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एंडोमेट्रियोसिस की पहचान अब होगी जल्द मुमकिन : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की नई स्कैन तकनीक से उम्मीद

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स्वास्थ्य | लुबना आबिदी | ABC NATIONAL NEWS | लंदन | 1 मई 2026

लंदन। महिलाओं में पाई जाने वाली गंभीर बीमारी एंडोमेट्रियोसिस की पहचान अब पहले से जल्दी हो सकती है। University of Oxford में हुए एक पायलट अध्ययन में नई स्कैन तकनीक को लेकर उम्मीद जताई गई है, जिससे इस बीमारी का पता शुरुआती चरण में लगाया जा सकेगा। एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गर्भाशय की परत जैसा ऊतक शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है। इससे महिलाओं को लगातार तेज दर्द, भारी पीरियड्स, पेट और पीठ में तकलीफ और कई बार गर्भधारण में दिक्कत जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस बीमारी की सबसे बड़ी परेशानी यही रही है कि इसका सही पता लगाने में अक्सर 6 से 8 साल तक लग जाते हैं, जिसके कारण मरीज लंबे समय तक बिना सही इलाज के परेशान रहती हैं।

अगर भारत की बात करें तो अनुमान है कि देश में करोड़ों महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं, लेकिन बड़ी संख्या में मामलों की पहचान ही नहीं हो पाती। ग्रामीण और छोटे शहरों में जागरूकता की कमी के कारण इसे सामान्य पीरियड दर्द समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यही वजह है कि कई महिलाएं सालों तक दर्द सहती रहती हैं और सही इलाज तक नहीं पहुंच पातीं।

दुनियाभर में भी यह बीमारी बहुत आम है। अनुमान के मुताबिक, दुनिया में हर 10 में से 1 महिला एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित हो सकती है। इसका मतलब है कि करीब 19 से 20 करोड़ महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं। इसके बावजूद यह बीमारी लंबे समय तक पहचान से दूर रहती है, जिससे महिलाओं की जीवन गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ता है।

इलाज की बात करें तो अभी तक इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टर आमतौर पर दर्द कम करने के लिए दवाएं देते हैं, हार्मोन थेरेपी का सहारा लिया जाता है ताकि असामान्य ऊतक की वृद्धि को रोका जा सके। गंभीर मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ती है, जिसमें उस अतिरिक्त ऊतक को हटाया जाता है। कई बार महिलाओं को बार-बार सर्जरी भी करानी पड़ती है।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोध में जिस नई स्कैन तकनीक का परीक्षण किया गया है, वह शरीर के भीतर मौजूद इस असामान्य ऊतक को पहचानने में मदद करती है। शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक पारंपरिक तरीकों की तुलना में ज्यादा तेज और सटीक परिणाम दे सकती है, जिससे बीमारी की पहचान समय रहते हो सकेगी।

अब तक इस बीमारी की पुष्टि के लिए सर्जरी एक अहम तरीका माना जाता रहा है, जो जटिल होने के साथ-साथ मरीज के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण भी होता है। कई मामलों में डॉक्टर केवल लक्षणों के आधार पर इलाज शुरू कर देते हैं, जिससे सही स्थिति का अंदाजा लगाने में देरी हो जाती है।

नई तकनीक के जरिए बिना सर्जरी के ही बीमारी की पहचान संभव होने की उम्मीद है। इससे न सिर्फ मरीजों को राहत मिलेगी, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो सकता है।

अध्ययन अभी शुरुआती स्तर पर है और सीमित संख्या में मरीजों पर इसका परीक्षण किया गया है, लेकिन नतीजे सकारात्मक बताए जा रहे हैं। अब इसे बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी की जा रही है, ताकि इसकी प्रभावशीलता को और बेहतर तरीके से परखा जा सके।8

महिलाओं के स्वास्थ्य के नजरिए से यह पहल बेहद अहम मानी जा रही है। अगर यह तकनीक सफल होती है, तो न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया की करोड़ों महिलाओं को समय पर सही पहचान और बेहतर इलाज मिल सकेगा।

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