ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जुलाई 2026
कुछ जज सिर्फ फैसले नहीं देते, व्यवस्था को आईना भी दिखाते हैं
कुछ न्यायाधीश ऐसे होते हैं, जिनके नाम के आगे केवल ‘माननीय’ लिखना कम लगता है। उन्हें देखकर मन कहता है—ये “हम हिन्दुस्तानियों के जज” हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान की हालिया टिप्पणियां कुछ ऐसा ही एहसास कराती हैं। उन्होंने असहमति, विरोध प्रदर्शन, नागरिक स्वतंत्रता और न्यायपालिका की जिम्मेदारी को लेकर जिस साफगोई से सवाल उठाए हैं, वे केवल पुलिस-प्रशासन के लिए नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय हैं। उनकी बात का सार बहुत सीधा है—अगर लोकतंत्र में नागरिक अपनी बात नहीं कह सकता, असहमति नहीं जता सकता और शांतिपूर्ण विरोध नहीं कर सकता, तो संविधान में दी गई स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ क्या रह जाएगा?
असहमति जताना आखिर अपराध कब से हो गया?
जस्टिस भुयान ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि अपने विरोध के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले नागरिकों को आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। उनके मुताबिक, विचार व्यक्त करना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रताओं का हिस्सा है। बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं। लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब सामान्य गतिविधियों को भी अपराध के दायरे में खींचने की कोशिश होने लगे। लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव में वोट डालना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ सरकार से सवाल पूछने, उसकी नीतियों से असहमत होने और कानून के दायरे में रहकर उसके खिलाफ आवाज उठाने की स्वतंत्रता भी है। यदि हर असहमत आवाज को कानून-व्यवस्था की समस्या मान लिया जाए, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण ताकत कमजोर होने लगती है।
न्याय मिला, लेकिन तीन महीने जेल में बीत गए तो हिसाब कौन देगा?
जस्टिस भुयान की चिंता का दूसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है—न्याय मिलने में होने वाली देरी। कई मामलों में अदालतें अंततः नागरिकों को राहत दे देती हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। किसी व्यक्ति को यदि ऐसी कार्रवाई के कारण हफ्तों या महीनों जेल में रहना पड़े और बाद में उसे राहत मिले, तो उसके जीवन से निकल चुका वह समय कौन लौटाएगा? उसकी नौकरी, परिवार, प्रतिष्ठा और मानसिक परेशानी का हिसाब कौन देगा? इसलिए नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अदालत की भूमिका केवल अंत में राहत देने तक सीमित नहीं रह सकती। न्याय की असली ताकत तब दिखाई देती है जब वह समय पर नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करे।
‘चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है’
इसी संदर्भ में जस्टिस भुयान ने वाराणसी के एक मामले का उल्लेख करते हुए बेहद सामान्य लेकिन बहुत बड़ा सवाल उठाया। मामला रमजान के दौरान गंगा में नाव पर भोजन करने वाले मुस्लिम पुरुषों की गिरफ्तारी से जुड़ा था। जस्टिस भुयान की टिप्पणी का मूल सवाल था—अगर किसी काम को कानून अपराध नहीं मानता, तो उस काम के लिए किसी नागरिक को गिरफ्तार कैसे किया जा सकता है? उन्होंने चिकन बिरयानी खाने का उदाहरण देते हुए इस बात पर जोर दिया कि कानून में प्रतिबंध न होने की स्थिति में केवल किसी गतिविधि को नापसंद करने के आधार पर उसे अपराध नहीं बनाया जा सकता। यह बहस चिकन या बिरयानी की नहीं है। असली सवाल कानून के शासन का है—नागरिक की स्वतंत्रता कानून से तय होगी या किसी की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से?
अदालत का धर्म लोकप्रिय भावना नहीं, संविधान है
यहीं जस्टिस भुयान की बात का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ सामने आता है। अदालत का काम लोकप्रिय भावना के साथ बहना नहीं है। अदालत का पहला दायित्व कानून और संविधान के साथ खड़ा होना है। संविधान की असली परीक्षा तब नहीं होती जब बहुमत और सत्ता एक ही बात कह रहे हों। उसकी परीक्षा तब होती है जब कोई अकेला नागरिक सत्ता, व्यवस्था या प्रचलित सोच से अलग खड़ा होकर अपनी बात कह रहा हो। उस समय उसकी स्वतंत्रता की रक्षा कौन करेगा? यही वह जगह है जहां न्यायपालिका लोकतंत्र की सबसे मजबूत ढाल बनती है।
न्यायपालिका को भी आईना दिखाने का साहस
जस्टिस उज्जल भुयान की टिप्पणियों की खासियत यह है कि उन्होंने सवाल केवल पुलिस या सरकार से नहीं पूछा। उन्होंने न्यायिक व्यवस्था की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाया। यदि नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामले अदालतों में लंबे समय तक पड़े रहें और राहत तब मिले जब व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का बड़ा हिस्सा खो चुका हो, तो केवल अंतिम आदेश को न्याय की पूर्ण सफलता नहीं माना जा सकता। अदालतों को ऐसे मामलों में अधिक संवेदनशील और तत्पर होना होगा, क्योंकि यहां मामला केवल किसी कानूनी धारा का नहीं, बल्कि किसी इंसान की आजादी का है।
लोकतंत्र को सहमति नहीं, असहमति भी मजबूत करती है
भारत जैसा विशाल लोकतंत्र केवल उन लोगों का नहीं है जो सरकार से सहमत हैं। यह उतना ही उनका भी है जो सरकार से सवाल करते हैं, उसकी आलोचना करते हैं और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करते हैं। असहमति देशद्रोह नहीं है। आलोचना दुश्मनी नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन अराजकता नहीं है। संविधान ने नागरिकों को अधिकार इसलिए नहीं दिए कि उनका इस्तेमाल केवल सुविधाजनक परिस्थितियों में हो। अधिकारों की असली जरूरत तब पड़ती है जब नागरिक और सत्ता आमने-सामने खड़े हों।
इस आवाज को सलाम
जस्टिस उज्जल भुयान की बात इसलिए दूर तक जाती है क्योंकि वह न्याय की किताबों से निकलकर आम आदमी की जिंदगी तक पहुंचती है। सवाल बहुत सामान्य है—जो काम कानून में अपराध ही नहीं है, उसके लिए जेल क्यों? जो विरोध शांतिपूर्ण है, उसके लिए आपराधिक कार्रवाई क्यों? और अगर अदालत अंततः नागरिक को राहत देती है, तो उसे समय पर राहत क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं हो सकती। शांतिपूर्ण विरोध गुनाह नहीं हो सकता। और जिस काम को देश का कानून अपराध नहीं मानता, उसके लिए किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनना सामान्य व्यवस्था नहीं बन सकती।
कुछ न्यायाधीश फैसलों से याद किए जाते हैं और कुछ अपने शब्दों से संविधान की आत्मा याद दिला देते हैं। जस्टिस उज्जल भुयान की यह आवाज उसी संवैधानिक चेतना की आवाज है। इसीलिए उनके लिए दिल से एक शब्द निकलता है—सलाम।




