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सत्ता का सबसे बड़ा संकट तब शुरू होता है, जब जनता नैरेटिव पर भरोसा करना छोड़ दे

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 25 जुलाई 2026

राजनीति आखिरकार परसेप्शन का खेल है। सरकारें केवल अपने फैसलों से नहीं चलतीं, वे इस भरोसे से भी चलती हैं कि जनता उन फैसलों को किस नजर से देख रही है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सत्ता परसेप्शन बनाने में इतनी माहिर हो जाए कि उसे लगने लगे—हर संकट को एक नए नैरेटिव, कुछ अनुकूल हेडलाइंस और सोशल मीडिया मैनेजमेंट से संभाला जा सकता है। 20 जुलाई के बाद देश में, खासकर युवाओं के बीच, जो माहौल बनता दिखाई दे रहा है, वह इसी राजनीतिक आत्मविश्वास के लिए चेतावनी है।

पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ गुस्सा अब सिर्फ एक परीक्षा या एक मंत्री तक सीमित नहीं रहा। पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों के आरोप, अदालतों तक पहुंचते मामले और जवाबदेही को लेकर उठते सवालों ने सरकार, पुलिस और संस्थाओं के प्रति एक वर्ग के अविश्वास को और गहरा किया है। पैलेट गन के इस्तेमाल से दिल्ली पुलिस ने इनकार किया, CRPF मीडिया रिपोर्टों का सत्यापन कर रही है, जबकि एक घायल पत्रकार की सफदरजंग अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट में पैलेट से जुड़ी चोटों का उल्लेख सामने आया है। ऐसे विरोधाभास जनता के मन में सवाल कम नहीं करते, बल्कि बढ़ाते हैं।

और यही वह जगह है जहां सरकार शायद बदलते भारत को ठीक से पढ़ नहीं पा रही।

यह व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाला पुराना भारत भर नहीं है। सामने Instagram, X, YouTube और Facebook पर पली-बढ़ी Gen Z है। उसके हाथ में कैमरा है, स्क्रीन रिकॉर्डिंग है, पुरानी क्लिप निकालने की क्षमता है और सबसे महत्वपूर्ण—वह किसी बयान को बिना चुनौती दिए स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। सरकार कुछ कहती है तो मिनटों में उसका पुराना बयान सामने आ जाता है। पुलिस कुछ कहती है तो घटनास्थल के दस वीडियो उसके समानांतर खड़े हो जाते हैं। राजनीतिक दल नैरेटिव बनाते हैं तो मीम, रील और फैक्ट-चेक उसका जवाब देने लगते हैं।

यही कारण है कि जंतर-मंतर पर सुनाई दे रहे तीखे राजनीतिक नारे—“भ्रष्टाचारी कहां मिलेगा…” या “चंदा चोर कहां मिलेगा…”—को सिर्फ नारे समझकर खारिज करना भूल होगी। इन नारों के आरोपों को तथ्य मान लेना भी पत्रकारिता नहीं होगी, लेकिन यह समझना जरूरी है कि वे युवाओं के एक हिस्से में बन रहे राजनीतिक मूड की अभिव्यक्ति हैं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल धर्मेंद्र प्रधान का नहीं, जवाबदेही का है।

मीडिया में सूत्रों के हवाले से यह तर्क सामने आता रहा है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा समाधान नहीं है; सरकार उनके पद पर रहते हुए व्यवस्था सुधारकर यह संदेश देना चाहती है कि वह जिम्मेदारी से भाग नहीं रही। यह सरकार का राजनीतिक तर्क हो सकता है। लेकिन छात्र दूसरी तरफ से पूछ रहा है—अगर इतने बड़े संकट के बाद भी राजनीतिक जवाबदेही किसी की नहीं बनती, तो आखिर बनेगी कब?

