राष्ट्रीय | महेंद्र सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 11 मई 2026
भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा नीतिगत बदलाव करते हुए न्यूक्लियर पावर प्लांट्स के आसपास निर्धारित बफर जोन को कम करने का फैसला लिया है। नए प्रस्ताव के तहत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर्स के लिए बफर जोन 500 मीटर और बड़े रिएक्टर्स के लिए 700 मीटर तक सीमित किया जाएगा। अभी तक सभी परमाणु संयंत्रों के चारों ओर कम से कम एक किलोमीटर का सुरक्षा क्षेत्र अनिवार्य था, जहां आवासीय और आर्थिक गतिविधियों की अनुमति नहीं होती थी।
सरकार का मानना है कि आधुनिक और अधिक सुरक्षित परमाणु तकनीक के दौर में पुराने मानकों की समीक्षा जरूरी हो गई थी। अधिकारियों के अनुसार, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड और परमाणु ऊर्जा विभाग ने इस बदलाव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है और आने वाले महीनों में इसे अंतिम नियमों में शामिल किया जा सकता है।
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण भूमि की उपलब्धता और परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाने की रणनीति मानी जा रही है। भारत ने वर्ष 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को मौजूदा लगभग 8 गीगावॉट से बढ़ाकर 100 गीगावॉट तक ले जाने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए बड़े पैमाने पर नए प्लांट्स और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर्स स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है।
सरकार का तर्क है कि बफर जोन घटने से जमीन की जरूरत काफी कम हो जाएगी। बड़े रिएक्टर्स के लिए आवश्यक भूमि लगभग आधी और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर्स के लिए दो-तिहाई तक कम हो सकती है। इससे एक ही परिसर में ज्यादा रिएक्टर्स स्थापित किए जा सकेंगे और ऊर्जा उत्पादन क्षमता कई गुना तक बढ़ाई जा सकेगी।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, नए नियमों से औद्योगिक क्षेत्रों में कैप्टिव उपयोग के लिए छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर्स लगाने का रास्ता भी आसान होगा। सरकार यह भी चाहती है कि निजी और विदेशी निवेशकों की भागीदारी बढ़े, ताकि भारत की ऊर्जा जरूरतों को लंबे समय तक स्थिर और स्वच्छ स्रोतों से पूरा किया जा सके।
हालांकि इस फैसले को लेकर बहस भी शुरू हो गई है। कुछ विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि सुरक्षा मानकों में किसी भी तरह की ढील भविष्य में जोखिम बढ़ा सकती है। वहीं सरकार का कहना है कि भारत में इस्तेमाल हो रही नई पीढ़ी की रिएक्टर तकनीक पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित है और वैश्विक मानकों के अनुरूप है।
सरकार ने अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा है कि वहां भी निश्चित दूरी आधारित कठोर बफर जोन की व्यवस्था नहीं है, बल्कि सुरक्षा मूल्यांकन तकनीक और जोखिम विश्लेषण के आधार पर फैसले लिए जाते हैं। अधिकारियों का दावा है कि भारतीय परमाणु संयंत्रों के आसपास विकिरण स्तर सामान्य प्राकृतिक स्तर से काफी कम पाए गए हैं।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत में परमाणु परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण और स्थानीय विरोध रहा है। कई परियोजनाएं वर्षों तक सिर्फ जमीन और पर्यावरणीय मंजूरियों में फंसी रही हैं। ऐसे में नए नियम सरकार की महत्वाकांक्षी परमाणु ऊर्जा नीति को गति दे सकते हैं।
फिलहाल यह प्रस्ताव अंतिम अधिसूचना का इंतजार कर रहा है, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि भारत अब ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए परमाणु क्षेत्र में तेज विस्तार की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है।




