ओपिनियन | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | 27 जुलाई 2026
मोदी के सामने अब भाषण नहीं, संवेदना की परीक्षा है
नरेंद्र मोदी के सामने आज सवाल केवल यह नहीं है कि वे एक प्रधानमंत्री के रूप में कितने सफल या असफल रहे। इससे बड़ा सवाल यह है कि संकट में खड़े देश के युवाओं के प्रति उन्होंने एक इंसान के तौर पर कितनी संवेदना दिखाई। वर्षों से उनकी राजनीति बड़े भाषणों, चुनावी नारों और तीखे राजनीतिक हमलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। कभी गर्मियों में गन्ने के जूस का ठेला, कभी सर्दियों में मूंगफली बेचने जैसी रोजगार की बातें और कभी चुनावी मंचों से भैंस तक चुरा लिए जाने जैसे बयान—इन सबने राजनीति को गंभीर सवालों से निकालकर जुमलों की दुनिया में पहुंचाया। लेकिन नई पीढ़ी पुरानी राजनीतिक भाषा में फंसने को तैयार नहीं दिखती। इंस्टाग्राम पर ‘थैंक यू फ्रेंड्स’ की रील बना देना आसान है, लेकिन उन युवाओं की आंखों में देखकर जवाब देना कठिन है जो पूछ रहे हैं—हमारी परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं थी, हमारा भविष्य किसकी जिम्मेदारी है और हमारे विरोध का जवाब कथित तौर पर बल प्रयोग से क्यों दिया गया?
2002 से निकली राजनीति अब 2026 की पीढ़ी के सामने है
मोदी की राजनीतिक यात्रा पर गुजरात 2002 की छाया को लेकर उनके आलोचक दो दशक से सवाल उठाते रहे हैं। उनके समर्थक इसे पुरानी और खारिज की जा चुकी बहस मानते हैं, लेकिन विरोधियों का आरोप है कि भारतीय राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण और ‘हम बनाम वे’ की भाषा बाद के वर्षों में और गहरी हुई। समस्या यह है कि 2026 का युवा उसी राजनीतिक व्याकरण को स्वीकार करेगा, यह मान लेना भारी भूल हो सकती है। यह पीढ़ी रोजगार, परीक्षा, पेपर लीक, महंगाई और अपने भविष्य पर जवाब मांग रही है। उसे यह बताने से बात नहीं बनेगी कि उसका राजनीतिक दुश्मन कौन है; वह जानना चाहती है कि उसकी जिंदगी बेहतर कौन करेगा।
जंतर-मंतर ने राजनीति की भाषा बदल दी
जंतर-मंतर का आंदोलन इसी बदलाव का प्रतीक बनकर सामने आया। वहां युवा किसी चुनाव आयोग की मतदाता सूची में दर्ज संख्या भर नहीं थे, न संसद की कार्यवाही में बंद किए जा सकने वाले माइक्रोफोन थे। सड़क पर खड़ा युवा अपने सवाल का खुद प्रवक्ता था। आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि उसने सत्ता और विपक्ष दोनों को याद दिलाया कि लोकतंत्र केवल संसद और चुनाव तक सीमित नहीं है। कभी-कभी सड़क पर बैठा नागरिक भी ऐसी नैतिक ताकत पैदा कर देता है जिसे राजनीतिक सत्ता नजरअंदाज नहीं कर सकती। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस पूरे घटनाक्रम में चाहे जिस राजनीतिक गणित का नतीजा रहा हो, आंदोलनकारी युवाओं ने इसे अपनी आवाज की जीत के रूप में देखा।
‘गोदी मीडिया’ का संकट दरअसल भरोसे का संकट है
इस आंदोलन ने मीडिया के सामने भी असहज सवाल खड़े किए। जिस मीडिया के एक हिस्से पर वर्षों से सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम होने का आरोप लगता रहा, उसकी विश्वसनीयता नई पीढ़ी के बीच लगातार चुनौती झेल रही है। युवा अब केवल टेलीविजन एंकर की व्याख्या पर निर्भर नहीं है। उसके हाथ में मोबाइल है। वीडियो उसके सामने है। प्रदर्शनकारी खुद लाइव हैं। पुलिस कार्रवाई का फुटेज कुछ ही सेकंड में लाखों फोन तक पहुंच जाता है। ऐसे में हर सरकारी फैसले को ‘मास्टरस्ट्रोक’ बताने वाली पत्रकारिता की उम्र सीमित होनी ही थी। सत्ता की आलोचना करना पत्रकारिता का अपराध नहीं और सत्ता की प्रशंसा करना भी अपने आप में अपराध नहीं; लेकिन पत्रकारिता जब सवाल पूछना छोड़ देती है, तब वह अपना सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक औचित्य खो देती है।
छात्रों की मौत और सत्ता की चुप्पी का सवाल
