान बन चुका है।
अमेरिका की ओर से आए वरिष्ठ अधिकारी Samir Paul Kapur ने नेपाल के नेताओं से मुलाकात की और निवेश बढ़ाने के साथ-साथ एक संवेदनशील मुद्दा भी उठाया—तिब्बती शरणार्थियों का। उन्होंने कहा कि नेपाल में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों को पहचान पत्र दिया जाना चाहिए, ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें, बैंक खाते खोल सकें, पढ़ाई कर सकें और कारोबार कर सकें। अमेरिका इसे मानवीय मुद्दे के रूप में देख रहा है और चाहता है कि नेपाल इस दिशा में कदम उठाए।
लेकिन दूसरी तरफ Cao Jing के नेतृत्व में चीन का प्रतिनिधिमंडल भी उसी समय काठमांडू में मौजूद था। चीन ने साफ संकेत दिया कि वह नेपाल और अमेरिका की बढ़ती नजदीकियों को लेकर सहज नहीं है। चीनी अधिकारियों ने नेपाल को आगाह किया कि वह अमेरिकी कार्यक्रमों और योजनाओं से दूरी बनाए रखे। खास तौर पर Millennium Challenge Corporation (MCC) Nepal Compact, स्टेट पार्टनरशिप प्रोग्राम और एलन मस्क के Starlink satellite network जैसे प्रोजेक्ट्स को लेकर चीन ने अपनी चिंता खुलकर जताई।
चीन ने सिर्फ यही नहीं कहा, बल्कि तिब्बती मुद्दे पर भी सख्त रुख अपनाया। उसने नेपाल को चेतावनी दी कि वह तिब्बती शरणार्थियों से जुड़े किसी भी ऐसे कदम से बचे, जिससे चीन की संवेदनशीलता प्रभावित हो। यहां तक कि भारत के धर्मशाला में होने वाले तिब्बती निर्वासित सरकार के कार्यक्रम में शामिल न होने की सलाह भी दी गई। यह वही मुद्दा है, जिस पर चीन पहले भी कई बार अपनी नाराजगी जाहिर कर चुका है।
नेपाल सरकार के लिए यह स्थिति आसान नहीं है। एक तरफ अमेरिका है, जो निवेश, विकास और मानवाधिकार की बात करता है। दूसरी तरफ चीन है, जो नेपाल का बड़ा पड़ोसी और मजबूत आर्थिक साझेदार है। नेपाल दोनों के साथ संतुलन बनाए रखना चाहता है, लेकिन इस तरह की समानांतर कूटनीतिक गतिविधियां उसके लिए दबाव बढ़ा रही हैं।
नेपाल के विदेश मंत्री ने भी इस पूरे मामले में सावधानी भरा रुख अपनाया है। उन्होंने अमेरिका से बातचीत में साफ किया कि तिब्बती शरणार्थियों का मुद्दा बेहद संवेदनशील है और इसमें नेपाल अपने पड़ोसी देश की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल मानवीय आधार पर शरणार्थियों की मदद करता रहेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर 2022 के उस दौर की याद दिला दी, जब MCC Nepal Compact को लेकर नेपाल में भारी राजनीतिक बहस छिड़ी थी। उस समय भी चीन और अमेरिका के बीच खींचतान साफ नजर आई थी। अब एक बार फिर वही तस्वीर उभरती दिख रही है, बस मुद्दे और तरीके बदल गए हैं।
काठमांडू में हो रही यह कूटनीतिक हलचल बताती है कि आने वाले समय में नेपाल की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होने वाली है। छोटे देश के सामने बड़ी चुनौती है—दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखना और अपने हितों की रक्षा करना। फिलहाल, नेपाल इस रस्साकशी के बीच सावधानी से कदम रख रहा है, लेकिन यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुकाबला और तेज हो सकता है।