सरकार फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए, कानून सख्त करे, NTA में सुधार करे—इन कदमों का स्वागत होना चाहिए। लेकिन प्रशासनिक सुधार और राजनीतिक जवाबदेही दो अलग बातें हैं। लोकतंत्र में मंत्री हर गलती का व्यक्तिगत अपराधी नहीं होता, मगर मंत्रालय की गंभीर और लगातार विफलताओं पर राजनीतिक जिम्मेदारी का सिद्धांत भी खत्म नहीं किया जा सकता।

यहां BJP और RSS के लिए असली चुनौती शुरू होती है।

पिछले वर्षों में भारतीय राजनीति को धार्मिक और पहचान आधारित विमर्श ने गहराई से प्रभावित किया है। लेकिन रोजगार, परीक्षा, पेपर लीक, महंगाई, शिक्षा और रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियां ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम के खांचे में हमेशा नहीं बांटा जा सकता। परीक्षा का पेपर लीक होने पर हिन्दू छात्र और मुस्लिम छात्र दोनों का भविष्य प्रभावित होता है। नौकरी न मिलने की बेचैनी जाति और धर्म पूछकर घर नहीं आती।

यदि कोई बड़ी युवा राजनीतिक पहचान इन साझा समस्याओं के इर्द-गिर्द बनने लगी, तो स्थापित राजनीतिक रणनीतियों के लिए वह कहीं कठिन चुनौती होगी।

आज मुद्दा NEET और पेपर लीक है। कल ऐसा ही सवाल एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर उठ सकता है। सरकार को उस बहस से भी नारों से नहीं, आंकड़ों से जवाब देना होगा—माइलेज पर वास्तविक असर कितना है? पुराने वाहनों की अनुकूलता क्या है? उपभोक्ता को आर्थिक लाभ कितना मिल रहा है? किसानों, तेल आयात और पर्यावरण को कितना फायदा हो रहा है? और यदि नीति से जुड़े लोगों या उनके परिजनों के कारोबारी हितों को लेकर आरोप उठते हैं, तो उनका जवाब दस्तावेजों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। बिना प्रमाण किसी मंत्री पर अपने बेटे के लिए नीति बनाने का आरोप तथ्य की तरह लिखना उचित नहीं होगा, लेकिन संभावित हितों के टकराव पर सवाल पूछना पत्रकारिता का अधिकार है।

इसी तरह भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा पर बहस हो सकती है। सरकार की विदेश नीति की उपलब्धियों, प्रधानमंत्री को मिले विदेशी सम्मानों या “विश्वगुरु” जैसे राजनीतिक नारों की आलोचना पूरी तरह जायज है। लेकिन विदेशी सम्मान “खरीदे गए” हैं, ऐसा गंभीर दावा ठोस प्रमाण के बिना तथ्य के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए। सरकार के प्रचार और वास्तविक कूटनीतिक उपलब्धि के बीच फर्क खोजने का बेहतर तरीका दस्तावेज, परिणाम और स्वतंत्र विश्लेषण हैं।

सत्ता के लिए खतरा आलोचना नहीं होती। खतरा वह क्षण होता है जब जनता को लगने लगे कि उसकी बात सुनी ही नहीं जा रही।

20 जुलाई के बाद सरकार के सामने इसलिए केवल CJP, जंतर-मंतर या धर्मेंद्र प्रधान का सवाल नहीं है। उसके सामने उस युवा का सवाल है जिसके पास डिग्री है, स्मार्टफोन है, राजनीतिक स्मृति है और हर सरकारी दावे को तत्काल जांचने के साधन हैं।

उसे पुलिस से डराकर चुप कराना कठिन है, विपक्ष कहकर खारिज करना आसान नहीं और किसी एक धार्मिक बहस में लंबे समय तक उलझाए रखना भी शायद पहले जितना सरल नहीं रहा।

सरकार के पास अभी भी रास्ता है—संवाद, पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और जहां जिम्मेदारी बनती हो वहां जवाबदेही।

क्योंकि राजनीति में परसेप्शन वर्षों में बनता है, लेकिन कभी-कभी उसे टूटने के लिए एक घटना, एक तस्वीर और एक तारीख ही काफी होती है। और संभव है कि आने वाले वर्षों की राजनीति में 20 जुलाई 2026 को इसी कसौटी पर याद किया जाए।

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