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विश्वगुरु के सपनों की कीमत: आयनी, फरखोर और चाबहार में लगा पैसा, 25 वर्षों की मेहनत और आखिर कितना हुआ नुकसान?

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ओपिनियन | प्रणव प्रियदर्शी | ABC NATIONAL NEWS | 1 मई 2026

किसी भी देश की ताकत सिर्फ उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके फैसलों और निवेश से मापी जाती है। जब कोई देश अपनी सीमाओं से बाहर जाकर ठिकाने बनाता है, बंदरगाह विकसित करता है और दूर-दराज के इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है, तो वह सिर्फ पैसा नहीं लगाता—वह अपना समय, अपनी रणनीति और अपना भविष्य दांव पर लगाता है। भारत ने भी पिछले 25 वर्षों में यही कोशिश की। मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में अपनी पहुंच बनाने के लिए तीन बड़े स्तंभ खड़े किए—फरखोर एयरबेस, आयनी एयरबेस और चाबहार पोर्ट। लेकिन आज तस्वीर यह है कि इन तीनों में लगी मेहनत और संसाधनों का बड़ा हिस्सा या तो कमजोर पड़ चुका है या हाथ से निकल चुका है।

फरखोर एयरबेस से शुरुआत करें तो यह भारत की पहली विदेशी सैन्य मौजूदगी में गिना जाता था। 1996 के आसपास यहां काम शुरू हुआ। ताजिकिस्तान के इस बेस को उपयोगी बनाने के लिए करीब 10 मिलियन डॉलर यानी लगभग 80-85 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यहां रनवे को अपग्रेड किया गया ताकि लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर उतर सकें, मेडिकल और लॉजिस्टिक सुविधाएं बनाई गईं, और करीब 50 भारतीय कर्मी तैनात किए गए। यह बेस अफगानिस्तान के पास था, इसलिए इसका महत्व सिर्फ सैन्य नहीं बल्कि खुफिया दृष्टि से भी बेहद अहम था। लेकिन 2008 के बाद यह पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो गई। पैसा लगा, ढांचा बना, लेकिन अंत में वह मौजूदगी टिक नहीं पाई।

इसके बाद आयनी एयरबेस आया, जिसे भारत की सबसे बड़ी विदेशी सैन्य परियोजना माना गया। 2002 से शुरू होकर करीब 20 साल तक इस पर काम चलता रहा। अलग-अलग रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें 80 से 100 मिलियन डॉलर यानी करीब 700 से 850 करोड़ रुपये तक खर्च हुए। 3200 मीटर लंबा रनवे तैयार किया गया, जहां C-17 ग्लोबमास्टर जैसे भारी विमान और सुखोई लड़ाकू विमान आसानी से उतर सकते थे। 2011 के बाद यहां रडार सिस्टम लगाए गए, ईंधन भंडारण की व्यवस्था बनाई गई और करीब 250 सैनिकों की तैनाती की गई। 2017 में यह बेस पूरी तरह तैयार माना गया। यह सिर्फ एक एयरबेस नहीं था, बल्कि भारत की रणनीतिक उपस्थिति का प्रतीक था—एक ऐसी जगह जहां से अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन के इलाकों पर नजर रखी जा सकती थी। लेकिन 2022 के बाद यह भी खाली हो गया। दो दशक की मेहनत, सैकड़ों करोड़ का निवेश और एक मजबूत रणनीतिक आधार—सब धीरे-धीरे खत्म हो गया।

तीसरी और सबसे बड़ी कहानी है चाबहार पोर्ट की। यह परियोजना सिर्फ सैन्य नहीं बल्कि आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से बेहद अहम थी। 2003 में इसकी शुरुआत हुई और 2016 में भारत ने 10 साल के लिए संचालन का समझौता किया। यहां भारत ने करीब 85 मिलियन डॉलर यानी लगभग 700 करोड़ रुपये का सीधा निवेश किया। इसके अलावा कुल परियोजना क्षमता को देखें तो यह आंकड़ा अरबों डॉलर तक पहुंचता है। चाबहार के जरिए भारत ने 2.5 मिलियन टन से ज्यादा माल की आवाजाही की, अफगानिस्तान को गेहूं भेजा और एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग तैयार किया। यह पोर्ट चीन के ग्वादर प्रोजेक्ट का संतुलन माना जाता था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और बदलते हालात के कारण 2026 में भारत की भूमिका सीमित हो गई और यह परियोजना भी वैसी नहीं रही जैसी शुरुआत में थी।

अगर इन तीनों परियोजनाओं को एक साथ जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ होती है। फरखोर में लगभग 10 मिलियन डॉलर, आयनी में 80-100 मिलियन डॉलर और चाबहार में कम से कम 85 मिलियन डॉलर—यानी सीधे तौर पर करीब 175 से 195 मिलियन डॉलर, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 1500 से 1700 करोड़ रुपये के बराबर बैठता है। इसमें वह अप्रत्यक्ष लागत शामिल नहीं है जो वर्षों की कूटनीतिक मेहनत, सैन्य तैनाती, लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक तैयारी में लगी। अगर इन सबको जोड़ें तो यह आंकड़ा और भी बड़ा हो जाता है।

लेकिन नुकसान सिर्फ पैसों का नहीं है। इससे कहीं बड़ा नुकसान रणनीतिक है। इन ठिकानों के जरिए भारत ने जो पहुंच बनाई थी, वह कम हो गई। मध्य एशिया तक सीधी पहुंच, अफगानिस्तान के पास मौजूदगी, चीन और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक नजर—ये सभी फायदे धीरे-धीरे कम होते गए।

यह भी समझना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर चीज सीधी नहीं होती। कई बार दबाव, समझौते और बदलते हालात फैसलों को प्रभावित करते हैं। लेकिन यह सवाल फिर भी रहता है कि क्या इतने बड़े निवेश और लंबे समय की मेहनत के बाद हम उन ठिकानों को बचा पाए?

सबसे दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि इन घटनाओं पर खुलकर चर्चा बहुत कम हुई। जहां छोटी उपलब्धियों पर बड़े जश्न होते हैं, वहीं ऐसे बड़े रणनीतिक बदलाव अक्सर चुपचाप गुजर जाते हैं। आज जरूरत है कि इन अनुभवों से सीखा जाए। क्योंकि देश की ताकत सिर्फ यह नहीं कि वह क्या बना सकता है, बल्कि यह भी कि वह उसे कितने समय तक बचाकर रख सकता है।

बात साफ है—करीब 1500-1700 करोड़ रुपये का सीधा निवेश, 25 साल की मेहनत और एक बड़ा रणनीतिक सपना—जिसका बड़ा हिस्सा अब पहले जैसा नहीं रहा। सवाल यह नहीं कि गलती किसकी थी, सवाल यह है कि अगली बार क्या यह कहानी दोहराई जाएगी या इससे कुछ सीखा जाएगा।

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