ओपिनियन | प्रणव प्रियदर्शी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 25 अप्रैल 2026
भारतीय राजनीति में एक समय ऐसा भी आया जब “नई राजनीति” का नारा लोगों को आकर्षित कर रहा था। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने खुद को पारंपरिक राजनीति के विकल्प के तौर पर पेश किया। इस पूरे प्रयोग को अक्सर “केजरीवाल मॉडल ऑफ पॉलिटिक्स” कहा गया—जहां सादगी, पारदर्शिता और आम आदमी की भागीदारी का दावा किया गया। लेकिन समय के साथ इस मॉडल पर सवाल भी उसी तेजी से खड़े हुए, जितनी तेजी से यह उभरा था।
शुरुआत में ही इस प्रयोग की सबसे बड़ी परीक्षा तब सामने आ गई जब पार्टी के कई बड़े और स्थापित चेहरे उससे अलग होने लगे। अन्ना आंदोलन से जुड़े रहे और पार्टी की वैचारिक रीढ़ माने जाने वाले Yogendra Yadav (योगेंद्र यादव) और Prashant Bhushan (प्रशांत भूषण) को 2015 में बाहर का रास्ता दिखाया गया, जिसके बाद उन्होंने खुले तौर पर पार्टी के अंदर लोकतंत्र खत्म होने के आरोप लगाए। Shazia Ilmi (शाजिया इल्मी) ने 2014 के चुनाव के बाद नेतृत्व शैली पर सवाल उठाते हुए पार्टी छोड़ दी, जबकि Anjali Damania (अंजलि दमानिया) और Mayank Gandhi (मयंक गांधी) जैसे चेहरे महाराष्ट्र में संगठन खड़ा करने के बावजूद मतभेदों के चलते अलग हो गए। Devinder Sehrawat (देविंदर सहरावत) और GR Gopinath (जी. आर. गोपीनाथ) जैसे शुरुआती समर्थकों का मोहभंग भी जल्दी ही सामने आ गया। वहीं Kumar Vishwas (कुमार विश्वास), जो लंबे समय तक पार्टी का प्रमुख चेहरा रहे, उनके मतभेद भी धीरे-धीरे सार्वजनिक होते गए और अंततः उन्होंने दूरी बना ली। इन लगातार विदाइयों ने यह सवाल खड़ा किया कि जिस पार्टी ने आंतरिक लोकतंत्र को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताया था, वहीं से इतनी जल्दी असहमति की आवाजें क्यों उठने लगीं।
इन नामों के अलावा भी कुछ ऐसे चेहरे रहे जिन्होंने पार्टी से दूरी बनाई या अलग रास्ता चुना। Gul Panag (गुल पनाग), जिन्होंने 2014 में चंडीगढ़ से चुनाव लड़ा था, बाद के वर्षों में पार्टी से अलग हो गईं। उनके अलग होने के पीछे पंजाब की राजनीति और पार्टी के कुछ निर्णयों को लेकर असहमति बताई जाती है। इसी तरह Jassi Jasraj (जस्सी जसराज) ने भी शुरुआती दौर में पार्टी से दूरी बना ली थी। Dharamvira Gandhi (डॉ. धर्मवीर गांधी), जो पटियाला से सांसद रहे, उन्हें 2015 में निलंबित किया गया और बाद में उन्होंने भी पार्टी से अलग राह चुन ली। ये सभी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि संगठन के भीतर मतभेद सिर्फ कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं थे, बल्कि यह एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा बनते गए।
इस मॉडल की चर्चा आज इसलिए जरूरी है क्योंकि जिन चेहरों ने इसे खड़ा किया, वही चेहरे धीरे-धीरे इससे अलग होते गए या किनारे कर दिए गए। Kumar Vishwas (कुमार विश्वास), Raghav Chadha (राघव चड्ढा) और Ashutosh (आशुतोष) जैसे चेहरे कभी इस राजनीति के चमकते प्रतीक माने जाते थे। इन लोगों ने राजनीति को बदलने का दावा किया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह बदलाव वैचारिक कम और महत्वाकांक्षा से ज्यादा प्रेरित था। आंदोलन से निकली ऊर्जा को टिकाऊ राजनीतिक संरचना में बदलना आसान नहीं होता, और यहीं से विरोधाभास शुरू हुआ।
