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सऊदी में फंसे 53 नेपाली मजदूर, महीनों से नहीं मिला वेतन, खाने तक के लाले

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विदेश/प्रवासी संकट | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू/रियाद | 23 अप्रैल 2026

रोजगार की तलाश में घर-परिवार छोड़कर विदेश गए 53 नेपाली मजदूर आज ऐसी मुश्किल में फंस गए हैं, जहां न काम है, न पैसा और न ही घर लौटने का रास्ता साफ नजर आ रहा है। ये सभी मजदूर Saudi Arabia के दम्माम शहर में एक कंपनी के कैंप में पिछले दो महीने से फंसे हुए हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई मजदूरों को तीन से पांच महीने तक की तनख्वाह नहीं मिली है, और अब उनके सामने खाने तक का संकट खड़ा हो गया है।

मजदूरों का कहना है कि जिस कंपनी में वे काम करते थे, उसने अचानक काम देना बंद कर दिया। पहले उन्हें भरोसा दिया गया कि जल्द ही स्थिति सुधर जाएगी, लेकिन धीरे-धीरे हालात बिगड़ते चले गए। अब हालत यह है कि न तो उन्हें कोई काम मिल रहा है और न ही पुराने काम का पैसा। कुछ मजदूरों ने बताया कि उन्हें कंपनी के लेबर कैंप में ही रहने के लिए मजबूर किया गया है, जहां उनकी आवाज बाहर तक नहीं पहुंच पा रही।

सबसे दर्दनाक बात यह है कि जिन मजदूरों को घर लौटने के लिए एग्जिट वीजा मिल चुका है, उनके लिए भी वापसी आसान नहीं है। कंपनी ने उनके लिए टिकट का इंतजाम नहीं किया और अब खाना देना भी बंद कर दिया है। मजदूरों का कहना है कि उनके पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे खुद टिकट खरीद सकें या रोज का खाना जुटा सकें। कई लोगों ने बताया कि कैंप मैनेजर ने साफ कह दिया कि खाना बंद किया जाएगा और ज्यादा शिकायत करने पर और परेशानी हो सकती है।

ये सभी मजदूर करीब 17 महीने पहले Nepal से यहां काम करने आए थे। उन्हें बेहतर भविष्य और अच्छी कमाई का सपना दिखाया गया था, लेकिन अब वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। परिवारों से दूर, अनजान देश में फंसे ये लोग हर दिन उम्मीद और चिंता के बीच जी रहे हैं।

इस पूरे मामले में नेपाल दूतावास ने दखल दिया है। रियाद स्थित दूतावास के अधिकारियों का कहना है कि 53 में से 34 मजदूरों को घर लौटने की अनुमति मिल चुकी है और कंपनी पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह उनका बकाया वेतन दे और टिकट की व्यवस्था करे। लेकिन कंपनी एक साथ सभी मजदूरों को भेजने के लिए तैयार नहीं है, जिससे समस्या और लंबी खिंचती जा रही है।

कंपनी की तरफ से दलील दी जा रही है कि आंतरिक विवाद और प्रोजेक्ट में देरी के कारण आर्थिक संकट पैदा हुआ है, लेकिन मजदूरों का कहना है कि उनकी जिंदगी इस बहाने के बीच फंस गई है। उन्होंने बताया कि कई बार अधिकारियों को अपनी परेशानी बताई, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।

यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि विदेशों में काम करने जाने वाले मजदूर कितनी असुरक्षित स्थिति में होते हैं। बेहतर जिंदगी की तलाश में घर छोड़ने वाले ये लोग अक्सर ऐसे हालात में फंस जाते हैं, जहां उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं होता।

इन मजदूरों की नजर अब सिर्फ एक चीज पर टिकी है—घर वापसी। उन्हें उम्मीद है कि सरकार और दूतावास के प्रयास जल्द रंग लाएंगे और वे अपने परिवारों के बीच सुरक्षित लौट पाएंगे। लेकिन तब तक, हर गुजरता दिन उनके लिए एक नई परीक्षा बनता जा रहा है।

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