राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/चेन्नई | 23 जून 2026
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय सरकार ने थिरुप्परंकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित दरगाह के निकट दीप प्रज्वलन से जुड़े विवाद को लेकर मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस मामले ने राज्य की राजनीति और धार्मिक-सांस्कृतिक बहस को एक बार फिर गर्म कर दिया है।
राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर मद्रास हाईकोर्ट की उस व्यवस्था को चुनौती दी है, जिसमें सुब्रमणिय स्वामी मंदिर प्रशासन को ‘दीपथून’ (पत्थर के स्तंभ) पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति देने का आदेश बरकरार रखा गया था। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इससे पहले एकल पीठ के आदेश की पुष्टि की थी।
थिरुप्परंकुंद्रम पहाड़ी मदुरै क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है, जहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की आस्था से जुड़े स्थान मौजूद हैं। इसी कारण यह विवाद केवल प्रशासनिक या कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलता से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
विजय सरकार का तर्क है कि इस क्षेत्र की संवेदनशील प्रकृति को देखते हुए किसी भी निर्णय का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। राज्य सरकार का मानना है कि शांति, कानून-व्यवस्था और विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्द बनाए रखने के लिए मामले की व्यापक न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।
दूसरी ओर, मंदिर पक्ष का कहना है कि कार्तिगई दीपम जलाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और इसे धार्मिक अधिकारों तथा परंपरागत आस्था के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका दावा है कि यह धार्मिक अनुष्ठान किसी समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दल सरकार पर धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप का आरोप लगा रहे हैं, जबकि सरकार समर्थक पक्ष का कहना है कि राज्य प्रशासन केवल संभावित विवादों को रोकने और सामाजिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा या फिर मामले की नई सुनवाई होगी। इस फैसले का असर केवल थिरुप्परंकुंद्रम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धार्मिक स्थलों, परंपराओं और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़े कई समान मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
तमिलनाडु की राजनीति में यह मुद्दा आस्था, परंपरा, कानून और प्रशासन के बीच संतुलन की नई परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।




