महिला | विमला कुमारी, दिल्ली अध्यक्ष, इंडियन योगिनी संगठन
आद्या कौशलम् ट्रस्ट | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 मई 2026
“मातृ देवो भवः” : माँ केवल रिश्ता नहीं, जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है
भारतीय संस्कृति में माँ को केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि सृष्टि की सबसे पवित्र शक्ति माना गया है। हमारे वेद, उपनिषद और धर्मग्रंथ सदियों से यह संदेश देते आए हैं कि माँ का स्थान संसार में सर्वोच्च है। तैत्तिरीय उपनिषद का महान वाक्य — “मातृ देवो भवः” — हमें यह शिक्षा देता है कि माता को देवता के समान सम्मान देना चाहिए। यह केवल एक धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन की आत्मा है।
माँ वह पहली शक्ति है, जिससे मनुष्य इस संसार में परिचित होता है। बच्चे का पहला स्पर्श, पहली आवाज, पहला प्रेम और पहला विश्वास — सब माँ से ही जुड़ा होता है। जब एक शिशु जन्म लेता है, तब वह कुछ नहीं जानता। उसे बोलना, चलना, समझना, प्रेम करना और जीवन जीना माँ ही सिखाती है। इसलिए कहा जाता है कि बच्चे का पहला विद्यालय उसकी माँ की गोद होती है।
माँ केवल बच्चों का पालन-पोषण नहीं करती, बल्कि उनके व्यक्तित्व और संस्कारों की नींव तैयार करती है। वह अपने बच्चों को केवल भोजन नहीं देती, बल्कि जीवन जीने की शक्ति, आत्मविश्वास और नैतिक मूल्य भी देती है। जब बच्चा गिरता है, तो माँ उसे उठना सिखाती है। जब वह डरता है, तो माँ उसके भीतर साहस जगाती है। जब वह दुखी होता है, तो माँ अपने आँचल में उसके आँसू छिपा लेती है।
माँ का प्रेम संसार का सबसे पवित्र और निस्वार्थ प्रेम माना गया है। उसमें कोई स्वार्थ नहीं होता। वह स्वयं भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चों को भूखा नहीं देख सकती। वह दिन-रात मेहनत करती है, अपने सुख और आराम का त्याग करती है और अपने बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए हर कठिनाई सहन करती है। यही त्याग और ममता माँ को ईश्वर के सबसे सुंदर रूप के रूप में स्थापित करते हैं।
भारतीय संस्कृति में मातृत्व को शक्ति का स्वरूप माना गया है। हम धरती को “भारत माता”, गाय को “गौ माता” और नदियों को “माँ” कहकर संबोधित करते हैं। इसका अर्थ यह है कि जहाँ पालन, करुणा, सुरक्षा और जीवन देने की शक्ति होती है, वहाँ मातृत्व का सम्मान स्वतः जुड़ जाता है।
हमारे इतिहास में भी अनेक महान व्यक्तियों की सफलता के पीछे उनकी माताओं के संस्कारों की सबसे बड़ी भूमिका रही है। छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता के पीछे माता जीजाबाई के संस्कार थे। स्वामी विवेकानंद के भीतर राष्ट्रभक्ति और आत्मबल उनकी माँ से ही आया। महात्मा गांधी के जीवन पर भी उनकी माता पुतलीबाई के आदर्शों की गहरी छाप थी। इससे स्पष्ट होता है कि एक माँ केवल परिवार नहीं बनाती, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के भविष्य को आकार देती है।
आज आधुनिकता और भागदौड़ भरे जीवन में सबसे बड़ा संकट यह है कि लोग अपने माता-पिता, विशेषकर माँ, के लिए समय निकालना भूलते जा रहे हैं। कई वृद्ध माताएँ अपने ही घरों में अकेलापन महसूस करती हैं। यह स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक संकट भी है।
“मातृ देवो भवः” का अर्थ केवल माँ को भगवान कहना नहीं, बल्कि उनके प्रति प्रेम, सम्मान, सेवा और कृतज्ञता का भाव रखना भी है। माँ का सम्मान केवल एक दिन “मदर्स डे” मनाने से पूरा नहीं होता। सच्चा सम्मान तब होता है जब हम उनकी भावनाओं को समझें, उनके साथ समय बिताएँ और उन्हें यह महसूस कराएँ कि वे हमारे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति हैं।
माँ का आशीर्वाद जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होता है। जब माँ अपने बच्चों के लिए प्रार्थना करती है, तो उसमें केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा की शक्ति होती है। दुनिया बदल सकती है, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन माँ का प्रेम कभी नहीं बदलता। वह हर हाल में अपने बच्चों की सफलता और खुशियों के लिए भगवान से प्रार्थना करती रहती है।
आज की नई पीढ़ी को भारतीय संस्कारों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बच्चों को बचपन से यह सिखाना चाहिए कि माता-पिता का सम्मान करना हमारा पहला कर्तव्य है। जिस घर में माँ का सम्मान होता है, वहाँ सुख, शांति और सकारात्मकता बनी रहती है। माँ परिवार की आत्मा होती है। उसकी मुस्कान पूरे घर को खुशियों से भर देती है।
माँ केवल घर संभालने वाली महिला नहीं, बल्कि परिवार की शक्ति, धैर्य और भावनात्मक आधार होती है। वह बिना किसी शिकायत के अपने परिवार के लिए हर दिन समर्पित रहती है। अपने बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों में वह अपनी पूरी दुनिया खोज लेती है। बच्चे की सफलता देखकर उसकी आँखों में जो खुशी आती है, वही उसके जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।
“मातृ देवो भवः” हमें यह भी सिखाता है कि माँ का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से होना चाहिए। हमें उनकी भावनाओं को समझना चाहिए, उनका आदर करना चाहिए और जीवन के हर चरण में उनका साथ देना चाहिए। क्योंकि सच यही है कि माँ को सबसे अधिक खुशी अपने बच्चों के प्रेम और सम्मान से ही मिलती है।
यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी माँ का सच्चे मन से सम्मान करना सीख जाए, तो परिवारों में प्रेम, संस्कार और मानवीय संवेदनाएँ और मजबूत होंगी। माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि जीवन की सबसे सुंदर अनुभूति है। उसकी ममता, त्याग और आशीर्वाद का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता।
अंत में बस इतना ही— “माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, ममता और जीवन की सबसे बड़ी शक्ति का नाम है।”