NEET विवाद का सबसे दर्दनाक हिस्सा राजनीतिक नहीं, मानवीय है। परीक्षा और परिणामों को लेकर निराश छात्रों की आत्महत्या की खबरों ने परिवारों को तोड़ा। जंतर-मंतर पर इन परिवारों के दर्द को जगह मिली और राहुल गांधी ने कुछ अभिभावकों के साथ मंच साझा किया। यहां मोदी सरकार से सवाल बिल्कुल जायज है—क्या देश के प्रधानमंत्री को ऐसे परिवारों के दुख पर सार्वजनिक रूप से और अधिक स्पष्ट संवेदना नहीं दिखानी चाहिए थी? प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है। किसी दुखी मां-बाप के आंसू भाजपा, कांग्रेस या किसी आंदोलन के नहीं होते। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन किसी बच्चे को खो चुके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने के लिए किसी राजनीतिक रणनीति की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
20 जुलाई: जवाब अभी बाकी हैं
सबसे गंभीर सवाल 20 जुलाई की कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़े हैं। प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन, शॉक बैटन, आंसू गैस और अन्य कठोर साधनों के इस्तेमाल के आरोप लगे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि प्रतिबंधित या अनुपातहीन बल का इस्तेमाल हुआ, तो यह पता चलना चाहिए कि आदेश किसने दिया और जिम्मेदारी किसकी थी। यदि पुलिसकर्मी भी हिंसा के शिकार हुए, तो वह तथ्य भी सामने आना चाहिए। लोकतंत्र में प्रदर्शनकारी को हिंसा की छूट नहीं मिल सकती, लेकिन वर्दी भी असीमित शक्ति का लाइसेंस नहीं है। कानून दोनों पर बराबर लागू होना चाहिए।
खाना भेजना भी अगर समस्या बन जाए तो सवाल उठेंगे
जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों के लिए ऑनलाइन भोजन भेजने की खबरें भी सामने आईं। यह किसी आंदोलन से सहमति-असहमति से अलग समाज की मानवीय तस्वीर थी—कोई अनजान व्यक्ति किसी अनजान छात्र के लिए खाना भेज रहा था। यदि ऐसी सेवाओं पर प्रशासनिक रोक या बाधा लगाई गई, जैसा आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया, तो उसका स्पष्ट कारण सामने आना चाहिए। लोकतंत्र को विरोध से डरने के बजाय उसे संभालना सीखना पड़ता है।
युवाओं को ‘देश-विरोधी’ बताने की राजनीति खतरनाक है
आंदोलनकारियों को आतंकवादी, विदेशी एजेंट या राष्ट्रविरोधी बताने जैसे आरोप यदि राजनीतिक नेताओं, समर्थकों या मीडिया के किसी हिस्से से लगाए गए, तो उन्हें प्रमाण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। सरकार से सवाल पूछना देश से लड़ना नहीं होता। सरकार और राष्ट्र एक चीज नहीं हैं। सरकारें आती-जाती हैं; राष्ट्र और संविधान उनसे कहीं बड़े हैं। जो युवा परीक्षा की पारदर्शिता मांग रहा है, उसे केवल इसलिए संदिग्ध बना देना कि उसकी आवाज सत्ता को असुविधाजनक लगती है, लोकतांत्रिक राजनीति को कमजोर करता है।
‘थैंक यू फ्रेंड्स’ और सामने खड़ा असली सवाल
नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया की ताकत समझने वाले भारत के सबसे सफल राजनेताओं में रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया का नया दौर एकतरफा संवाद का नहीं है। अब नेता कैमरे से बोलता है तो कैमरे के दूसरी तरफ बैठा युवा तुरंत सवाल भी करता है। इसलिए ‘थैंक यू फ्रेंड्स’ जैसी रीलें छवि तो बना सकती हैं, जवाबदेही का विकल्प नहीं बन सकतीं।
जंतर-मंतर का संदेश यही है कि Gen Z को भाषण से ज्यादा जवाब चाहिए, प्रचार से ज्यादा प्रमाण और राजनीतिक आक्रामकता से ज्यादा संवेदना।
प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव जीतना नहीं होती। चुनाव तो राजनीतिक शक्ति देता है। असली परीक्षा तब होती है जब देश का युवा घायल हो, परेशान हो, अपना भविष्य असुरक्षित महसूस कर रहा हो और सत्ता की ओर देखकर पूछे—क्या आपको हमारा दर्द दिखाई देता है?
यदि उस सवाल के जवाब में केवल एक रील दिखाई दे, तो संकट राजनीति का नहीं रह जाता। वह नेतृत्व की संवेदना का संकट बन जाता है।




