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रामचंद्र गुहा की राजनीति: निष्पक्ष इतिहासकार या खाकी चड्डी में छिपे हुए वैचारिक योद्धा?

ओपिनियन | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जून 2006

भारतीय बौद्धिक जगत में रामचंद्र गुहा एक प्रतिष्ठित नाम हैं। उन्हें इतिहासकार, लेखक, टिप्पणीकार और सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में सम्मान प्राप्त है। लेकिन किसी भी लोकतंत्र में सम्मान और आलोचना साथ-साथ चलते हैं। पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार रामचंद्र गुहा ने भारतीय राजनीति पर लगातार टिप्पणियां की हैं, उसने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या रामचंद्र गुहा केवल इतिहासकार हैं, या फिर वे भी भारतीय राजनीति में एक वैचारिक भूमिका निभा रहे हैं? और यदि निभा रहे हैं, तो वह भूमिका किसके हित में काम करती है?

रामचंद्र गुहा अक्सर अपनी बात की शुरुआत इस तरह करते हैं कि वे नरेंद्र मोदी के आलोचक हैं, लेकिन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के योग्य नहीं मानते। पहली नजर में यह एक संतुलित और निष्पक्ष टिप्पणी प्रतीत होती है। यही कारण है कि उनकी बात को दोनों राजनीतिक खेमों में आसानी से स्वीकार्यता मिल जाती है। बीजेपी समर्थक कहते हैं कि देखिए, मोदी विरोधी माने जाने वाले बुद्धिजीवी भी राहुल गांधी को सक्षम नेता नहीं मानते। दूसरी ओर उदारवादी और सेक्यूलर वर्ग का एक हिस्सा यह कहकर उनकी बातों को महत्व देता है कि वे एक प्रतिष्ठित इतिहासकार हैं और उनकी राय को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। इस तरह एक ही कथन दो अलग-अलग राजनीतिक समूहों में दो अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति करता है।

यहीं से असली बहस शुरू होती है। क्या इतिहास लेखन को इतिहासकार की सामाजिक और राजनीतिक सोच से अलग करके देखा जा सकता है? इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं होता, बल्कि घटनाओं की व्याख्या भी होता है। हर इतिहासकार अपने अनुभव, विचार और दृष्टिकोण के माध्यम से इतिहास को देखता और प्रस्तुत करता है। इसलिए यह मान लेना कि किसी व्यक्ति का इतिहास लेखन एकदम निष्पक्ष और उसकी राजनीतिक राय उससे पूरी तरह अलग है, शायद वास्तविकता से दूर होगा।

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भारत में रोमिला थापर जैसी इतिहासकारों का उदाहरण सामने है। उनके लेखन और उनके सार्वजनिक राजनीतिक विचारों में स्पष्ट वैचारिक निरंतरता दिखाई देती है। लोग उनसे सहमत हों या असहमत, लेकिन उनकी वैचारिक स्थिति को लेकर कोई भ्रम नहीं है। रामचंद्र गुहा का मामला अलग है। वे स्वयं को किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं बताते, लेकिन उनकी राजनीतिक टिप्पणियों का प्रभाव अक्सर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में दिखाई देता है।

रामचंद्र गुहा के आलोचकों का आरोप है कि भले ही वे स्वयं को बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थक नहीं बताते, लेकिन उनके अनेक सार्वजनिक वक्तव्य और राजनीतिक विश्लेषण व्यवहारिक रूप से उसी राजनीतिक विमर्श को मजबूत करते दिखाई देते हैं जिसे बीजेपी और आरएसएस आगे बढ़ाना चाहते हैं। खासकर राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व पर उनकी लगातार आलोचनात्मक टिप्पणियों को लेकर यह सवाल बार-बार उठता है कि उनका राजनीतिक प्रभाव अंततः किसके पक्ष में जाता है।

यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि किसी भी लोकतंत्र में राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी या किसी भी नेता की आलोचना करना पूरी तरह वैध है। आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन लोकतंत्र में यह प्रश्न पूछना भी उतना ही वैध है कि किसी प्रभावशाली बुद्धिजीवी की लगातार दोहराई जाने वाली टिप्पणियां किस राजनीतिक कथा को मजबूत कर रही हैं। यदि कोई सार्वजनिक बौद्धिक बार-बार विपक्ष के सबसे प्रमुख चेहरे को अयोग्य बताता है, तो यह स्वाभाविक है कि उसके राजनीतिक परिणामों का विश्लेषण किया जाए।

आज भारतीय राजनीति में राहुल गांधी बीजेपी और आरएसएस के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते हैं। वे संविधान, सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता और संस्थागत स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर लगातार सरकार को चुनौती देते हैं। ऐसे समय में जब विपक्ष का सबसे प्रमुख चेहरा राहुल गांधी हैं, तब उनके नेतृत्व को लगातार कमजोर बताने वाली टिप्पणियां स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस का हिस्सा बनती हैं। यही कारण है कि रामचंद्र गुहा के आलोचक पूछते हैं कि यदि उनकी टिप्पणियों का सबसे अधिक राजनीतिक लाभ बीजेपी को मिलता है, तो क्या उनकी भूमिका को केवल एक तटस्थ इतिहासकार की भूमिका माना जा सकता है?

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हालांकि यह कहना कि रामचंद्र गुहा किसी राजनीतिक संगठन के “एजेंट” हैं, एक गंभीर आरोप होगा जिसके लिए सार्वजनिक प्रमाण आवश्यक हैं। लेकिन यह सवाल उठाना पूरी तरह वैध है कि उनकी राजनीतिक टिप्पणियां किस प्रकार का प्रभाव पैदा करती हैं और उस प्रभाव का लाभ किसे मिलता है। लोकतंत्र में विचारों का मूल्यांकन उनके परिणामों से भी किया जाता है, केवल उनके इरादों से नहीं।

असल मुद्दा रामचंद्र गुहा नहीं हैं। असल मुद्दा यह है कि भारत के सार्वजनिक बुद्धिजीवी अपनी बौद्धिक प्रतिष्ठा का उपयोग किस प्रकार के राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। यदि कोई इतिहासकार बार-बार ऐसे निष्कर्षों पर पहुंचता है जिनसे एक विशेष राजनीतिक धारा को लाभ मिलता है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में नेताओं की तरह बुद्धिजीवियों को भी आलोचना और जांच के दायरे में रहना चाहिए।

आखिरकार, लोकतंत्र केवल सत्ता से सवाल पूछने का नाम नहीं है। लोकतंत्र उन लोगों से भी सवाल पूछने का अधिकार देता है जो समाज की राय को प्रभावित करते हैं। रामचंद्र गुहा पर चल रही बहस भी इसी बड़े प्रश्न का हिस्सा है—क्या भारत के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी वास्तव में तटस्थ हैं, या वे भी अनजाने में किसी राजनीतिक परियोजना को मजबूत कर रहे हैं? यह प्रश्न आज भी खुला है और शायद आने वाले वर्षों तक भारतीय बौद्धिक विमर्श का हिस्सा बना रहेगा।

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