राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 अक्टूबर 2026
देश की राजनीति में GEN Z यानी नई पीढ़ी के युवाओं की आवाज अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और नरेंद्र मोदी सरकार के लिए एक अहम चुनौती के रूप में चर्चा में है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, सरकारी भर्ती में कथित अनियमितताओं और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों ने युवाओं के असंतोष को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक अपनी बात रखने वाली यह पीढ़ी अब केवल भाषणों और आश्वासनों से संतुष्ट होती नहीं दिखती।
युवाओं की इसी नाराजगी और बदलते राजनीतिक व्यवहार को समझने के लिए RSS की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक 2 से 4 नवंबर तक मध्य प्रदेश के इंदौर में होने वाली है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में युवाओं के असंतोष, बेरोजगारी, परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और SIR को लेकर जारी विरोध-प्रदर्शनों पर चर्चा होने की संभावना है।
युवाओं के सवालों से क्यों बढ़ी चुनौती?
GEN Z ऐसी पीढ़ी है, जो इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों के जरिए देश-दुनिया की घटनाओं पर नजर रखती है। यह पीढ़ी सरकारी नीतियों, राजनीतिक बयानों और प्रशासनिक फैसलों पर तुरंत प्रतिक्रिया देती है। इसके लिए राजनीतिक संवाद केवल पारंपरिक मंचों, रैलियों और संगठनों तक सीमित नहीं है।
बेरोजगारी और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं का मुद्दा लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी वर्षों तक मेहनत करते हैं। ऐसे में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने या भर्ती प्रक्रिया में देरी की खबरें उनके भरोसे को प्रभावित करती हैं। युवाओं के लिए यह केवल राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि रोजगार, आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक भविष्य का सवाल है।
यही वजह है कि इन मुद्दों पर उठने वाली आवाज को केवल विपक्ष की राजनीति बताकर खारिज करना आसान नहीं है। युवाओं की शिकायतों का जवाब ठोस नीतियों, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई से ही दिया जा सकता है।
मोदी सरकार के सामने जवाबदेही की चुनौती
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सामने युवाओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का सवाल महत्वपूर्ण है। सरकार रोजगार, शिक्षा और अवसरों को लेकर अपनी नीतियों का बचाव करती रही है, लेकिन युवाओं के बीच उठ रहे सवाल बताते हैं कि सरकारी दावों के साथ जमीन पर परिणाम दिखाना भी जरूरी है।
GEN Z के एक हिस्से में राजनीतिक नेतृत्व और सरकारी संस्थाओं से अधिक पारदर्शिता की मांग दिखाई देती है। युवा यह जानना चाहते हैं कि भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई हुई, रिक्त पद कब भरे जाएंगे और परीक्षा व्यवस्था को भरोसेमंद बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
सरकार के सामने चुनौती केवल विरोध को शांत कराने की नहीं, बल्कि असंतोष के कारणों को समझने और उनका समाधान करने की है। यदि युवाओं को लगता है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, तो राजनीतिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ सकता है।
SIR विवाद ने भी बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद भी RSS की बैठक में चर्चा का विषय बन सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, संघ परिवार के भीतर इस बात पर विचार हो रहा है कि युवाओं के बदलते राजनीतिक व्यवहार और विरोध-प्रदर्शनों से किस तरह संवाद स्थापित किया जाए।
RSS के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा कि युवाओं की चिंताएं वास्तविक हैं और सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी उन्हें स्वीकार किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भागवत के विजयादशमी संबोधन में कुछ आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों की संभावित भूमिका का उल्लेख करने को युवाओं की वास्तविक समस्याओं पर संघ के रुख में बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, ये अलग-अलग विषय हैं।
हालांकि, किसी आंदोलन में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को प्रमाण के बिना तथ्य नहीं माना जा सकता। बेरोजगारी, परीक्षा में अनियमितताओं और मतदाता सूची से जुड़े सवालों की जांच पारदर्शी तरीके से होना जरूरी है।
RSS के सामने नई पीढ़ी से जुड़ने की चुनौती
RSS का संगठनात्मक ढांचा लंबे समय से शाखाओं, स्थानीय नेटवर्क और प्रत्यक्ष संपर्क पर आधारित रहा है। लेकिन नई पीढ़ी की राजनीतिक अभिव्यक्ति का बड़ा हिस्सा अब डिजिटल मंचों, स्वतंत्र कंटेंट निर्माताओं और सोशल मीडिया अभियानों के जरिए सामने आता है।
इस बदलाव के बीच संघ के लिए यह समझना जरूरी होगा कि युवा केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर किसी संगठन से नहीं जुड़ते। रोजगार, शिक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अवसरों की समानता और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दे भी उनकी सोच को प्रभावित करते हैं।
इंदौर की बैठक में इन सवालों पर चर्चा की संभावना इस बात का संकेत है कि युवाओं के साथ संवाद और उनके असंतोष को समझना संघ के लिए महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। हालांकि, बैठक के अंतिम फैसलों या किसी नई रणनीति की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।
युवाओं को भाषण नहीं, समाधान चाहिए
GEN Z की राजनीतिक भूमिका को किसी एक विचारधारा या संगठन के समर्थन अथवा विरोध तक सीमित नहीं किया जा सकता। इस पीढ़ी के भीतर अलग-अलग विचार और प्राथमिकताएं हैं। लेकिन बेरोजगारी, परीक्षा की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े सवालों पर युवाओं की भागीदारी को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए आसान नहीं होगा।
मोदी सरकार और RSS के सामने असली कसौटी यही है कि वे युवाओं के सवालों का जवाब किस तरह देते हैं। क्या रोजगार और शिक्षा से जुड़ी शिकायतों पर ठोस कार्रवाई होगी? क्या सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी? और क्या असहमति को लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा माना जाएगा?
इंदौर की बैठक में होने वाला मंथन इन सवालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। युवाओं का भरोसा केवल नारों या संवाद कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि समस्याओं के समाधान और अपने भविष्य को लेकर भरोसेमंद अवसर मिलने से बनेगा।