अगर पार्टी के शुरुआती दौर को देखें, तो यह साफ दिखता है कि कांग्रेस विरोध उसकी राजनीति का केंद्रीय बिंदु था। Sheila Dikshit (शीला दीक्षित) की सरकार के खिलाफ आंदोलन ने ही AAP को जमीन दी। लेकिन इसी दौरान कई बार राजनीतिक भाषा और आचरण को लेकर सवाल उठे। आलोचकों ने आरोप लगाया कि व्यक्तिगत हमलों की राजनीति ने उस नैतिक ऊंचाई को कमजोर किया, जिस पर यह पार्टी खड़ी होने का दावा करती थी। Manmohan Singh (मनमोहन सिंह) से लेकर Rahul Gandhi (राहुल गांधी) और Sonia Gandhi (सोनिया गांधी) तक, लगभग हर बड़े नेता पर तीखे हमले किए गए—जो राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इससे “नई राजनीति” की परिभाषा पर सवाल जरूर उठे।
सबसे गंभीर आरोपों में से एक राज्यसभा टिकटों को लेकर रहा। यह आरोप बार-बार सामने आया कि पार्टी ने ऐसे लोगों को राज्यसभा भेजा, जिनकी पृष्ठभूमि राजनीतिक कम और आर्थिक या पेशेवर ज्यादा थी। Sushil Gupta (सुशील गुप्ता) और N. D. Gupta (एन. डी. गुप्ता) के नाम अक्सर इस संदर्भ में लिए जाते हैं। हालांकि पार्टी ने हमेशा इन आरोपों से इनकार किया, लेकिन यह विवाद सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना रहा। यही नहीं, पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे Prashant Bhushan (प्रशांत भूषण) और Yogendra Yadav (योगेंद्र यादव) ने भी संगठन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए और अंततः अलग रास्ता चुन लिया। इन घटनाओं ने यह धारणा मजबूत की कि अंदरूनी लोकतंत्र, जो इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत बताया जाता था, वह समय के साथ कमजोर पड़ा।
हालांकि यह भी सच है कि आम आदमी पार्टी ने शासन के स्तर पर कुछ ऐसे प्रयोग किए, जिनकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई—जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहल। लेकिन राजनीति सिर्फ नीतियों से नहीं चलती, बल्कि संगठनात्मक संस्कृति और विश्वसनीयता से भी चलती है। जब पार्टी के भीतर से ही असंतोष की आवाजें उठने लगें, तो यह संकेत होता है कि कहीं न कहीं संरचना में दरार आ रही है।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या किसी भी राजनीतिक दल का अस्तित्व सिर्फ विरोध की राजनीति पर टिक सकता है? इतिहास बताता है कि विरोध एक मंच तैयार कर सकता है, लेकिन स्थायी राजनीति के लिए सकारात्मक एजेंडा और मजबूत संगठन जरूरी होता है। अगर पार्टी के भीतर आम कार्यकर्ता के लिए जगह कम हो जाए और निर्णय कुछ सीमित लोगों तक सिमट जाएं, तो धीरे-धीरे वह दल अपनी ऊर्जा खो देता है। यही कारण है कि कई लोग आज AAP की तुलना Bahujan Samaj Party (बहुजन समाज पार्टी) से करते हैं—जहां एक समय व्यापक जनाधार था, लेकिन समय के साथ वह सिमटता गया।
“केजरीवाल मॉडल ऑफ पॉलिटिक्स” एक दिलचस्प प्रयोग जरूर था, जिसने भारतीय राजनीति को झकझोरा और नए सवाल खड़े किए। लेकिन यह मॉडल अपने ही दावों की कसौटी पर कितना खरा उतरा, इस पर बहस जारी है। राजनीति में आदर्श और व्यवहार के बीच की दूरी जितनी कम होगी, उतनी ही विश्वसनीयता बढ़ेगी। वरना हर नया प्रयोग, चाहे वह कितना भी आकर्षक क्यों न हो, अंततः उसी पुरानी राजनीति का हिस्सा बन जाता है, जिसे बदलने का दावा किया गया था।




