कानून | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 23 अक्टूबर 2026
जिस पुलिस का काम गिरफ्तारी करना, जांच करना और कानून लागू कराना है, अगर उसी पुलिस व्यवस्था के अधिकारी को मजिस्ट्रेट की शक्तियां भी मिल जाएं, तो निष्पक्ष न्याय की गारंटी कौन देगा? जब पुलिस ही कार्रवाई करे, पुलिस ही आरोपी को अपने सामने पेश करे और फिर पुलिस व्यवस्था के भीतर ही रिमांड का आदेश देने की भूमिका निभाई जाए, तो आम नागरिक के मन में न्याय की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
दिल्ली और कमिश्नर प्रणाली वाले दूसरे राज्यों में ACP स्तर के अधिकारियों को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट नियुक्त करने की व्यवस्था पर यही बुनियादी सवाल उठ रहा है। आलोचकों का तर्क है कि जांच करने वाली एजेंसी और मजिस्ट्रेट की भूमिका के बीच पर्याप्त दूरी न रहे, तो निष्पक्षता और स्वतंत्र निर्णय की संवैधानिक भावना कमजोर पड़ सकती है।
सवाल केवल एक अधिकारी के अधिकारों का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, हिरासत और कानूनी सुरक्षा से जुड़े फैसले लिए जाते हैं।
जांच भी पुलिस करे, फैसला भी पुलिस व्यवस्था के भीतर?
न्याय व्यवस्था का एक बुनियादी सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने वाली एजेंसी और उसके मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करने वाली न्यायिक संस्था की भूमिकाएं अलग और स्पष्ट होनी चाहिए। पुलिस का काम अपराध की जांच करना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना है। न्यायिक निर्णय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य की शक्ति का इस्तेमाल कानून की सीमाओं के भीतर हो।
ऐसे में जब पुलिस अधिकारी को कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां भी दी जाती हैं, तो सवाल उठता है कि इन शक्तियों का दायरा क्या है, उनका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जा सकता है और उनके दुरुपयोग से बचाव के लिए कौन-सी स्वतंत्र निगरानी मौजूद है?
हर स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका को स्वतः अवैध कहना सही नहीं होगा। कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां कानून में निर्धारित हैं और वे नियमित न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियों के समान नहीं होतीं। लेकिन जहां इन शक्तियों का इस्तेमाल व्यक्ति की स्वतंत्रता या पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों में होता है, वहां अधिकारों की स्पष्ट सीमा और प्रभावी न्यायिक निगरानी बेहद जरूरी है।



