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चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ के आरोपों से घमासान, RTI के जवाब ने बढ़ाए सवाल; आयोग या सरकार का पालतू?

सैकड़ों पन्नों का हवाला देकर नया आवेदन देने की सलाह; साकेत गोखले के मामले में आयोग की कार्यशैली कठघरे में—देश से विदेश तक निष्पक्षता और पारदर्शिता पर बहस तेज!

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026

चुनाव आयोग पर उठते सवाल अब केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रह गए हैं। वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों, कथित ‘वोट चोरी’ और सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर आयोग की कार्यशैली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष और आलोचकों का आरोप है कि जिस संस्था पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, वही अपनी पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर जनता के सवालों का संतोषजनक जवाब देने में नाकाम दिखाई दे रही है।

सवाल सीधा है—जब जनता चुनाव आयोग से जवाब मांगती है, तो उसे स्पष्ट जानकारी मिलेगी या प्रक्रिया और नियमों का हवाला देकर दोबारा आवेदन करने की सलाह?

RTI के जवाब ने बढ़ाई बहस

12 अक्टूबर 2026 के प्रथम अपील आदेश संख्या 3741 ने इस विवाद को और हवा दी है। आदेश में कहा गया कि मांगी गई जानकारी कई फाइलों में फैली हुई है और सैकड़ों पन्नों में उपलब्ध है। साथ ही, अधिकारियों की चुनाव संबंधी जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए आवेदक साकेत गोखले को स्पष्ट और सीमित बिंदुओं के साथ नया आवेदन दाखिल करने की सलाह दी गई।

यहीं से सवाल खड़ा होता है—क्या किसी संवैधानिक संस्था के अधिकारियों का काम का बोझ नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार को सीमित करने का आधार बन सकता है? यदि जानकारी बहुत विस्तृत है, तो उसे चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराने का रास्ता क्यों नहीं बताया जाता? यदि कोई सूचना कानून के तहत नहीं दी जा सकती, तो उसका स्पष्ट कानूनी आधार सामने क्यों नहीं रखा जाता?

जनता को बहाने नहीं, जवाब चाहिए।

चुनाव आयोग या सरकार का पालतू?

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। उसकी जिम्मेदारी किसी सरकार की राजनीतिक सुविधा के अनुसार चलना नहीं, बल्कि संविधान और कानून के तहत निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। लेकिन जब आयोग की कार्यशैली पर बार-बार सवाल उठते हैं, तो केवल संवैधानिक गरिमा का हवाला देना काफी नहीं होता। जनता का भरोसा पारदर्शी कामकाज और स्पष्ट जवाबों से बनता है।

आलोचकों का आरोप है कि आयोग का रवैया उसकी स्वतंत्रता पर संदेह पैदा करता है और उसे सरकार के दबाव में काम करने वाली संस्था जैसा दिखाता है। इसी वजह से ‘सरकार का पालतू’ होने जैसे तीखे राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं। आयोग के लिए इन आरोपों का सबसे प्रभावी जवाब यही होगा कि वह तथ्यों और रिकॉर्ड के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट करे।

‘वोट चोरी’ के आरोप और जवाबदेही का सवाल

विपक्ष लंबे समय से मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जरूरी है कि संबंधित रिकॉर्ड की जांच हो, शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा किया जाए और जहां गड़बड़ी मिले, वहां जिम्मेदारी तय हो।

किसी आरोप को केवल दोहराने से वह साबित नहीं हो जाता, लेकिन आरोपों का जवाब देने से बचने या पारदर्शिता को लेकर संदेह बने रहने से भी संस्था पर जनता का भरोसा कमजोर होता है। चुनाव आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायतों की जांच कैसे की जा रही है, मतदाता सूची से जुड़े विवादों का निपटारा किस आधार पर होता है और सूचना मांगने वाले नागरिकों को रिकॉर्ड तक पहुंचने का रास्ता क्या है।

RTI कोई एहसान नहीं, कानूनी अधिकार है

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का कानूनी माध्यम देता है। कानून की धारा 7(9) सूचना उपलब्ध कराने के स्वरूप से संबंधित है; इसे हर व्यापक आवेदन पर सूचना देने से इनकार करने की सामान्य छूट नहीं माना जा सकता।

इस मामले में आयोग को मूल RTI आवेदन, जन सूचना अधिकारी के जवाब और प्रथम अपील के आदेश के आधार पर स्पष्ट करना चाहिए कि कौन-सी जानकारी मांगी गई थी, उसे किस कारण से उपलब्ध नहीं कराया गया और नया आवेदन देने की सलाह क्यों जरूरी समझी गई। यदि आवेदन बहुत व्यापक था, तो आवेदक को सूचना पाने के लिए व्यावहारिक और स्पष्ट रास्ता बताया जाना चाहिए।

काम का बोझ किसी संस्था की प्रशासनिक चुनौती हो सकता है, लेकिन नागरिकों के सवालों से बचने का स्थायी बहाना नहीं बनना चाहिए।

जनता का भरोसा कैसे लौटेगा?

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही के मानकों पर खरा उतरने से तय होती है। इस एक अपीलीय आदेश से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आयोग ने किसी घोटाले को छिपाने के लिए जानबूझकर जानकारी रोकी। लेकिन यह आदेश आयोग की सूचना देने की प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों पर गंभीर सवाल जरूर खड़े करता है।

यदि आयोग पर लग रहे आरोप निराधार हैं, तो उसे रिकॉर्ड और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए। यदि प्रक्रिया में कमी है, तो उसे दूर करना चाहिए। और यदि किसी अधिकारी ने कानून के विपरीत काम किया है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

लोकतंत्र में चुनाव आयोग जनता से ऊपर नहीं है। उसकी ताकत जनता के विश्वास और संवैधानिक निष्पक्षता में है। जनता सवाल पूछेगी, जवाबदेही मांगेगी और पारदर्शिता की मांग करेगी। आयोग को तय करना है कि वह इन सवालों का सामना स्पष्ट जवाबों से करेगा या अपनी कार्यशैली पर उठते संदेहों को और गहरा होने देगा।

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